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कश्मीर पर दुविधा में पाकिस्तान, सीमित हैं विकल्प

मरिआना बाबर Updated Sat, 17 Aug 2019 09:51 AM IST
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कश्मीर
कश्मीर - फोटो : a
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जंग, हवाई हमले, नियंत्रण रेखा के पार गोलीबारी, राजनयिक संबंधों समेत द्विपक्षीय रिश्तों में खटास, व्यापारिक संबंधों में कटौती, तनाव और धमकी-ये भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के बीच आम बात है। इसी इतिहास को पिछले 72 वर्षों से दोनों पड़ोसी मुल्कों ने साझा किया है, यहां तक कि इसी हफ्ते जब दोनों मुल्कों ने औपनिवेशिक शासन से आजादी का जश्न मनाया तब भी।
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लेकिन सवाल उठता है कि क्या हम वाकई आजाद हैं। केवल गरीबी, ज्यादा आबादी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसी समस्याएं ही हमारे सामने नहीं हैं, बल्कि कश्मीर का मुद्दा भी हमें पिछले सात दशकों से परेशान करता रहा है। खैर, कश्मीर पर हम बाद में चर्चा करेंगे, लेकिन इन तमाम समस्याओं के बावजूद दोनों मुल्कों के बीच चार ऐसे समझौते हैं, जो युद्ध के बाद भी बचे हुए हैं। पहला है, सिंधु नदी जल संधि, जिसे अतीत के हमारे नेताओं ने अंजाम दिया था और जो सिंधु के निचले बहाव क्षेत्र में स्थित पाकिस्तान को समान मात्रा में पानी वितरण की अनुमति देता है। अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार पाकिस्तान को उसका हिस्सा दिया जाना चाहिए। पिछले कुछ वर्षों से भाजपा सरकार ने धमकी दी है कि पाकिस्तान को पानी देना बंद कर दिया जाएगा। इसका कारण जो सुनने को मिला, वह यह कि पाकिस्तान सिंधु नदी का काफी जल बर्बाद कर देता है, जो दक्षिण पाकिस्तान में वापस समुद्र में मिल जाता है। धमकियों के बावजूद पाकिस्तान में ऐसे कई लोग हैं, जो कहते हैं कि दोनों मुल्कों को मिल-जुलकर काम करना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि विशेष रूप से पानी बर्बाद न हो, क्योंकि भारत के पास इस संबंध में उन्नत प्रौद्योगिकी और अनुभव, दोनों है।

दूसरा समझौता, जो कश्मीर को लेकर वर्तमान कड़वाहट के बावजूद बचा हुआ है, वह है करतारपुर गलियारा, जिस पर सीमा के दोनों ओर पूरी गति से काम चल रहा है। यह खुला गलियारा भारत के सिख तीर्थयात्रियों को गुरुद्वारा दरबार साहिब तक आसान पहुंच प्रदान करेगा। पाकिस्तान के योजना एवं विकास मंत्री खुसरो बख्तियार ने कहा कि 'पाकिस्तान इस क्षेत्र में शांति को बढ़ावा देने और भारत सहित अपने सभी पड़ोसियों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।'

असल में धार्मिक पर्यटन ने इस समझौते को बचा लिया है और मुझे पूरा यकीन है कि द्विपक्षीय संबंध कितने भी बुरे क्यों न हों, इस साल के अंत में पाकिस्तान भारत और दुनिया भर से आने वाले सिख तीर्थयात्रियों का स्वागत करेगा। करतारपुर गलियारे से आने वाले भारतीय बिना वीजा के आएंगे, लेकिन उनके पास आधिकारिक दस्तावेज होंगे। नवंबर में उस विशेष दिन हजारों सिख तीर्थयात्री पाकिस्तान में प्रवेश करेंगे, जो मानेंगे कि दोनों पड़ोसी मुल्कों के बीच युद्ध जैसे हालात हैं।

तीसरा, हम अब भी दोनों तरफ के बदकिस्मत कैदियों को रिहा कर रहे हैं। इस हफ्ते पाकिस्तान ने सौ भारतीय कैदियों को रिहा किया, जिनमें अधिकांश मछुआरे थे। इनमें से बहुत से ऐसे हैं, जो बिना यह जाने सीमा पार कर गए कि वे दूसरे मुल्क में कदम रख रहे हैं। और अंत में हर साल एक जनवरी को दोनों मुल्क अपने-अपने परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची एक-दूसरे को सौंपते हैं। भले ही पाकिस्तान एवं भारत के आम लोग इससे अनजान होते हैं, लेकिन दोनों मुल्कों की सरकारों को पता होता है कि हमारे ये प्रतिष्ठान कहां हैं, ताकि परमाणु टकराव से बचा जा सके, जो भारी आपदा का कारण बन सकता है।

अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कश्मीर के संबंध में बदलावों की घोषणा के बारे में बात करते हैं। हालांकि पाकिस्तान को एहसास था कि मोदी इसके संबंध में कोई कदम उठा सकते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने चुनाव प्रचार के दौरान कश्मीर में सांविधानिक बदलाव के बारे में बात की थी। लेकिन जब यह घोषणा हुई, तो उसने पाकिस्तान की सरकार और सेना समेत हर किसी को हैरान कर दिया। स्पष्ट कहें, तो अब पाकिस्तान के पास दो ही विकल्प हैं। एक तो यह कि वह इस मसले को लेकर आक्रामक कूटनीति शुरू करे और वैश्विक शक्तियों के सामने अपने पक्ष में भारी पैरवी करे। जैसा कि उसने इस हफ्ते किया भी है, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की शरण में जाकर। लेकिन ऐसा नहीं है कि दुनिया के देशों को, दशकों से कश्मीर में क्या हो रहा है, उसके बारे में पता नहीं है।

घाटी में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराया जाता रहा है। लेकिन वास्तविकता यह है कि ये सभी देश अपने राष्ट्रीय हितों को ऊपर रखते हैं और उनके भारत के साथ मजबूत व्यापारिक संबंध हैं। इस्लामी सहयोग संगठन के एक भी मुल्क ने भारत के साथ अपने व्यापारिक रिश्ते को खत्म नहीं किया, हालांकि वे कश्मीर में मुस्लिम बहुल आबादी का समर्थन करते हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने तो पहले ही पाकिस्तान को चेता दिया है कि उन्हें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से उम्मीद नहीं है कि वह भारत को कश्मीर के संबंध में किए फैसलों पर आगे बढ़ने से रोकेगा।

पाकिस्तान के पास दूसरा विकल्प है-युद्ध। लेकिन शुक्र है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने युद्ध से इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि अगर भारत की ओर से कोई हमला होता है, तो उसका पलटवार किया जाएगा। दिलचस्प बात यह है कि इमरान खान ने हाल ही में अपनी वाशिंगटन यात्रा के दौरान कहा कि पाकिस्तान जिहादियों को कश्मीर में भेजने की नीति को आगे नहीं बढ़ाएगा। इस तरह से उन्होंने स्वीकार किया कि अतीत में जिहादियों को सीमा पार भारत भेजा गया था। इसका कारण उन्होंने यह बताया कि इस नीति ने कश्मीरियों की मदद करने से ज्यादा पाकिस्तान को नुकसान पहुंचाया।

यह अनुमान लगाना कठिन है कि भारत की इस ताजा कार्रवाई का परिणाम क्या होगा। अभी सबकी नजरें भारत के सर्वोच्च न्यायालय पर लगी हुई हैं और देखने वाली बात होगी कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का मोदी सरकार कैसे पालन करेगी। फिलहाल कश्मीर में जगह-जगह कर्फ्यू लगे हैं और संचार व्यवस्था भी कुछ हद तक बाधित है। इन प्रतिबंधों के हटने के बाद वहां कैसे हालात होंगे, यह अनुमान लगाना भी कठिन है। हर कोई यही चाहता है कि क्षेत्र में शांति कायम हो।
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