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संकट में पाकिस्तानी मीडिया

mariana babarमरिआना बाबर Updated Thu, 14 Feb 2019 06:33 PM IST
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प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक, दोनों मीडिया ने दुनिया को इससे पहले शायद ही कभी हिलाया होगा। मीडिया की ताकत का प्रभाव कभी ऐसा नहीं था, जैसा कि इन दिनों देखा जा रहा है। यही कारण है कि दुनिया भर की राजधानियों में सरकारें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने की कोशिश कर रही हैं। इस हफ्ते इस्लामाबाद में एक टीवी एंकर को उनके घर से गिरफ्तार किया गया और हथकड़ी लगाकर ले जाया गया। उनका गुनाह यही था कि उन्होंने कथित तौर पर मीडिया के कुछ नियमों का उल्लंघन किया था। बाद में पत्रकारों के व्यापक हंगामे और सोशल मीडिया पर अभियान के बाद सरकार दबाव में आई और फिर उन्हें छोड़ दिया गया।
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पाकिस्तान में सुरक्षा, नफरत और राष्ट्रीय हित के नाम पर बने कुछ कानून दोधारी तलवार हैं, क्योंकि सुरक्षा एवं राष्ट्रीय हित के नाम पर उनकी व्याख्या सरकार द्वारा किसी भी तरह से मीडिया के खिलाफ की जा सकती है। पाकिस्तान में मीडिया का गला घोंटने की कोशिश 2017 में ही की गई थी, लेकिन तब पत्रकारों एवं नागरिक समूह के सदस्यों ने पलटवार किया था। इसलिए पिछले वर्ष सत्ता में आने के बाद जब पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ (पीटीआई) सरकार ने एक बार फिर मीडिया का दमन करने की कोशिश की, तो लोगों को हैरानी हुई। इस कदम का समर्थन करने के लिए कोई भी आगे नहीं आया, इसलिए सरकार अब नए कानून लाने की कोशिश कर रही है। बदलाव के लिए मीडिया एकजुट हो गया है और सभी अखबारों के मालिकों, संपादकों और पत्रकारों ने सरकार के प्रयास को खारिज कर दिया है और सरकार को सभी हितधारकों से परामर्श लेने के लिए कहा है। जब नवाज शरीफ ने इन मीडिया कानूनों को लाने की कोशिश की थी, तो उनका काफी विरोध हुआ था, लेकिन वह रुके नहीं और आज मीडिया को बेहद खतरा महसूस हो रहा है।

यहां के वरिष्ठ पत्रकारों का हमेशा से यह विचार रहा है कि एक लोकतांत्रिक सरकार में मीडिया को स्व-नियामक होना चाहिए, लेकिन यहां की किसी भी सरकार के पास इसकी अनुमति देने के लिए पर्याप्त आत्मविश्वास नहीं रहा, क्योंकि वे मानती हैं कि उन्हें मीडिया पर नियंत्रण करने का हर अधिकार है। भयानक बर्बर अपराध के कारण सऊदी राजघराने द्वारा जमाल खशोगी की हत्या लगातार सुर्खियों में है। इस तरह तड़पाकर मारे जाने के बारे में किसी ने कभी सुना नहीं होगा, निहत्थे पत्रकार को तो निश्चित रूप से नहीं। जहां समाज ने एक महान पत्रकार को खो दिया, वहीं उनके हत्यारे खुलेआम घूम रहे हैं।

सेंटर फॉर लॉ ऐंड डेमोक्रेसी के कार्यकारी निदेशक टोबी मेंडल ने प्रस्तावित पाकिस्तानी कानून की आलोचनात्मक प्रशंसा की, तो पाकिस्तान मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी ने कहा कि अगर पाकिस्तान मीडिया के लिए अपनी नियामक प्रणाली में सुधार करने जा रही है, तो उसे इस प्रणाली की महत्वपूर्ण खामियों को दूर करना चाहिए, जैसे अखबारों के लिए लाइसेंस की आवश्यकता। यह सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत प्रतिबद्धता दिखाई जानी चाहिए कि कोई भी नियामक निकाय सरकारी दबाव से स्वतंत्र है, साथ ही साथ मीडिया क्षेत्र स्वयं को विनियमित करने के लिए जिम्मेदार है। उन्होंने यह भी सलाह दी कि संहिता को कानून में ही निर्धारित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उसे मीडिया के खिलाड़ियों और अन्य इच्छुक हितसाधकों के साथ गहन परामर्श कर पर्यवेक्षण निकाय पर विकसित करने के लिए छोड़ देना चाहिए। कम से कम प्रिंट मीडिया के लिए शिकायत के लिए संस्थागत संरचना को महत्वपूर्ण मीडिया भागीदारी के साथ एक सह-नियामक दृष्टिकोण प्रतिबिंबित करना चाहिए। महत्वपूर्ण यह भी है कि प्रिंट एवं ब्रॉडकास्ट मीडिया के लिए अलग-अलग संहिता बनाई जानी चाहिए और इस पर भी सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए कि डिजिटल मीडिया के मुद्दों को इससे कैसे निपटा जा सकता है।

पीटीआई सरकार ने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को विज्ञापन देना बंद कर दिया, जिसने पाकिस्तानी मीडिया को बुरी तरह प्रभावित किया। टीवी से जहां कई एंकरों को हटा दिया गया, वहीं अंग्रेजी और उर्दू के अखबारों से पत्रकारों को निकाल दिया गया। वक्त टीवी तो पूरी तरह बंद हो गया और कई अन्य छोटे टीवी चैनल के बंद होने की आशंका है।

कई अखबारों ने पृष्ठों में कटौती की है, क्योंकि न्यूजप्रिंट आयातित और महंगे होते हैं। अंग्रेजी दैनिकों ने सभी कर्मचारियों के वेतन में 40 फीसदी की कटौती का आदेश दिया है, जबकि कई टीवी एंकरों ने नौकरी बचाने के लिए वेतन में कटौती स्वीकार कर ली है।
 
 अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मानवाधिकार कार्यकर्ता आई ए रहमान कहते हैं कि अस्तित्व के लिए प्रगति और पुनर्प्राप्ति का रास्ता व्यापक लोकतंत्र, खुलापन, स्वतंत्र विमर्श और असंतुष्टों के प्रति अधिकतम सहिष्णुता में निहित है, न कि अधिनायकवाद, बंद शासन, विचारों पर नियंत्रण और असंतुष्टों के दमन में। दिवंगत अस्मा जहांगीर के साथ वह हमेशा पाकिस्तान में स्वतंत्र मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर रहे। केवल तानाशाही के वक्त ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सरकारों के दौरान भी हमेशा मीडिया का मजाक उड़ाया गया है।
 
आई ए रहमान पीटीआई सरकार द्वारा वर्तमान मीडिया कानूनों में संशोधन के प्रयासों के बारे में बताते हैं-प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया को रोकने के लिए एक कानून के प्रस्ताव को मंजूरी देकर, संघीय कैबिनेट ने संसद को परीक्षा में डाल दिया है। क्या यह मीडिया पर पूर्ण कार्यकारी नियंत्रण की अनुमति देगी, या यह मीडिया और लोगों की सबसे बुनियादी स्वतंत्रता की रक्षा करेगी-जो लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना के लिए भी आवश्यक शर्तें हैं?
 
वे आगे तर्क देते हैं कि भारत-पाकिस्तान उपमहाद्वीप में प्रेस के दो शताब्दी पुराने इतिहास के दौरान, प्रकाशन के अधिकार को कभी भी अस्वीकार नहीं किया गया है। पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया, प्रतिभूतियों की मांग की गई और उन्हें जब्त कर लिया गया, और प्रिंटिंग प्रेसों को सील कर दिया गया, लेकिन घोषणाओं के माध्यम से प्रकाशक, संपादक और प्रिंटर की पहचान करने के बाद प्रकाशन के अधिकार को कभी खत्म नहीं किया गया।
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