आतंकवाद के खिलाफ युद्ध जीतना होगा

तवलीन सिंह Updated Sun, 07 Feb 2016 08:15 PM IST
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Need to win over terrorism

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पिछले सप्ताह जयपुर में आतंकवाद निरोधक सम्मेलन हुआ, जिसमें देश-विदेश के सुरक्षा विशेषज्ञ आतंकवाद पर विचार-विमर्श करने के लिए आए थे। यह सम्मेलन इंडिया फाउंडेशन और राजस्थान सरकार के सहयोग से आयोजित हुआ, जिसमें मैं राम माधव के आमंत्रण पर पहुंची थी। भाजपा के इस आला सचिव ने पिछले करीब डेढ़ वर्षों में ऐसे सम्मेलनों के जरिये एक नई सोच स्थापित करने की कोशिश की है। ऐसी सोच, जो इस देश की पारंपरिक वामपंथी सोच से अलग है। इससे पहले गोवा में मैंने ऐसे दो सम्मेलनों में भाग लिया है, लेकिन काउंटर टेररिज्म वाले इस सम्मेलन में मुझे पहली बार जाने का मौका मिला, तो मैं बहुत उत्साह के साथ पहुंची, क्योंकि मैं मानती हूं कि कथित जेहादी आतंकवाद से अपने देश को गंभीर खतरा है।
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कश्मीर घाटी में इस्लामिक स्टेट (आईएस) के काले झंडे कई बार दिख चुके हैं और इसके प्रवक्ताओं ने स्पष्ट किया है कि भारत उनका दुश्मन है। हाल में सामने आए आईएस के एक वक्तव्य में बिल्कुल साफ किया गया है कि कश्मीर घाटी में उनकी गतिविधियां जल्दी ही बढ़ा दी जाएंगी। सो मुझे थोड़ा अजीब लगा कि जयपुर वाले सम्मेलन के पहले दिन जेहादी आतंकवाद के बारे में दबी जुबान में ही बातें हुईं। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने उद्घाटन भाषण में इसका जिक्र नहीं किया। उन्होंने अपने भाषण में सांप्रदायिक शांति और सद्भावना बरकरार रखने की बातें कीं। ये बातें जरूर कही जाती हैं कि मजहब का आतंकवाद से कोई ताल्लुक नहीं है। लेकिन, आईएस के सरगना बार-बार कह रहे हैं कि वे जो कर रहे हैं, वह इस्लाम के नाम पर कर रहे हैं।
पेरिस पर हमले के बाद आईएस के वक्तव्यों में स्पष्ट शब्दों में कहा गया कि जो हुआ, वह अल्लाह की मर्जी से हुआ, क्योंकि पेरिस 'पापियों की राजधानी' है, जहां गाना गाने, वाद्य बजाने, शराब पीने और सरेआम मोहब्बत करने की परंपरा है। ऐसी चीजें इस्लाम में हराम मानी जाती हैं। आईएस की ताकत इतनी बढ़ी हुई है कि उसने सीरिया और इराक के बीच एक देश स्थापित कर दिया है। वहां छोटे बच्चों के हाथों में बंदूक रख दी जाती है, ताकि वे उन्हें मौत के घाट उतार सकें, जो 'काफिर' हैं। आईएस ने अपने कई वीडियो इंटरनेट पर डाले हैं, जिनमें 'काफिरों' को निशाना बनाते मुस्कराते हुए बच्चे दिखते हैं।
जयपुर के आतंकवाद निरोधक सम्मेलन में आईएस का जिक्र तो हुआ, लेकिन उतना नहीं, जितनी कि मुझे उम्मीद थी। मैं इस सम्मेलन में यह सोचकर हिस्सा लेने गई थी कि इसमें आतंकवाद के खिलाफ इस नए युद्ध में भारत की भूमिका पर बात होगी। पर ऐसी चर्चा न होने के कारण थोड़ी निराश हुई। पूर्व सेनाध्यक्ष वीपी मलिक से जब मैंने इस बारे में पूछा, तो उनका जवाब था कि 'सेना को देश की सीमा पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि उसकी असली भूमिका वहीं है।’ उसी दिन हाफिज सईद ने लाहौर से एक वक्तव्य में कहा कि पठानकोट जैसे हमले और भी होने वाले हैं।

सीमाओं पर हम कितनी भी कड़ी सुरक्षा रखें, हकीकत यह है कि हाफिज सईद और मौलाना मसूद अजहर जैसे सरगनाओं के जेहादी सिपाही देश के अंदर घुस ही जाते हैं। यह अच्छा हुआ कि राम माधव ने आतंकवाद-निरोध पर सम्मेलन आयोजित किया, लेकिन उम्मीद है कि अगले वर्ष इस सम्मेलन में यथार्थ का सामना थोड़ा और अधिक किया जाएगा। 
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