उत्तराखंड में अपनाया जाए इको तीर्थाटन तो पर्यावरण सुधार की अपार संभावनाएं

वीरेन्द्र कुमार पैन्यूली Updated Wed, 10 Jul 2019 07:07 AM IST
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सरकारें और पर्यटन व्यवसायी विश्व स्तर पर विभिन्न आस्थाओं के श्रद्धालुओं से मुनाफा कमाने के लिए 'पिलग्रिमेज टूरिज्म' या तीर्थयात्रिक पर्यटन पर जोर दे रहे हैं। तीर्थयात्रियों को पर्यटक मोड में ढालना इसकी रणनीति होती है। तीर्थ स्थलों के प्राकृतिक संसाधन आधार पर बढ़ती भीड़ का क्या प्रभाव होगा, इसकी चिंता पर्यटन व्यवसायियों और सरकारों में दिखाई नहीं देती।
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कस्बाई तीर्थस्थलों की सीमित ढांचागत संरचना तथा प्राकृतिक संसाधन आधार अपनी स्थायी आबादी से कई गुणा भीड़ की जरूरतों के बोझ से चरमरा जाते हैं। नतीजतन स्थानीय पर्यावरण व पारिस्थितिकी को नुकसान की आशंका बढ़ जाती है। जल संसाधनों को तीर्थयात्रियों की भीड़ में प्रदूषण मुक्त रखना तीर्थस्थलों की एक प्रमुख समस्या है।
उत्तराखंड की ही बात लें, तो सौ से ज्यादा स्थानों पर गंगा और उसकी सहायक नदियों में गंगोत्री से हरिद्वार  तक अनुपचारित जल-मल पहुंच रहा है। आचमन व स्नान भी इसी जल से हो रहा है। वाहनों से पैदा होने वाला प्रदूषण और प्लास्टिक कचरा भी समस्याएं पैदा कर रहा है।
ऐसे में क्या पर्यटन प्रेरित स्थानीय पारिस्थितिकी व पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को कम करने के लिए जिस तरह से ईको टूरिज्म अपनाने का सुझाव दिया जाता है, क्या उसी तरह से संवेदनशील क्षेत्रों में 'पिलग्रिमेज टूरिज्म' के दबावों को कम करने के लिए 'ईको पिलग्रिमेज' या ईको तीर्थाटन की अवधारणा और रणनीति स्थापित करने के लिए ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए?

घटते जलस्रोतों, घटती हरियाली व बढ़ते कूड़े-कचरों के अंबारों व परिवहनीय प्रदूषणों के बीच तीर्थयात्रियों की भीड़ में भी जलवायु बदलाव के दौर में व तीर्थस्थलों में पर्यावरण तथा विकास में सामंजस्य हो, इसके लिए समीप के हिमनदों, जल स्रोतों, वनों, अभयारण्यों के क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्यों व तीर्थस्थलों से उनकी निकटता को ध्यान में रख उनके संभावित क्षरणों को रोकना होगा।                                                                                                                                                       
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