अच्छी होगी फसल मतदान की!

सुभाषिनी अली Updated Thu, 26 Sep 2013 08:41 PM IST
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उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में सात और आठ सितंबर को जो कुछ भी हुआ, उसके बारे में कुछ लोगों ने दावा किया कि वह बेटियों और बहुओं की लाज बचाने के लिए किया गया। इस पर दो राय नहीं हो सकती कि मुजफ्फरनगर की बेटियां और बहुएं बेहद असुरक्षित हैं। मुजफ्फरनगर भारत के उन जिलों में से एक है, जहां लिंगानुपात बहुत ही खराब है और जहां कन्या भ्रूणहत्या बड़े पैमाने पर होती है। 2011 की जनगणना के अनुसार, इस जिले में 1,000 पुरुषों की तुलना में सिर्फ 889 महिलाएं हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 1,000 पुरुषों के मुकाबले 940 महिलाओं का है।
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इस रिपोर्ट के अनुसार, शून्य से छह वर्ष के बीच 1,000 बच्चों की तुलना में सिर्फ 863 बच्चियां हैं। इसका मतलब यह हुआ कि यहां बच्चियों को जन्म लेने ही नहीं दिया जा रहा है। जिले में महिला साक्षरता के आंकड़े भी उनके साथ होने वाले भेदभाव की तस्वीर पेश करते हैं। 2011 की जनगणना सर्वेक्षण के अनुसार, जिले की औसत साक्षरता दर 69.12 फीसदी है। इसमें पुरुषों की दर 78.44 फीसदी और महिलाओं की सिर्फ 58.69 फीसदी है, जोकि 2001 की तुलना में नौ फीसदी अधिक है। ध्यान देने की बात है कि यहां अधिकांश लड़कियों की पढ़ाई माध्यमिक के बाद समाप्त हो जाती है।
कुछ लड़कियां घर पर रहकर पढ़ लेती हैं, लेकिन कॉलेज जाने का मौका बहुत कम को नसीब होता है। इसका कारण गरीबी नहीं है, क्योंकि गन्ने की खेती और चीनी मिलों के लिए मशहूर मुजफ्फरनगर एक संपन्न जिला है, मगर पुराने ढर्रे से निकल नहीं पा रहा है। यहां के परिवार के लोगों का दृष्टिकोण है कि उनकी अपनी, उनके परिवार की और उनकी बिरादरी की इज्जत उनकी बिरादरी और परिवार की औरतों, लड़कियों और बच्चियों के शरीर में बसती है। और इस इज्जत को बचाए रखने के लिए लड़कियों और महिलाओं को सख्त नियंत्रण और बंधन में रखने की आवश्यकता है!
इस बात की पुष्टि करते हुए मुजफ्फरनगर अपना नाम उन दिलों में दर्ज करता है, जिनमें 'इज्जत के नाम पर हत्या' (ऑनर किलिंग) का बोलबाला है। जो लड़की अपनी पसंद से किसी दूसरी जाति के लड़के या अपने ही गोत्र या गांव के लड़के से शादी करने की जुर्रत करती है, उसे अपने घर वालों के हाथों मार दिए जाने का खतरा रहता है। इस जिले की ही नहीं, आसपास के जिलों की लड़कियों और महिलाओं की यही कहानी है। वे बहुत असुरक्षित हैं। लेकिन क्या सात और आठ सितंबर की घटनाएं वास्तव में उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए घटी थीं और क्या अब उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर दी गई है?

इस घटना के बाद अलग-अलग तरह के दावे किए गए हैं। कहा जाता है कि जो कुछ हुआ, वह लड़कियों के साथ होने वाली छेड़छाड़ की घटनाओं के कारण हुआ। मुजफ्फरनगर के कवाल गांव के मालिकपुर माजरा के रविंदर कुमार और उनके भाई बिशन सिंह की लड़कियों के साथ गांव का ही शाहनवाज छेड़छाड़ करता था। इसी बात को लेकर इन दोनों भाइयों के बेटों-गौरव और सचिन ने शाहनवाज के साथ झगड़ा किया, जिसमें उसकी मौत हो गई, बदले में शाहनवाज के मोहल्ले के लड़कों ने इन दोनों भाइयों को मार दिया। 27 अगस्त की घटना के कई वर्णन सुनने को मिलेंगे, लेकिन जो भी सही हो, नतीजे के तौर पर तीन नौजवानों (गौरव, सचिन और शाहनवाज) की मौत हुई।

27 अगस्त और सात सितंबर के बीच, हर रोज कोई न कोई घटना घटती थी, जो दोनों समुदायों के बीच की खाई को और गहरा करती थी, लेकिन सरकार और प्रशासन मूकदर्शक ही बने रहे और बहुसंख्यक समुदाय के बीच चलाए जा रहे 'बहू-बेटी बचाओ' का अभियान आग की तरह इलाके में फैला और सात सितंबर की बहू-बेटी बचाओ महापंचायत के मौके पर अभूतपूर्व भीड़ जुटी और बहू-बेटियों के लिए खतरे के रूप में अल्पसंख्यक समुदाय को ही चिह्नित करने का काम जोश-खरोश के साथ हुआ। उसी रात कई गांवों में आगजनी, लूट और कत्ल का तांडव शुरू हुआ और पचास हजार से अधिक लोगों ने अपने घरों से पलायन किया।

अजीब बात तो यह है कि ईद के दिन, नौ अगस्त को तांवली गांव में प्रदीप नाम के युवक ने इदरीस नाम के व्यक्ति को गोली मार दी थी। इदरीस की बेटी को प्रदीप छेड़ता था और इदरीस के मना करने पर उसने बदला लेने की बात कही थी। आनन-फानन में प्रशासन ने प्रदीप और उसके दो साथियों को गिरफ्तार कर लिया। मगर तब बहू-बेटियों की सुरक्षा के लिए कोई अभियान नहीं चला।

27 अगस्त और नौ अगस्त की घटनाओं का असर यह हुआ कि इलाके की हजारों लड़कियों के स्कूल जाने के सपने पर पानी फिर गया है। इनमें दोनों समुदायों की लड़कियां हैं। जो डर अगस्त के महीने तक छिट-पुट बादलों की तरह आता-जाता था, अब घनी काली घटा बनकर पूरे इलाके पर छाया है। जो कैंपों में हैं, वे तो सुरक्षा का एहसास भूल ही गई हैं, और जो अपने घरों में हैं, उनके जेहन में भी गहरा भय है। औरतों और बच्चियों के शरीरों पर बर्बरता के घाव अपना असर दूर-दूर तक फैला रहे हैं।

न महिलाओं की सुरक्षा के लिए यह सब कराया गया और न ही उनकी सुरक्षा इन सबके बाद बढ़ी है। बढ़ा है डर और नफरत। शायद मकसद भी यही था। महिलाओं की सुरक्षा की लड़ाई उनकी असुरक्षा का सांप्रदायिकीकरण और राजनीतिकरण से संभव ही नहीं है।

गोरख पांडे ने ठीक ही कहा था, इस साल दंगा बहुत बड़ा था, बहुत हुई है खून की बारिश, अगले साल, अच्छी होगी फसल मतदान की।
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