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अतीत भुलाकर नई राह पर

Mahendra Vedमहेंद्र वेद Updated Sat, 15 Feb 2020 04:01 AM IST
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महिंदा राजपक्षे एवं मोदी
महिंदा राजपक्षे एवं मोदी - फोटो : a
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यदि कूटनीति का मतलब राष्ट्रीय हितों की सेवा करना है, तो इसका एक मूल सिद्धांत यह है कि अतीत की कड़वाहट को भूल जाएं, वर्तमान को मजबूत बनाएं और बेहतर भविष्य के लिए काम करें। यही वह चीज है, जो भारत और श्रीलंका ने अपने नागरिकों के पारस्परिक लाभ के लिए और दक्षिण एशिया की बेहतरी के लिए किया है।
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एक दशक पहले श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे खलनायक थे, जिन्हें हजारों तमिलों को भगाने के कारण भारत नापसंद करता था। हालांकि भारत ने उसे मंजूरी नहीं दी थी, लेकिन चुपचाप खड़ा देखता रहा। राजपक्षे की सेना ने लंबे समय से लिट्टे द्वारा जारी सशस्त्र प्रतिरोध को खत्म करने के लिए उस द्वीपीय देश के उत्तर और पूर्वोत्तर क्षेत्र में लड़ाई छेड़ दी। वह श्रीलंकाई तमिलों के मूल स्थान तमिलनाडु के लिए भयानक दौर था। जब लिट्टे प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण को नई दिल्ली की मौन सहमति के चलते 2009 में मार दिया गया, भारत के आम चुनाव तक कोलंबो ने इसकी घोषणा नहीं की। जो भी हो, महिंदा के प्रति भारत का रुख स्पष्ट रूप से विभाजित था, महिंदा ने महसूस किया कि अपने देश में अगले आम चुनाव में वह उसी के चलते हार गए अथवा भारत द्वारा हरा दिए गए। अपदस्थ राष्ट्रपति ने अपने एक इंटरव्यू में इसका दावा किया था। उन्होंने कहा था कि भारतीय खुफिया एजेंसी ने उनके खिलाफ काम किया। लेकिन एक दशक बाद न केवल राजपक्षे, बल्कि उनके परिवार के अन्य लोग भी श्रीलंका में उच्च पदों पर हैं। उनके छोटे भाई गोतबाया, जो तब कद्दावर रक्षा सचिव थे और लिट्टे के खिलाफ अभियान का नेतृत्व कर रहे थे, पिछले नवंबर में राष्ट्रपति चुने गए। और महिंदा राजपक्षे श्रीलंका के प्रधानमंत्री बने।

अतीत को भूलकर और यह उम्मीद करते हुए कि राजपक्षे परिवार भी ऐसा ही करेगा, भारत ने 'पड़ोसी पहले' की कूटनीति को आगे बढ़ाया है। न सिर्फ विदेश मंत्री एस. जयशंकर (श्रीलंका के साथ निपटने वाले पूर्व विदेश सचिव), बल्कि राजनयिक से मंत्री बने हरदीप सिंह पुरी भी गोतबाया के साथ बैठक में शामिल हुए। पुरी एक समय में श्रीलंका में प्रभावी उच्चायुक्त थे। इसमें सहायक की भूमिका निभाई एक तीसरे राजनयिक (जो उच्चायुक्त थे) तरणजीत सिंह संधु ने। अतीत की कड़वाहट को भूल जाना स्पष्ट रूप से एक अच्छी कूटनीति है। भारत और श्रीलंका के नेताओं ने यही किया है। पहले गोतबाया और इस हफ्ते महिंदा ने पद संभालने के बाद अपना पहला विदेशी दौरा भारत का किया। महिंदा ने भाई गोतबाया द्वारा शुरू किए गए द्विपक्षीय संबंधों को विस्तार से आगे बढ़ाने की इच्छा भी जताई।

भारत जहां श्रीलंका के साथ अच्छे पड़ोसी संबंध बनाए रखना चाहता है, और इस क्षेत्र में बढ़ते चीनी प्रभाव को कम करना चाहता है, वहीं कोलंबो भी जानता है कि बड़े पड़ोसी देश भारत से निपटने में चीन या पाकिस्तान या कोई भी अन्य देश उसकी मदद नहीं कर सकता है। एक तरह से श्रीलंका का भारत के साथ संबंध वैसा ही है, जैसा नेपाल का भारत के साथ संबंध, जहां भारत को यह आश्वासन दिया जाता है कि वे दोनों क्षेत्रीय शक्तियों के साथ समान दूरी बनाए रखना चाहते हैं। यही महिंदा की अभी संपन्न हुई यात्रा की पृष्ठभूमि है।

महिंदा ने दिखाया कि वह दो महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपने मेजबान मोदी के साथ सहमत हैं। पहला है, भारत का विवादास्पद नागरिकता संशोधन कानून, जिसने दूसरे पड़ोसियों, विशेष रूप से बांग्लादेश को परेशान किया है। श्रीलंका ने इसे भारत का 'अंदरूनी मामला' बताया है।

आतंकवाद के बारे में पूछे जाने पर महिंदा ने जोर देकर कहा कि उनका देश और भारत मिलकर मजबूती से आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष करेंगे। उनका स्पष्ट जोर लिट्टे पर था, जिसे आतंकवादी संगठन कहा जाता है, लेकिन यह भी एक बड़ा मुद्दा है, जिसका क्षेत्रीय और वैश्विक संदर्भ में भारत समर्थन करता है। श्रीलंका अपने यहां चर्च पर हुए आतंकी हमले के दौरान भारतीय मदद के प्रति भी कृतज्ञ है, जो उसे भारतीय चेतावनी के रूप में मिली थी, लेकिन वह उसका फायदा नहीं उठा सका।

श्रीलंकाई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार मोदी के साथ बातचीत के दौरान सुरक्षा के मुद्दे भी उठाए गए। यह स्पष्ट है कि कोई भी पक्ष उसे खारिज नहीं करेगा। भारत ने इंदिरा गांधी-सिरिमावो भंडारनायके युग के दौरान और उसके बाद भी श्रीलंका की मदद की। श्रीलंकाई सुरक्षा भारत के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह हिंद महासागर के व्यापार पथ में है, और अंडमान निकोबार व लक्षद्वीप तथा मालदीव पर नजर रखने की दृष्टि से भी अहम है।

मोदी ने श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए क्रेडिट लाइन के रूप में 40 करोड़ डॉलर और आतंकवाद का मुकाबला करने के हमारे प्रयासों के लिए पांच करोड़ डॉलर की क्रेडिट लाइन की पेशकश की। महिंदा ने कहा, 'हमने नवंबर में राष्ट्रपति गोतबाया की यात्रा के दौरान किए गए इन प्रस्तावों के बारे में चर्चा की।' भारत आम तौर पर व्यापार और वाणिज्य पर मदद देता रहा है। लेकिन इस बार महिंदा ने ऋण पुनर्गठन का मुद्दा उठाया, जिसका मतलब है कि भारत श्रीलंका द्वारा देर से ऋण भुगतान से सहमत है। भारत को इससे कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। श्रीलंकाई प्रधानमंत्री ने कहा कि 'हमारी बातचीत का एक हिस्सा सुरक्षा पर केंद्रित था, भारत ने हमेशा खुफिया और आतंकवाद विरोधी क्षमता बढ़ाने में श्रीलंका की मदद की है और हम इस संबंध में आगे भी समर्थन की उम्मीद करते हैं।'

महिंदा ने भारत की पड़ोसी पहले की नीति और श्रीलंका के साथ संबंधों को प्राथमिकता देने के लिए मोदी को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि हम इस बात से सहमत हैं कि हमारा सहयोग बहुआयामी है, जिसमें सुरक्षा, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक जैसे कई क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है। महिंदा की यात्रा का एक दिलचस्प पहलू सांस्कृतिक संपर्क से जुड़ा हुआ है। एक अखबार को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि वह एक सिंहला और बौद्ध हैं, पर उनकी आस्था हिंदू देवताओं में भी है। उन्होंने अपनी यात्रा का समापन बनारस जाकर किया, जहां उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा की और कोलंबो लौटते हुए वह तिरुपति के वेंकेटेश्वर मंदिर भी गए।
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