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कांग्रेस का पुनरुद्धार प्रियंका की चुनौती

नीरजा चौधरी Updated Wed, 13 Feb 2019 07:45 PM IST
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प्रियंका का रोड शो
प्रियंका का रोड शो
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कांग्रेस की महासचिव नियुक्त किए जाने के बाद लखनऊ में अपने पहले रोड शो के दौरान प्रियंका गांधी वाड्रा ने जिस तरह की उत्साह भरी प्रतिक्रिया का आह्वान किया, वह अप्रत्याशित नहीं था। सक्रिय राजनीति में उनके प्रवेश ने उत्तर प्रदेश में तीन दशकों से मरणासन्न पड़ी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा किया है। पिछले पंद्रह वर्षों में ऐसे कई अवसर आए, जब पार्टी कार्यकर्ता और नेताओं ने प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में लाने के लिए सोनिया गांधी को उकसाया था, ताकि पार्टी को पुनर्जीवित किया जा सके। उनका रोड शो नेहरू परिवार के गृह राज्य में था। यह तो हम अगले दो-तीन हफ्तों में जान पाएंगे कि प्रियंका लोकप्रियता के किस स्तर को छू पाईं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि लोगों की प्रतिक्रिया को आगामी लोकसभा में किस हद तक वोटों में बदला जा सकेगा।
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लेकिन यह स्वीकार किया जा चुका है कि चाहे जो भी हो, वह पार्टी की किस्मत में बदलाव लाएंगी। टीवी चैनलों ने पांच-छह घंटे तक उनके रोड शो को दिखाया, जो दर्शाता है कि वे जानते थे कि इससे उनकी टीआरपी बढ़ेगी। मोदी-योगी के जैकेट विज्ञापनों ने सभी प्रमुख अखबारों में प्रियंका को पहले पृष्ठ पर आने से रोक दिया। इससे भी पता चलता है कि भाजपा वाइल्ड कार्ड के रूप में उनके उभरने की संभावना से बेखबर नहीं है। उतनी ही दिलचस्प बात यह है कि 2019 के लोकसभा चुनाव पर उनके असर को जानने से पहले सक्रिय राजनीति में उनके प्रवेश होते ही कुछ व्यवसायियों ने उनके करीबी कुछ कांग्रेसी नेताओं से संपर्क किया है, जो पिछले पांच वर्षों में औद्योगिक घरानों के लोगों से अलग-थलग थे!

प्रियंका उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पुनरुद्धार की शुरुआत कर सकती हैं, यह अलग बात है कि वह 2019 के चुनाव पर कितना असर डाल पाएंगी। राहुल ने स्पष्ट किया है कि उन्हें और उनके साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाए गए ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्य में कांग्रेस को 2022 तक पुनर्जीवित करने के लिए पूरे अधिकार दिए गए हैं।
 
प्रियंका ने सक्रिय राजनीति में तब प्रवेश किया है, जब राहुल गांधी अपनी सबसे मजबूत स्थिति में हैं, उन्होंने तीन हिंदी प्रदेशों में जीत हासिल की है, और ऐसे कदम उठाए, जो कामयाब साबित हुए, जैसे पार्टी के उन पुराने नेताओं के साथ शांति स्थापित करना, जो उन्हें स्वीकार करते हैं और वह उन नेताओं को। इसके अलावा उन्होंने मंदिरों का भ्रमण किया, जिससे हिंदुओं में प्रतिकूल भावना पैदा नहीं हुई, बल्कि पार्टी की मुस्लिम समर्थक छवि से उबरने में सहूलियत हुई या मोदी के खिलाफ लगातार तीखे हमलों के कारण वह विपक्षी खेमे में मजबूत स्तंभ बनकर उभरे। सक्रिय राजनीति में प्रियंका के प्रवेश का सबसे दिलचस्प पहलू है समय। यह दर्शाता है कि कांग्रेस ने मोदी को हराने के लक्ष्य के साथ ही अपने पुनरुद्धार को भी उतना ही महत्व देने का फैसला किया है।

राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन तभी दिखता है, जब फोटो खिंचाने के लिए नेता कतार में खड़े होते हैं, चाहे बंगलूरू, कोलकाता, या दिल्ली के जंतर मंतर पर हो। मगर इसका मतलब यह नहीं है कि सभी विपक्षी दलों ने 543 लोकसभा क्षेत्रों में एनडीए के खिलाफ एक ही उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विपक्षी दलों द्वारा राज्य स्तर पर गठबंधन किए जा रहे हैं। और इन सभी पार्टियों में भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी करने की क्षमता है।

भाजपा को अपने सहयोगियों को बनाए रखने के लिए पीछे हटना पड़ा है-बिहार में जदयू को उसने 17 सीटें दी हैं, जबकि 2014 के चुनाव में वह मात्र दो सीटें ही जीत पाई थी और उन 17 में से पांच सीटें पिछली बार भाजपा ने जीती थी। भाजपा की पुरानी सहयोगी शिवसेना 48 में से 23 लोकसभा सीटों, विधानसभा चुनाव में भाजपा से ज्यादा सीटें और यह सुनिश्चित करने के लिए एक साथ चुनाव की मांग कर रही है कि भाजपा इस सौदेबाजी पर टिकी हुई है। जाहिर है, दोनों के बीच गठबंधन 2019 के रण के नाम पर होगा।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रियंका समर्थित कांग्रेस के कूदने से सपा-बसपा गठबंधन पर क्या असर पड़ेगा? माना जाता है कि भाजपा को दोनों से नुकसान होगा-अगर कांग्रेस असंतुष्ट सवर्णों, खासकर ब्राह्मणों को अपने खेमे में ला सकती है, तो बसपा-सपा भी कुछ अल्पसंख्यक मतों को खींच सकती है। भले ही भाजपा को हराने के लिए मजबूत प्रत्याशी के पक्ष में स्वतः ध्रुवीकरण होने की बातें होती हैं, लेकिन कुछ भ्रम की स्थिति पैदा होना लाजिमी है। और इसका मतलब यह हो सकता है कि भाजपा को उन सीटों पर फायदा होगा, जहां कांटे का संघर्ष होगा। कुछ सर्वे के मुताबिक, सपा-बसपा गठबंधन उत्तर प्रदेश में 50 से 55 सीटें जीत सकती हैं और 71 सीटों से भाजपा को 25 से 28 सीटों पर ला सकती है। यह स्थिति उत्तर प्रदेश में है, जहां सबसे बड़ी लड़ाई लड़ी जाने वाली है।

निश्चित रूप से यह अब भी संभव है कि सपा, बसपा और कांग्रेस आंतरिक रूप से किसी तरह की सौदेबाजी कर लें और कुछ सीटों पर टकराव से बचने के लिए कमजोर प्रत्याशी खड़ा करने का पुराना फार्मूला अपनाएं। अखिलेश यादव से ज्यादा मायावती को कांग्रेस के साथ गठबंधन से समस्या है। उन्हें डर है कि अगर कांग्रेस ने पुनरुद्धार शुरू कर दिया, तो उनका दलित मतदाता, कहीं फिर से कांग्रेस के खेमे में न चला जाए, जैसा कि वर्षों पहले इंदिरा गांधी ने ब्राह्मण-दलित-मुस्लिम धुरी का सफल समायोजन किया था।

सक्रिय राजनीति में प्रियंका की छलांग कांग्रेस की उस जागरूकता का संकेत देती है कि पार्टी तब तक राष्ट्रीय खिलाड़ी नहीं बन सकती, जब तक कि उत्तर प्रदेश को फिर से नहीं जीत लेती। उन्हें उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लाभ को बढ़ाने के लिए उतारा गया है, क्योंकि पार्टी को पता है कि उसे 150 सीटें मिलेंगी, तभी वह 2019 में विपक्षी गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर पाएगी। यदि कांग्रेस 100 से 110 सीटों तक सिमट जाती है, तो पार्टी को एहसास है कि उसे किसी क्षेत्रीय क्षत्रप को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन करना होगा। और अगर मोदी के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार बनती है, तो उसे आज से ज्यादा मुखर होने की जरूरत होगी। इन तमाम हालात में अगर कांग्रेस सचमुच भाजपा को टक्कर देना चाहती है, तो उसे अपने पुनरुद्धार पर जोर देना होगा। जाहिर है, कांग्रेस भविष्य के लिए उतना ही जोर लगा रही है, जितना वर्तमान के लिए।
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