और मजबूत हुआ भारत का पक्ष

Maroof Razaमारूफ रजा Updated Mon, 08 Feb 2016 08:35 PM IST
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More strengthened India's favor

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यह पहली बार हुआ कि एक विदेशी आतंकवादी ने आतंकी हमले पर हमारे देश के कोर्ट में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये गवाही दी है। यह आतंकी वह व्यक्ति है, जो इससे पहले भी 2010 में भारत की नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी के सामने अमेरिकी जेल में लश्कर-ए-तैयबा एवं आईएसआई के साथ अपने संबंध होने की बात कुबूल कर चुका है। हालांकि यह खुद दोरूपिया है, क्योंकि यह पहले अमेरिका में ड्रग की स्मगलिंग किया करता था और गिरफ्तार भी हुआ था। लेकिन इसकी खुद की गवाही के मुताबिक, 2001 के अंत और 2002 की शुरुआत में यह खुद लश्कर में शामिल हो गया। लश्कर चाहता था कि वह भारत में जाकर आतंकी घटनाओं को अंजाम दे। इसलिए इसे दावा-ए आम और दावा-ए खास में तीन-चार प्रशिक्षण दिया गया था, लेकिन बाद में लश्कर को लगा कि जानकारियां इकट्ठा करने और जासूसी में इसका बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। चूंकि इसका अमेरिका के साथ भी एक रिश्ता था, इसलिए बाद में इसे एक जासूस के रूप में तैयार किया गया।
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लश्कर के निर्देश पर ही इसने 2005 में अपना नाम बदल कर दाऊद जिलानी से डेविड हेडली कर लिया। उसके बाद 2006 में इसका संपर्क आईएसआई से हुआ। जब इसे हिरासत में लिया गया और जब इसने साबित किया कि वह पाकिस्तानी है, तो आईएसआई के दो अफसरों ने यह सोचा कि इसका कई कामों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। मेजर अली नामक व्यक्ति ने इसे आईएसआई के मेजर इकबाल से मिलवाया, जो इसका आईएसआई हैंडलर बन गया। तो 2006 से अमेरिकी हैंडलरों के अलावा पाकिस्तान में इसके दो हैंडलर थे-एक लश्कर का साजिद मीर और दूसरा आईएसआई का मेजर इकबाल। आईएसआई चाहता था कि वह भारत में सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमला करे और वहां की जासूसी करे। जबकि लश्कर का जोर कश्मीर एवं अन्य इलाकों में हमले पर था। इसने अलग-अलग समय पर लश्कर और आईएसआई को अलग-अलग किस्म की खबरें दीं। पर, 2007 के अंत और 2008 में लश्कर और आईएसआई, दोनों ने मुंबई हमले की साजिश रची। उससे पहले कश्मीर और कुछ अन्य जगहों पर हमले के लिए आईएसआई लश्कर को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करती था। हेडली की गवाही के मुताबिक, आईएसआई ने इसे 25,000 डॉलर भी दिए। इसने भारत का कई बार दौरा किया और मुंबई में कई जगहों की रेकी की। उसने समुद्र में बोट की सवारी कर पता लगाया कि कहां से हमला करना ज्यादा ठीक होगा। हेडली को आईएसआई ने काफी प्रशिक्षण दिया। हम जो कहते आ रहे हैं कि मुरीदके और मुजफ्फराबाद में आतंकी प्रशिक्षण केंद्र हैं, उसे भी इसने कुबूला है। आईएसआई ने लश्कर के लोगों-कसाब और अन्य को भी विशेष सैन्य प्रशिक्षण दिया। कसाब और उनके साथियों को फिदायीन हमले के लिए प्रेरित करने के लिए हाफिज सईद और लखवी जैसे लोगों को लगाया गया। यहां पर हाफिज सईद की भूमिका स्थापित हो जाती है। ये सब बातें हेडली ने एनआईए को भी बताई थीं।
चूंकि यह गवाही हेडली ने हमारे कोर्ट में दी है, इसलिए इसका काफी महत्व है। अब हमारी जांच एजेंसियां इस गवाही को अपनी जांच से मिलाएंगी। हमारी अपनी जांच और इसकी गवाही में तालमेल बैठ जाने पर हमारा पक्ष काफी मजबूत होता है। अब यह सरकार पर है कि वह इस सुबूत को सिर्फ पाकिस्तान को सौंपकर चुप बैठ जाती है या इसे दुनिया के सामने ले जाती है या अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में इसे पेश करके पाकिस्तान पर दबाव बनाती है। पाकिस्तान के कोर्ट ने भी फिर कह दिया है कि पठानकोट हमले के संबंध में भारत ने जैश-ए मोहम्मद के खिलाफ जो सुबूत दिए हैं, उनमें कोई दम नहीं है।
एक तरफ पाकिस्तान का कोर्ट बार-बार हमारे सुबूतों को नकारता है, दूसरी तरफ वहां की सरकार कहती है कि पठानकोट हमले की हम संयुक्त जांच करेंगे। ऐसे में सवाल उठता है कि जॉइंट इन्वेस्टिगेशन में क्या यही सुबूत वीडियो लिंक से पाकिस्तान अपने कोर्ट में पेश होगा? अगर वह कोर्ट में इसे पेश करता है, तो जब हमारे देश के कोर्ट में यह सुबूत काम कर सकता है, तो पाकिस्तान के कोर्ट में स्वीकार क्यों नहीं किया जा सकता?

पाकिस्तान के खिलाफ तो बार-बार यह साबित हो चुका है कि वह भारत में हमलों को अंजाम देता है। वर्ष 2004 में आईएसआई के पूर्व डीजी लेफ्टिनेंट जनरल जावेद अशरफ ने भी पाकिस्तान की संसद में यह ऐलान किया था कि जैश-ए मोहम्मद ने कश्मीर में हजारों लोगों को अपना शिकार बनाया। अब तो पाकिस्तान की एक संसदीय समिति ने भी कहा है कि भारत के खिलाफ आतंकी संगठनों को बढ़ावा देने का काम पाकिस्तान को छोड़ देना चाहिए, क्योंकि इससे मुल्क की बदनामी होती है। इस तरह से धीरे-धीरे अब यह स्वीकार किया जाने लगा है कि भारत में आतंकी घटनाओं के पीछे पाकिस्तान का हाथ होता है। पाकिस्तान के कई पत्रकार भी वर्षों से कहते रहे हैं कि आतंकियों को प्रश्रय और प्रशिक्षण देना बंद करना चाहिए।

जहां तक दोनों मुल्कों के रिश्ते की बात है, तो मेरे हिसाब से अगले करीब एक दशक तक दोनों के रिश्ते अच्छे नहीं हो सकते, चाहे मोदी जी कितना ही शरीफ से जाकर गले मिलें। इससे पहले राजीव गांधी भी अपने प्रधानमंत्री काल में तीन बार पाकिस्तान गए थे, तब से अब के हालात में क्या कोई फर्क आया है? इसका कारण है कि जो लोग आतंकियों का इस्तेमाल कर कश्मीर मसले पर भारत पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाते हैं, उनसे आप बात नहीं करते हैं। मेरा आशय यहां पाकिस्तानी फौज से है, जो इस मसले पर पाकिस्तान की राजनीतिक सत्ता से ज्यादा दखल रखती है। इस समस्या को हल करने के लिए एक दीर्घकालीन रणनीति बनानी होगी और आतंकवाद पीड़ित देशों के साथ गठजोड़ करके पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाना पड़ेगा, तभी हम अगले एक दशक में रिश्ते में बदलाव की अपेक्षा कर सकते हैं।

-लेखक सामरिक मामलों के जानकार हैं
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