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सबरीमाला का सियासी संदेश

नीरजा चौधरी Updated Tue, 23 Oct 2018 06:04 PM IST
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सबरीमाला
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सबरीमाला के मुद्दे ने केरल में भाजपा को पैर पसारने में मदद की है। यहां पहाड़ी में अयप्पा का सुप्रसिद्ध मंदिर है, लेकिन पार्टी के लिए इस मुद्दे की उपयोगिता इस दक्षिणी राज्य से बाहर भी है। इसके बहाने एक बार फिर भाजपा ने महिलाओं के सांविधानिक अधिकार या इन अधिकारों को कायम रखने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर विरोध जताकर खुद को हिंदू परंपराओं और प्रथाओं के हिमायती के रूप में दर्शाया है। इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का विरोध करके उसने हिंदुओं को संगठित किया है, जो पार्टी का स्वीकार्य लक्ष्य है और वोट हासिल करने का आजमाया हुआ नुस्खा है।
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हालांकि इस पर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व और स्थानीय इकाई के रुख में अंतर है। स्थानीय इकाई सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ है, जिसमें रजस्वला की उम्र वाली दस से पचास वर्ष की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की इजाजत दी गई है। विरोध प्रदर्शन में महिलाएं भी बड़ी संख्या में शामिल थीं और यह इतना तीव्र था कि प्रदर्शनकारियों ने एक भी महिला को मंदिर में प्रवेश करने नहीं दिया।

अमित शाह ने अक्सर केरल को भाजपा के लिए उर्वर जमीन बताया है। सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने पार्टी को वह मौका दे दिया, जिसकी वह तलाश कर रही थी। हालांकि मंदिर में प्रवेश का कुछ विरोध वास्तविक है, स्थिति का लाभ उठाने के लिए इनमें से कुछ को स्पष्ट रूप से उकसाया गया है। उन राज्यों में पैर पसारने के लिए पार्टी विशेष प्रयास कर रही है, जहां पहले उसका अस्तित्व नहीं था और पश्चिम बंगाल, ओडिशा, पूर्वोत्तर के सातों राज्यों की तरह केरल भी उनमें से एक है।

परंपरा के नाम पर महिलाओं के मंदिर प्रवेश को छोड़कर केरल से बाहर के सवर्ण हिंदुओं को भी यह अच्छी तरह से प्रभावित कर रहा है। उत्तर भारत में सवर्ण जातियां, बीती सदी के अस्सी के दशक के राम मंदिर निर्माण आंदोलन के समय से भाजपा की कट्टर समर्थक रही हैं, लेकिन अब वे भाजपा के प्रति मोहभंग का संकेत दे रही हैं। इसका एक कारण राजग सरकार की खुली दलित समर्थक नीतियां हैं। उदाहरण के लिए, अत्याचार विरोधी कानून में दलित समर्थक प्रावधानों को फिर से बहाल करना, जिसमें प्रारंभिक जांच होने तक गिरफ्तारी के प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया था। इसके कारण राजस्थान और मध्य प्रदेश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए।

हालांकि भाजपा सरकार की नीतियों से नाराज सवर्ण जाति के कुछ लोगों ने कहा कि विपक्ष में कोई विकल्प न होने की स्थिति में वे भाजपा को ही वोट देंगे, लेकिन 2019 में वे ऐसा भारी मन के साथ करेंगे। जब उनसे पूछा गया कि क्यों, तो उनका जवाब था, क्योंकि आखिरकार हम हिंदू हैं। पिछले कुछ वर्षों से हिंदुओं का हिंदूकरण चल रहा है, जिस पर भाजपा ने ध्यान केंद्रित किया है और अब दूसरी विफलताओं को खत्म करने के लिए वह इस पर जोर देगी। यही हिंदू पहचान है, जिसे सबरीमाला ने और उभारा है। केरल में हालात को देखते हुए विजयन सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का समर्थन किया है, जिसकी अपेक्षा किसी सांविधानिक रूप से निर्वाचित सरकार से होती है, लेकिन वह कड़ा रुख अपनाने में सक्षम नहीं है। मंदिर में महिलाओं का प्रवेश सुनिश्चित करना उसकी जिम्मेदारी है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य बना दिया है। 'हिंदू भावना' को लेकर चिंतित कांग्रेस भी भाजपा से अलग कोई कड़ा रुख अपनाने में सक्षम नहीं है।

सबरीमाला सिर्फ एक मुद्दा है। भाजपा ने निश्चय ही आकलन किया होगा कि जम्मू एवं कश्मीर में अनुच्छेद 35 ए से संबंधित विवाद का भी ऐसा ही असर होगा। अनुच्छेद 370 की तरह अनुच्छेद 35 ए भी (जिसने घाटी में नेशनल कांफ्रेस और पीडीपी को स्थानीय चुनाव का बहिष्कार करने के लिए प्रेरित किया) जम्मू एवं कश्मीर के विशेष चरित्र पर जोर देता है। ऐसा कहे बगैर दिए गए संदर्भ में यह मुस्लिम बहुल घाटी और हिंदू बहुल जम्मू के बीच विभाजन को रेखांकित करता है और हिंदू-मुस्लिम विभाजन से संबंधित किसी भी मुद्दे का भारत के वृहत हिस्से के लिए अपना संदेश होता है। अयोध्या में मंदिर निर्माण की नई मांग के पीछे भी यही मामला है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने मांग की है कि मंदिर निर्माण के लिए सरकार नया अध्यादेश लाए, जिसके निर्माण में अब कोई देरी नहीं होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें, तो इसके लिए अब अदालत के फैसले का इंतजार नहीं करना चाहिए, जो अब तक भाजपा का रुख था। सुप्रीम कोर्ट मंदिर मामले की सुनवाई 29 अक्तूबर से शुरू करेगी।

 मंदिर मुद्दे को केंद्र में लाकर संघ परिवार अपने मूल मतदाताओं को खुश रखने की कोशिश कर रहा है और ऑनलाइन मीडिया उसकी असहायता को दर्शा रहा है। कई लोगों का मानना है कि अयोध्या मामला अब उतना वोट बटोरने लायक नहीं रह गया है, जब तक कि इसके आसपास प्रतिरोध नहीं बनता। ऐसा होने के लिए एक बार फिर बड़ी संख्या में हिंदुओं को उत्तेजित करना चाहिए।

भाजपा सबरीमाला और सबरीमाला जैसे अन्य मुद्दों को आने वाले दिनों में भुनाने की कोशिश करेगी। तीन तलाक अध्यादेश को कानून में तब्दील करने की कोशिश की तरह। इससे कांग्रेस बंध जाएगी। एक ओर मुस्लिम महिलाओं से जुड़े सुधार उपायों को लेकर सवाल होंगे, तो दूसरी ओर मुस्लिम समाज के पुरुषों की चिल्लाहट से निपटने की चुनौती। असल में कुछ मुस्लिम महिलाएं भी मुस्लिम पुरुषों के नजरिये को सही मानती हैं, जैसा कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के संदर्भ में हुआ।

जाहिर है, भाजपा के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि एक तरफ तो वह तीन तलाक जैसे सुधार के उपायों का समर्थन करती है, दूसरी तरफ सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश का विरोध क्यों करती है। वह तर्क दे रही है कि सबरीमाला मामले में कोर्ट के फैसले से परंपरा को नहीं बदला जा सकता है। लेकिन लंबी परंपरा का तर्क तीन तलाक मामले में भी उद्धृत किया जा सकता है।
 
लेकिन फिर मुझे लगता है कि राजनीति में तर्क हमेशा काम नहीं करता है। और चुनावी युद्ध में सब कुछ जायज है!
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