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होली नहीं, रंग खेलते हैं

sudheesh pachauriसुधीश पचौरी Updated Sun, 12 Mar 2017 07:12 PM IST
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सुधीश पचौरी
सुधीश पचौरी
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होली त्योहार है-होली ब्योहार है-होली एक अवसर है-प्रेम का उत्सव है और प्रेम के रंगों का कलरव है। कॉलोनी के बच्चे प्लास्टिक की पिचकारियां हाथ में लिए एक दूसरे के पीछे दौड़ते दिख रहे हैं। किसी के हाथ में पानी भरे गुब्बारे हैं, तो किसी के पास छोटी बाल्टी में रंगीन पानी है। किसी के हाथ में हरा रंग लगा है और दौड़कर वह दूसरे बालक के गाल पर मलने के चक्कर में है। होली सबसे पहले बच्चों में आती है। वे ही हैं, जो बड़ों को भी अपनी होली में खींच लेते हैं। किशोर-किशोरी उन्हीं से होली का आइडिया लेते हैं। बड़े-बूढ़े भी उनकी तरंग में रंग जाते हैं।
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अब टेसू के फूलों का पीला पानी दुर्लभ है। केमिकलों के रंग ही चलते हैं। होली में बहुत कुछ बदल गया है और बदल रहा है-जिस तरह की होलियों में हम आप आजकल रहते हैं, वह न जाने कितनी बार और कितनी तरह से बदलती हुई यहां तक पहुंची हैं। होली सरकारों के भरोसे नहीं मनी, मन के मनाए मनी है। आजकल की सरकारें जरूर होली के लिए तरह-तरह की आचार संहिताएं बनाने पर तुली रहती हैं-सरकारों के कई विभाग अक्सर समझाते रहते हैं कि केमिकल रंग न लगाइए-पानी को बेकार न जाने दीजिए-मनाना है तो फूलों से मनाइए, चंदन से मनाइए।

सरकारें क्या जानें कि फूल और चंदन अमीरों के आइटम हैं, जबकि आम जनता के बीच होली एक प्रकार से मुफ्त का खेल है, क्योंकि उसका नाम ‘धुलेहडी है’ और जहां होली जलती है, उसी की धूल से खेली जाती है। गरीब आदमी फूल के लिए पैसे कहां से लाए? वह तो धूल से खेलता है। लेकिन ज्यों-ज्यों होली शहराती हुई है, त्यों-त्यों वह धूल से परहेज करती गई है और हाल यह है कि लोग सिर्फ होली का नाम जानते हैं, धुलेहडी भी कोई चीज होती है, इसे भूल गए हैं!

होली एक प्रकार की जन संस्कृति है-वह जनजीवन में अपने आप चली आती है। उससे भी पहले वसंत आता है, बिना किसी के बुलाए आ जाता है-वह हवा से उसकी ठंडक निकालकर  ‘समशीतोष्ण’ बना डालता है। न ज्यादा गर्म, न ज्यादा ठंडी और तेज चलती हुई, जिसे स्कूली बच्चे इम्तहानों की हवा कहते हैं!

होली जब भी आती है, कुछ-कुछ अजीब-सी बातें याद दिलाती है। होली कृत्रिम चमकीलेपन और साज-सज्जा के बरक्स सहजता का हस्तक्षेप है। होली कहती है कि आदमी इतना भी ब्यूटी पार्लर न बने-इतना भी साफ-सुथरे न बने कि उसे गंदा करना पड़े। यह हिंदुस्तान है, यहां वही सजता है, जो कुछ मैला होता है। होली कहती है कि आप हिंदुस्तान को हिंदुस्तान ही रहने दो-उसे अमेरिका की नकल न बनाओ! उसे इतना स्मार्ट न बनाओ कि होली खेलना भूल जाएं! होली याद दिलाती है कि हम एक रंग भरी जल संस्कृति हंै, जो आग में घी नहीं, पानी डालने में यकीन करती है-राजनीति आग में घी डालने का काम करती है, होली आग में पानी डालने का काम करती रहती है-बहुत-सी होली बची नहीं है, लेकिन उसके कुछ बुनियादी मानी अब भी बचे हुए हैं-होली मिलन का त्योहार है, गिले-शिकवे दूर करने का अवसर है।

रबी की फसल आ रही है, नवान्न आ रहा है, गेहूं और चने के हरे दानों को होली की आग में भूनकर-बांटकर खाया जा रहा है और होली गाई जा रही है। होली के कई दिन बाद भी होली दर्शन देती रहती है। किसी के चेहरे पर उसके मित्र ने ऐसा पक्का रंग लगाया है कि छुड़ाए नहीं छूटा है-वह अपने रंगीन चेहरे को लिए-दिए ही दफ्तर चला आया है। उसका चेहरा देखकर सब जान जाते हैं कि बंदे ने जमकर होली खेली है-असली ‘हुरहारा’ यानी होली खेलने वाला यही है।

रंग के लगने-लगाने और रंग के न छूटने के मानी बड़े गहरे हैं। रंग यहां प्रेम का प्रतीक बन जाते हैं! होली है ही ऐसा उत्सव, जिसमें कुछ देर के लिए छेड़छाड़ भी संस्कृति बन जाती है! होली को लेकर जितने फिल्मी गाने बने हैं, उनसे इस ‘छेड़छाड़’ और परस्पर की ‘रस रंग रार’ को आसानी से समझा जा सकता है। इस दिन कोई बुरा नहीं मानता, क्योंकि होली पहले ही कहकर चलती है कि ‘बुरा न मानो होली है’-फिर भी जो बुरा माने, वह होली के लायक नहीं।

होली के जरिये समाज ने मन के अंदर की गांठों को खोलने की जगह बनाई है। जिसकी खुल गई, जिसका अहंकार विगलित हो गया, वही सच्चा हुरहारा है, बाकी सब होली के नकली खिलाड़ी हैं।

इसी होली के अवसर पर टीवी में आने वाला एक विज्ञापन होली के मिजाज को कुछ इस तरह से बताता है : दो-तीन शोहदे टाइप होली के मूड में सड़क किनारे खड़े हैं-दूर से सफेद सलवार-कमीज में दो लड़कियां आती दिखती हैं-उनको आता देख उनमें से एक शोहदा होली के अवसर पर लड़कियों को तंग करने के इरादे से गुलाल लेकर आगे बढ़ता है और उनमें से एक लड़की के गाल पर लाल गुलाल रगड़ देता है और उसे चिढ़ाता हुआ कहता है कि लो, रंग लगा दिया, अब इसे छुड़ाओगी कैसे? लड़की एक पल चुप रहती है, फिर आगे बढ़कर बोलती है कि यह रंग तो छूट जाएगा, लेकिन तुम अपने मन के मैल को कब साफ करोगे? इस वाक्य को सुनकर वह शोहदा  झटका-सा खाता है। ऐसा कहते हुए लड़की उसी के हाथ से गुलाल लेकर उसी के गाल पर मलकर उसके गाल पर एक चपत लगाकर आगे बढ़ जाती है कि अपने मन को कैसे साफ करोगे...।

फिर एक डिटर्जेंट पाउडर का विज्ञापन आता है, जो कहता है कि इस डिटर्जेंट को लगाओ, सारे रंग धुल जाएंगे। डिटर्जेंट ऊपर के मैल भले निकाल दे, अंदर के मैल को कौन निकाले? अंदर के मन के मैल को तो होली ही निकालती है, बस एक बार होली की मस्ती में अपनी घृणा के कीचड़ को साफ करके तो देखो! होली इसी मानी में एक सोशल साइकोलॉजिकल थेरैपी है! इसे जितना खेलेंगे, उतना ही तन और मन स्वस्थ होगा!

इसलिए हे दलो! हे नेताओ! चुनाव हो गए-सरकारें बनने वाली हैं-अब तो होली के भाव में आ जाओ-सारे गिले-शिकवे भूल जाओ-आपस में प्रेम का रंग डालो और डलवाओ-मन के मैल को प्रेम-जल से धो डालो और घृणाओं से बजबजाते सामाजिक चित्त को ‘निर्मल’ बना डालो!
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