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क्या विरोध भी एक चुटकुला है !

sudheesh pachauriसुधीश पचौरी Updated Sat, 04 Jan 2020 03:40 AM IST
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नागरिकता कानून का विरोध
नागरिकता कानून का विरोध - फोटो : a
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नागरिकता कानून के विरोध के दौरान विरोध के कुछ एकदम नायाब तरीके भी दिखे। अति-समारोहित एक अंग्रेजी लेखिका ने लोगों से मजे-मजे में कहा कि जब वे आपका नाम पूछने आएं, तो गलत नाम बताओ। बिल्ला रंगा बताओ, कुंगफू कुत्ता बताओ। यह लेखिका द्वारा दिया गया एक ‘डिसरप्टिव'; विध्वंसक नुस्खा था। वह जब यह सब कह रहीं थीं, तो प्रकटतः अपनी सोशल मीडिया छाप व्यंग्य-वक्रता पर विहंस रही थीं और उनके इस मजाक को सुन-देखकर उनके आसपास खड़े समर्थक भी हंस रहे थे। नागरिकता कानून के विरोध का यह वह नया तरीका था, जो युवा विरोध के उतार के समय में ऐसे दिया जा रहा था, जैसे कोई क्रांतिकारी विचार हो! इन दिनों बहुत से क्रांतिकारी मसखरेपन को क्रांति का नया औजार समझते हैं कि हम एक तगड़ा जोक मार देंगे, तो वर्ग-शत्रु वहीं धराशायी हो जाएगा!
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नागरिकता कानून का जिनको विरोध करना था, वे जाड़े-पाले में भी विरोध करने आए। विरोध प्रदर्शन करने वाले युवा अपने पहले क्षणों में कुछ जेनुइन से लगे। बहुतों को लगा कि नाना कारणों से अरसे से संचित गुस्सा नागरिकता कानून व एनआरसी के आइडिया के विरोध के बहाने निकल रहा है, लेकिन जब वह उग्र हुआ या उसमें उग्रतावादी तत्व घुस गए और वह उतार पर आने लगा, तब एक सुबह ‘जिम्स ग्लब्स’ पहने लेखिका जी आईं और हम जैसे मूढ़-मतियों का मार्ग दर्शन करने लगीं कि विरोध करना हो, तो झूठ बोलना सीखो। विरोध के उतरने के बाद विरोध की सार्थकता और निरर्थकता का जायजा लिया जा सकता है और उन आशंकाओं की छानबीन बेहतर तरीके से की जा सकती है, जिनकी वजह से वह प्रकट हुआ था। अब सब मान रहे हैं कि वह विरोध संसद में पास हुए  नागरिकता कानून का जितना था, उससे कहीं अधिक आने वाले एनआरसी का था।

यह ‘डरे हुए का मनोविज्ञान’ था। असम का डर अफवाह बनकर यहां तक आ गया। लोग डरे और वह डर उनका गुस्सा बनकर फूटा। लेकिन ज्यों ही दलों ने इसे गोद लेने की कोशिश की, इसका तेज बिखर गया और रहा-सहा क्षोभ तब गिरा, जब विरोध को ज्ञानियों ने ‘चुटकुला’ बना दिया!

जिनको डंडे खाने थे, उनने खाए और जिनको मजा लेना था, वे सुरक्षित समय में विरोध को एक चुटकुले में बदलने के लिए बाद में आए। बहरहाल, इस मजेदार विरोध की असली परीक्षा तब सामने आएगी, जब जनगणना करने या नागरिकता के लिए सरकारी अमला आएगा और लेखिका का नाम पूछेगा, तो वह अपना क्या नाम बताएंगी? क्या वह वही नाम बताएंगी, जो उनके पासपोर्ट पर है अथवा अपना नाम ‘रंगा या बिल्ला’ या ‘कंगफू कुत्ता’ बताएंगी? जिस वर्ग से वह आती हैं, वहां इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका नाम क्या है, लेकिन जिन आम लोगों को उन्होंने झूठा नाम रखने की नसीहत दी है, उनका क्या होगा? अगर उन्होंने अपनी वल्दियत बदली, अपना पता झूठा दिया, तो उन्हें राशन कौन देगा? उनके आधार कार्ड का क्या होगा? उनकी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए जरूरी कागजों का क्या होगा? जिस समाज में कुल गोत्र के खाते उनके पंडितों के टेवों में अब भी हों, जिस समाज का हर आदमी अपने को किसी ऋषि के गोत्र से जोड़ने का आदी हो, वहां रंगा बिल्ला जैसे नाम वही रख सकते हैं, जो लेखिका की बिरादरी के बराबर हों। आम आदमी झूठ के इस ऐश को गवारा नहीं कर सकता! लेखिका को नहीं मालूम कि हमारी अधिसंख्य गरीब और वंचित जनता ‘सरकारी कागज’ को मजाक की चीज समझने की जगह उसे कानूनी कागजात की तरह समझती है और उसके मिल जाने पर अपने को एंपावर्ड समझती है। जिनके पास कुछ नहीं है, उनके पास किसी मनरेगा या किसी और सरकारी योजना का एक कागज हाथ लग जाए, तब उसके एंपावरमेंट के एहसास को देखिए! झूठ बुलवाकर आप उसे और कमजोर करना चाहती हैं। विरोध के नाम पर आम आदमी के साथ ऐसा छल क्यों?

अब हम इतनी नामी-गिरामी लेखिका जी से कैसे कहें कि मैडम, यह आपका अमेरिका नहीं है, जहां ऐसे मजाक नए किस्म के फैशन-स्टेटमेंट की तरह लिए जाते हैं। यहां तो अनंत ‘अचिह्नित’ लोग ‘चिह्नित’ होना चाहते हैं, ताकि उनको भी सरकारी राशन-पानी मिल सके।

ऐसे ही विरोध का एक और तरीका तिरुवनंतपुरम में देखने को मिला, जहां इतिहास-कांग्रेस में एक नामी मार्क्सवादी इतिहासकार केरल के राज्यपाल के ‘जनतांत्रिक संवाद’ के आग्रह मात्र पर तैश खा गए और उनकी ओर लपक उठे। वह तो उनको राज्यपाल के एडीसी ने बीच में रोक लिया, लेकिन वह नहीं माने और पलटकर फिर से राज्यपाल की ओर जाने लगे! उन्होंने राज्यपाल को टोकते हुए कहा कि उनको गांधी और कलाम का नाम लेने का कोई हक नहीं। उनको गोड्से का नाम लेना चाहिए! राज्यपाल ने तो नागरिकता कानून के खिलाफ सब सुना और जब ऐसे आरोपों का जवाब देने को हुए, तो इतिहासकार गुस्से से भरकर आक्रामक मुद्रा में आ गए और डिक्टेट करने लगे कि उनको क्या बोलना चाहिए, क्या नहीं ? माना कि राज्यपाल भाजपा सरकार द्वारा नियुक्त व्यक्ति हैं, जिनको आप पसंद नहीं करते। लेकिन बात पद की है, व्यक्ति की नहीं। आप पद का ही सम्मान करते। और फिर वह वहां जबर्दस्ती तो नहीं आए थे, औपचारिक बुलावे पर ही आए थे। इतिहास कांग्रेस के उद्घाटन में उनकी उपस्थिति एकदम औपचारिक ही थी!

ऐसे में क्या यह उचित न होता कि या तो आप उसे सिर्फ एक औपचारिक उद्घाटन ही बनाते, समकालीन राजनीति का अखाड़ा न बनाते और अगर बनाया था, तो राज्यसत्ता के प्रतीक होने के नाते राज्यपाल के जवाब को खामोशी से सुनते। और फिर, कई दिन तक चलने वाली इतिहास-कांग्रेस में नागरिकता कानून की रीति-नीति की खूब आलोचना करते। यह विरोध का कौन-सा जनतांत्रिक तरीका था कि आप राज्यपाल से तू तू मैं मैं पर आ गए? तर्क का जवाब तर्क से और बहस का बहस से दिया जाता है, और जवाब देने के लिए आपके पास कई दिन पड़े थे। आप सरकार और राज्यपाल की आलोचना करते,  लेकिन वैसा सीन पैदा करके तो आपने अपने मार्क्सवाद को ही लज्जित किया! अपनी इस असहिष्णुता से आपने उस जनतंत्र व संविधान को ही कमजोर किया, जिसे आप बचाने की इतनी फिक्र किया करते हैं। आपकी जगह अगर बीस-तीस साल का कोई युवक तैश खा गया होता, तो बात समझ में आती। लेकिन अस्सी-पार के होकर भी बच्चों जैसी हरकत करके आपने अपने आपको एक ‘चुटकुला’ जैसा बना डाला!
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