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भारतीय चुनाव पर पाकिस्तान की नजर

mariana babarमरिआना बाबर Updated Thu, 11 Apr 2019 07:54 PM IST
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इमरान खान
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भारत के नब्बे करोड़ मतदाताओं ने लोकसभा चुनाव के लिए अपने मताधिकार का प्रयोग करना शुरू कर दिया है। भारतीय लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया बेहद लंबी है, जो न केवल बेहद आश्चर्यजनक है, बल्कि उसके पड़ोसियों को यह अविश्वसनीय भी लगता है। पाकिस्तान के आम लोगों का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी के पास सत्ता में वापसी का एक अच्छा मौका है, जबकि कांग्रेस के पास पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले अपनी सीटों की संख्या बढ़ाने का एक अच्छा अवसर है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा को संभवतः कुछ सीटों का नुकसान होगा और वह केंद्र में गठबंधन की सरकार बनाएगी।
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लेकिन सात चरणों की लंबी मतदान प्रक्रिया के बाद ईवीएम से क्या नतीजा निकलेगा, यह गोपनीय है, क्योंकि कोई भी यह भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि भारतीय मतदाता किस तरह से मतदान करेंगे। मान लीजिए कि मतदाताओं ने इस बार भाजपा को कम वोट दिए और कुछ अन्य पार्टियां लोकसभा चुनाव जीत गईं, तो इससे इमरान खान के लिए मुश्किलें पैदा होंगी, जिन्हें कूटनीति का सबक लेने की जरूरत है।

अब जब भारत में पहले चरण का मतदान हो चुका है, पाकिस्तान में इमरान खान की इस वजह से भारी आलोचना हो रही है, क्योंकि उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह कह दिया कि भारत में नई सरकार बनाने के लिए मोदी चुनाव जीतेंगे। यानी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पूरी तरह आश्वस्त हैं कि नरेंद्र मोदी अगली सरकार बनाएंगे। हो सकता है कि उन्हें ऐसा बताया गया हो। पाकिस्तान में कुछ लोग यह कहते हुए उनकी आलोचना कर रहे हैं कि जब भारत में चुनाव हो रहे हैं, तब उनका इस तरह का बयान देना बचकाना है। आलोचक यह भी कह रहे हैं कि बेहद संवेदनशील स्थिति होने के दौरान इमरान खान को अपने पड़ोसी के बारे में बोलना बंद कर देना चाहिए। इस्लामाबाद में कुछ लोग हंसते हुए यह भी कह रहे हैं कि अब नरेंद्र मोदी को अपने मतदाताओं से कहना चाहिए कि उनकी पाकिस्तान नीति इतनी सफल रही है कि वहां के प्रधानमंत्री चाहते हैं कि मैं फिर से नई सरकार बनाऊं।

इमरान खान ने कहा कि अगर नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव जीतते हैं, तो भारत के साथ शांति वार्ता करने की अच्छी संभावना हो सकती है। वह कहते हैं, 'अगर भारत में अगली सरकार विपक्षी कांग्रेस के नेतृत्व में बनती है, तो कश्मीर मामले में पाकिस्तान के साथ समझौता न होने की आशंका ही ज्यादा है, क्योंकि वैसी स्थिति में वहां के दक्षिणपंथी उसका तीखा विरोध करेंगे। लेकिन इसके विपरीत अगर दक्षिणपंथी पार्टी भाजपा चुनाव जीतती है, तो कश्मीर मसले पर समझौता हो सकता है।'

इससे पहले भी इमरान खान की आलोचना हुई थी, जब उन्होंने दो बार यह सुझाव देकर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी को नाराज कर दिया था कि आम चुनाव से पहले काबुल में एक अंतरिम सरकार होनी चाहिए। पाकिस्तान के विपरीत अफगानिस्तान और भारत के संविधानों में अंतरिम सरकार का कोई प्रावधान नहीं है।

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) की वरिष्ठ उपाध्यक्ष और सांसद शेरी रहमान भी इमरान खान की आलोचना करते हुए कहती हैं, 'जब एक देश में चुनाव हो रहे हैं, तब दूसरे देश के प्रधानमंत्री द्वारा किसी व्यक्ति (मोदी) को वार्ता के मामले में वरीयता देना अनुचित है। पाकिस्तान देशों के साथ संबंध रखता है, व्यक्तियों के साथ नहीं। यह कहना, कि मोदी हमें अपनी बात रखने का बेहतर मौका देंगे, भारत में दूसरों के लिए दरवाजे बंद करना है।'

अंग्रेजी दैनिक द डॉन ने इमरान खान पर टिप्पणी करते हुए अपने संपादकीय में लिखा है कि एक दक्षिणपंथी पार्टी के साथ समझौते की संभावना का प्रधानमंत्री का विचार संभवतः भाजपा के साथ पाकिस्तानियों के पूर्व अनुभव पर आधारित रहे हों, जिसमें तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 1999 की लाहौर यात्रा भी शामिल है। फिर 2001 में दक्षिणपंथी भाजपा और पाकिस्तान के सैन्य राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ आगरा में समझौते के करीब पहुंच गए थे, लेकिन कश्मीर विवाद के शांतिपूर्ण समाधान की उम्मीदें विफल हो गई थीं। डॉन लिखता है कि 'यह बहुत ही नाजुक क्षण है और पाकिस्तान का न तो अफगानिस्तान के साथ और न ही भारत के साथ बेहतर रिश्ता है, दोनों अनिश्चितता में फंसे हैं। ऐसे में हमारे यहां शिखर पर बैठे शख्स से परिपक्व दृष्टिकोण की अपेक्षा है।'

पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी कहते हैं कि भारत और पाकिस्तान, दोनों पर इस बात की भारी जिम्मेदारी है कि वे इस क्षेत्र में रणनीतिक स्थिरता के समक्ष आने वाली चुनौतियों से निपटने की दिशा में काम करें। वह कहते हैं कि 'समृद्ध समाजों के निर्माण के लिए एक शांतिपूर्ण पड़ोस अनिवार्य शर्त है।'

चुनावों के बाद पाकिस्तान और भारत के द्विपक्षीय संबंधों के भविष्य की ओर देखते हुए मानवाधिकार मंत्री डॉ शिरीन मजारी कहती हैं कि मुद्दा संकट के प्रबंधन का नहीं हैं। हमें मूल रूप से बातचीत शुरू करने और मौजूदा संघर्षों को हल करने की आवश्यकता है। पाकिस्तान ने हमेशा कहा है कि बातचीत से विवाद का समाधान होना चाहिए।

पाकिस्तान में कुछ लोग कश्मीर के भविष्य को लेकर भी चिंतित हैं, क्योंकि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि यदि भाजपा सरकार फिर से चुनाव जीतकर सत्ता में आती है, तो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को खत्म कर दिया जाएगा, जो कश्मीर को विशेष दर्जा प्रदान करता है।
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