पहले मुंबई को संवारने की जरूरत है

तवलीन सिंह Updated Sun, 14 Feb 2016 08:08 PM IST
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mumbai need to tidy up first

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मैं संयोग से 'मेक इन इंडिया' सप्ताह शुरू होने के कुछ पहले मुंबई गई थी। सो, उस महानगर को मेरी आंखों के सामने सजाया गया था, ताकि आने वाले मेहमानों को भारत की आर्थिक राजधानी में गुरबत और गंदगी न दिखे। नगर निगम के कर्मचारी इन चीजों को ढकने में रात दिन लगे रहे। सड़कों की सफाई-सजावट हुई। यहां तक कि मरीन ड्राइव के पेड़ों का निचला हिस्सा सफेद और कत्थई रंगों में रंग दिया गया। इस प्रक्रिया में गरीबों को महानगर से गायब ही कर दिया गया। लाल बत्तियों पर जो महिलाएं और बच्चे फूल बेचते दिखाई देते हैं, वे अदृश्य हो गए। सो, आने वाले मेहमान अगर इस महानगर के बाहरी इलाकों में न जाने की कोशिश करें और देओनार में सड़ते-जलते कूड़े से हवा में समाते जहर की अनदेखी करें, तो क्या इससे यह साबित हो जाएगा कि यह महानगर दूसरे देशों के आधुनिक महानगरों की तरह हो गया है? मुंबई के बारे में कभी विदेशी मेहमान कहा करते थे कि यह दुनिया की सबसे महंगी और विशाल झुग्गी बस्ती है।
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आज भी हवाई अड्डे पर उतरते ही दिखती हैं झुग्गी बस्तियां, गंदे बाजार और प्रदूषित पानी से भरे तालाब। नया हवाई अड्डा आलीशान और आधुनिक है। लेकिन इन गंदी बस्तियों को कई वर्षों के प्रयास के बाद भी हटाया नहीं जा सका है। कुछ इसलिए कि इन झुग्गी बस्तियों में लाखों मतदाता बसते हैं, जो चुनाव के समय अपना कीमती वोट उनको ही देते हैं, जिन्होंने उन्हें हटाने की कोशिश न की हो, और कुछ इसलिए भी कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्रियों ने दशकों से मुंबई के साथ सौतेला व्यवहार किया है। इस महानगर के धन को लूटकर ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश किया है, जहां मतदाताओं की तादाद और भी अधिक है। मुंबई में सुधार शायद तभी होगा, जब इस महानगर के महापौर के हाथों में पूरा प्रशासन थमा दिया जाएगा। दूसरे देशों में महानगरों के महापौर अक्सर शक्तिशाली होते हैं, लेकिन भारत में महानगरों का प्रशासन राज्य सरकारों के हाथों में है, और विशेषज्ञों का मानना है कि महानगरों की बुरी स्थिति का यही मुख्य कारण है। अनेक विदेशी निवेशक मुंबई की गंदगी से इतना घबराते हैं कि कारोबार के सिलसिले में जब यहां आते हैं, तो हवाई अड्डों के आसपास ही होटल में ठहरते हैं, ताकि शहर के अंदर जाने की जरूरत न पड़े।
नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने शहरीकरण को अहमियत दी है। लेकिन, प्रधानमंत्री जी, हम शहरों में सुधार का काम जब तक तेजी से पूरा नहीं करते, तब तक विदेशी निवेशक और पर्यटक भारत से दूर ही रहेंगे। ऐसे में मुंबई को सिंगापुर बनाना तो दूर, मुंबई को बैंकाक बनाने में भी कई दशक लग सकते हैं। सो, उम्मीद है कि 'मेक इन इंडिया' का यह सप्ताह समाप्त होने के बाद भी मुंबई की समस्याओं पर महाराष्ट्र सरकार ध्यान देती रहेगी। मुंबई की सबसे बड़ी समस्या आवास की है, जिस पर किसी राजनेता ने ध्यान नहीं दिया है। अनुमान है कि इस महानगर की आधी से ज्यादा आबादी फुटपाथ पर रहती है। आज झुग्गी बस्तियों में भी एक खोली का किराया तीन हजार रुपये से अधिक है। प्रधानमंत्री विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन ऐसा करते हुए उनको याद रखना चाहिए कि निवेशक वहां जाते हैं, जहां आधुनिक महानगर और सुविधाएं होती हैं, और जहां गंदगी एवं गुरबत के समाधान ढूंढे जाते हैं। 'मेक इन इंडिया' तब सफल होगा, जब हम देश की आर्थिक राजनीति का पहले पुनर्निर्माण करेंगे।
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