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बिखरा हुआ विपक्ष

नीरजा चौधरी Updated Sun, 19 Jan 2020 06:02 PM IST
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सीएए-एनआरसी के खिलाफ प्रदर्शन
सीएए-एनआरसी के खिलाफ प्रदर्शन - फोटो : a
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 जब अन्ना आंदोलन चरम पर था, तब नरेंद्र मोदी के सहयोगी स्थिति का जायजा लेने दिल्ली आए थे, और उन्होंने लौटकर उन्हें बताया कि देश का मानस बदलाव चाहता है और उनके लिए सक्रिय होने का यही समय है। उच्च स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन का राष्ट्रीय स्तर पर सर्वाधिक लाभ नरेंद्र मोदी ने उठाया। जबकि दिल्ली में अन्ना आंदोलन का राजनीतिक लाभ आम आदमी पार्टी के संस्थापक अरविंद केजरीवाल को मिला। वर्ष 2011-12 के अन्ना आंदोलन का लाभ आम आदमी पार्टी (आप) राष्ट्रीय स्तर पर नहीं उठा सकी थी, जबकि 2014 के चुनाव में उसने पूरे देश में अपने उम्मीदवार खड़े किए थे। दरअसल नरेंद्र मोदी के प्रचार अभियान ने जैसे ही गति पकड़ी, लोग भाजपा को यूपीए के व्यावहारिक विकल्प के रूप में देखने लगे। तब तक यूपीए-2 के घोटालों ने कांग्रेस की अगुआई वाले गठबंधन के खिलाफ लोगों में व्यापक असंतोष और गुस्सा पैदा कर दिया था।
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वर्ष 2011 के अन्ना आंदोलन की तरह 2020 में सीएए-एनआरसी के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व गैर-राजनीतिक तत्वों के हाथों में है। इस बार विभिन्न परिसरों के छात्र आंदोलनरत हैं, जो मानते हैं कि धर्म नागरिकता का आधार नहीं होना चाहिए। और कानून के सामने सब समान हैं, इस सिद्धांत से समझौता नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इसने भारत के लोकतंत्र को अपनी विशाल विविधता के साथ अतुलनीय पहचान दी है। पिछले करीब एक महीने से देश के युवा जिस तरह अपने भौतिक हित से अलग मुद्दों के लिए सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं, ऐसा रोज-रोज नहीं होता। किसने सोचा होगा कि 303 सांसदों के बहुमत के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार को अपने दूसरे कार्यकाल के छह महीने में इतने विशाल आंदोलन का सामना करना पड़ेगा? और यह कि उस आंदोलन का नेतृत्व वे युवा करेंगे, जो नरेंद्र मोदी के मुख्य समर्थक हैं और प्रधानमंत्री ने पिछले छह वर्षों में जिनके समर्थन का व्यापक लाभ उठाया है।

जब विपक्षी दलों ने देखा कि देश के विभिन्न हिस्सों में छात्र स्वतः आंदोलन के लिए उठ खड़े हुए हैं; इनमें दिल्ली का सेंट स्टीफन कॉलेज भी शामिल है, जो वर्षों तक आंदोलन से दूर रहा था, तो हाल में वे भी इसमें शामिल हुए हैं। इनमें से कई दलों ने संसद के अपने पूर्व रुख में बदलाव किया है। बीस विपक्षी दलों ने दिल्ली में कांग्रेस के अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व में बैठक की और सीएए व एनआरसी का विरोध करने की प्रतिबद्धता जताई। हालांकि वे छात्रों के नेतृत्व वाले आंदोलन के साथ हैं (जिसमें बड़ी संख्या में मुस्लिम शामिल हैं, जिन्हें लग रहा है कि उनकी नागरिकता खतरे में है), पर विपक्ष की आवाज निस्संदेह इस आंदोलन को मजबूत करेगी। अलबत्ता तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, बसपा, सपा, शिवसेना और आप जैसी पार्टियां इस बैठक में शामिल नहीं हुईं।

दिल्ली विधानसभा के चुनाव को देखते हुए आप जाहिरा तौर पर सीएए-एनआरसी के खिलाफ सख्त रुख अपनाना नहीं चाहती, क्योंकि वह जानती है कि इस मुद्दे में मतदाताओं को धार्मिक रूप से ध्रुवीकृत करने की क्षमता है। यही हाल शिवसेना का भी है, जो अपने हिंदुत्व के आधार को खतरे में नहीं डालना चाहती। चूंकि तमिलनाडु में स्थानीय निकाय के चुनाव में द्रमुक द्वारा पर्याप्त सीटें न देने से कांग्रेस उससे नाराज थी, इसलिए द्रमुक ने भी कांग्रेस द्वारा बुलाई बैठक से दूरी बनाई। जबकि बसपा को राजस्थान में कांग्रेस से समस्या है। इस तरह सीएए-एनआरसी के खिलाफ कांग्रेस द्वारा बुलाई गई बैठक विपक्ष के बंटे होने की धारणा के साथ खत्म हुई।

यह इसके बावजूद है कि दस राज्य सरकारों ने सीएए को लागू करने से इन्कार कर दिया है। इससे सांविधानिक गतिरोध पैदा हो सकता है, जो छोटी बात नहीं है। केरल की वाम मोर्चे की सरकार ने तो सीएए को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है।

सीएए को असम के उन 14.5 लाख हिंदुओं को नागरिकता प्रदान करने की जरूरत के मद्देनजर लाया गया हो सकता है, जो एनआरसी के लिए जरूरी कागजात नहीं दे सके थे। इनमें से ज्यादातर बंगाली हिंदू हैं, और जो भाजपा के समर्थक हैं। हिंदू बंगालियों को आश्वस्त करने के लिए संकेत देने की कोशिश में भाजपा ने पूरे पूर्वोत्तर के असमी और जनजातीय लोगों के गुस्से को भड़का दिया है। वे सिर्फ मुसलमानों के बजाय पूर्वोत्तर आने वाले सभी बाहरियों से कहीं ज्यादा नाराज हैं।

सरकार सख्त कार्रवाई के जरिये इन विरोध प्रदर्शनों को खत्म करना चाहती है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पुलिस की ज्यादती से और भी युवा सहानुभूति में आंदोलन में शामिल हुए। इसके बावजूद भाजपा का मानना है कि चीजें अपने तयशुदा ढंग से आगे बढ़ रही हैं और वह लोगों तक पहुंच बनाकर इस नुकसान को कम करने में सक्षम होगी।

अनेक लोग मानते हैं कि भाजपा के आला नेताओं ने पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के गैर-मुस्लिमों को नागरिकता का प्रस्ताव देने और नेपाल व श्रीलंका के लोगों को न देने के पीछे यह हिसाब लगाया होगा कि इससे देश के वामपंथी और उदारवादी तत्व तिलमिलाएंगे। और वे तत्व मुसलमानों के पक्ष में जितना ज्यादा बोलेंगे, हिंदुओं को उतना ही अधिक एकजुट किया जा सकेगा, और जो चुनाव में भाजपा को लाभ पहुंचाएगा। और यह भी कि सीएए-एनआरसी बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, और अंत में 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए देश भर में हिंदू मतों की एकजुटता और ध्रुवीकरण के लिए अयोध्या-2 साबित हो सकता है।

अभी यह नहीं कहा जा सकता कि सीएए-एनआरसी राजनीति का लाभ किसे मिलेगा। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में राजनीतिक लड़ाई बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में लड़ी जानी है, जहां चुनाव होने वाले हैं। इन राज्यों में भाजपा सीएए-एनआरसी का लाभ उठा सकती है। फिर भी विपक्षी एकता हो या नहीं, अगर सीएए-एनआरसी विरोध जमीनी स्तर पर दलितों, मुसलमानों, आदिवासियों और युवाओं को एकजुट करती है, तो यह भाजपा के लिए चिंता की बात हो सकती है। इसलिए यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि आखिर में इससे किसे लाभ होगा।
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