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Ramchandra Guhaरामचंद्र गुहा Updated Sun, 05 Apr 2020 01:26 AM IST
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जवाहर लाल नेहरू
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बरसों पहले नई दिल्ली के अभिलेखागार में काम करते हुए मुझे जवाहरलाल नेहरू द्वारा सी. राजगोपालाचारी को हाथ से लिखा एक छोटा पत्र मिला। यह 30 जुलाई, 1947 को लिखा गया था और इसमें लिखा था : 
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मेरे प्रिय राजाजी,
मैं आपको स्मरण करा रहा हूं कि आप षणमुखम शेट्टी से मुलाकात करें-यह काम जल्दी हो जाए। मैंने आंबेडकर से मुलाकात की है और वह तैयार हैं।  
आपका जवाहरलाल।

आज के पाठक जानना चाहेंगे कि इस पत्र का संदर्भ क्या था। 30 जुलाई, 1947 को भारत अपनी आजादी से महज दो हफ्ते दूर था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपने मंत्रिमंडल के गठन की तैयारी कर रहे थे। वल्लभभाई पटेल का नाम सबसे पहले इसमें जोड़ा गया; नेहरू के अपने शब्दों में वह मंत्रिमंडल का सबसे मजबूत स्तंभ बनने जा रहे थे। अन्य स्वाभाविक पसंद थे, वरिष्ठ कांग्रेस नेता मौलाना अबुल कलाम आजाद, राजेंद्र प्रसाद और राजकुमारी अमृत कौर।

हालांकि पटेल के साथ मशविरे और अपने गुरु महात्मा गांधी की सलाह पर नेहरू ने फैसला किया कि स्वतंत्र भारत का पहला मंत्रिमंडल समावेशी होना चाहिए और फिर उन्होंने अपनी कांग्रेस पार्टी से परे जाकर सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्कों को उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं को ध्यान में रखे बिना शामिल किया। नेहरू और पटेल जानते थे कि अंग्रेज भारत को जैसा छोड़ गए हैं वह अच्छी स्थिति में नहीं है। नए मंत्रिमंडल को धार्मिक विवाद, शरणार्थियों की तकलीफों, खाद्य संकट, अड़ियल रियासतों से निपटना था और नए संविधान के निर्माण को भी देखना था।


ऐसे विभिन्न तरह के और जटिल कार्यों को निपटाने के लिए नेहरू और पटेल ने महसूस किया कि मंत्रिमंडल के सहयोगियों का चुनाव करते हुए वे पक्षपाती विचारों से बंधे नहीं रह सकते। 1930 के दशक और 1940 के दशक में बी आर आंबेडकर कांग्रेस के तीखे राजनीतिक विरोधी थे। यहां तक कि 1946 में उन्होंने इस पार्टी और उसके महान नेता पर एक किताब प्रकाशित कर तेज हमला किया था, जिसका नाम था, व्हाट गांधी ऐंड कांग्रेस हैव डन टू द अनटचेबल्स ( गांधी और कांग्रेस ने अस्पृश्यों के लिए क्या किया)। और फिर भी, चूंकि देश को एकजुट रखना था, इसलिए कांग्रेस ने आंबेडकर से संपर्क किया और उन्हें कानून मंत्री के पद की पेशकश की।

आंबेडकर की सहमति मिलने के बाद नेहरू अब राजगोपालाचारी से उनके तमिल सहयोगी आर के षणमुखम शेट्टी को भी मंत्रिमंडल में शामिल होने के वास्ते राजी करने के लिए कह रहे थे। जस्टिस पार्टी के एक नेता के तौर पर शेट्टी कांग्रेस के तीखे आलोचक थे। लेकिन तब वह भारत में सर्वश्रेष्ठ वित्तीय समझ रखने वालों में से एक थे, जैसा कि आंबेडकर उस समय विधि संबंधी सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्कों में से एक थे। कटुता को दरकिनार कर शेट्टी भारत के पहले वित्त मंत्री बने।

स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में हिंदू महासभा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अकाली दल के बल्देव सिंह को भी शामिल किया गया, जो कि उनकी ही तरह कांग्रेस की अगुआई वाले स्वतंत्रता संघर्ष के कटु विरोधी थे। मंत्रिमंडल के अन्य पद व्यवसायी सी एच भाभा और प्रशासक एन गोपालस्वामी आयंगर को दिए गए, जिनके पहले पार्टी से किसी तरह का संबंध नहीं था।

आखिर मैं पिछले इतिहास को क्यों याद कर रहा हूं? क्योंकि अतीत वर्तमान से संवाद कर रहा है। कोविड-19 के रूप में देश विभाजन के बाद की संभवतः सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है। हमारे यहां वायरस के हमले के पहले से अर्थव्यवस्था बेहद बुरी स्थिति में थी। और अब यह और खराब होगी।  यात्रा और पर्यटन उद्योग बुरी तरह बर्बाद हो गए हैं। लॉकडाउन ने विनिर्माण और खेती को व्यापक रूप से प्रभावित किया है।

इस महामारी और इससे उपजी परेशानियों ने पहले ही लोगों की तकलीफें बढ़ाई हैं, और यह कई गुना बढ़ेंगी। ऐसे परिदृश्य में सामाजिक विश्वास की बहाली और अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण शायद एक व्यक्ति और उनके विश्वस्त सलाहकारों के छोटे से समूह की क्षमताओं से परे है। अतीत का एक और सबक आज प्रासांगिक हो सकता है।

1930 के दशक और 1940 के दशक के दौरान नेहरू और पटेल औपनिवेशिक नौकरशाही के भूरी चमड़ी वाले भारतीय सदस्यों से नफरत करते थे, जिन्होंने स्वतंत्रता संघर्ष को दबाने में मदद की थी और जिन्होंने अपने हजारों हमवतनों को जेल में डाल दिया था।

फिर भी, स्वतंत्रता मिलने के बाद नेहरू और पटेल ने अंग्रेजी राज के सर्वश्रेष्ठ नौकरों को भारत को एकजुट रखने में उन्हें मदद करने के लिए चुना और इस प्रक्रिया को लोकतांत्रिक रूप दिया। अंग्रेज वायसरायों की सेवा कर चुके चार भारतीय नौकरशाहों ने हमारे गणतंत्र के निर्माण में असाधारण योगदान दिया।

इनमें से बी.एन. राउ ने संविधान का मसौदा तैयार करने में मदद की, वी. पी. मेनन ने रियासतों के एकीकरण में अपने कार्य के जरिये योगदान दिया, सुकुमार सेन ने पहले आम चुनाव के आयोजन में अपने कार्य के जरिये योगदान किया और तरलोक सिंह ने पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को बसाने में अपने कार्य के जरिये योगदान किया।

जवाहरलाल नेहरू और वल्लभभाई पटेल ने उनके प्यारे बापू की तीखी आलोचना करने के कारण यदि बी आर आंबेडकर को अपने मंत्रिमंडल से बाहर रखा होता, तो क्या होता? तब क्या होता, यदि उन्होंने बी.एन. राउ और वी.पी.मेनन को स्थायी सेवानिवृत्ति पर भेज दिया होता, क्योंकि जब नेहरू और पटेल खुद जेल में थे, तब ये लोग साम्राज्यवादी शासन के वफादार थे? यदि नेहरू और पटेल इतने क्षुद्र और पक्षपाती होते, तो विभाजन की वजह से देश में व्याप्त समस्याएं बढ़ जातीं। तब शायद हम गणतंत्र नहीं बन पाते।

जब आज देश संभवतः विभाजन के बाद सबसे गहरे संकट का सामना कर रहा है। क्या मोदी-शाह की सत्ता नेहरू और पटेल ने जो कुछ किया था, उससे कुछ सीख लेगी? आपदा प्रबंधन के अनुभवी पूर्व वित्त मंत्रियों से प्रधानमंत्री के मशविरा करने में कुछ बुरा नहीं हो जाएगा, फिर वे कांग्रेस से ही जुड़े क्यों न हों।

अनुभवी पूर्व वित्त सचिवों और रिजर्व बैंक के गवर्नरों से भी सलाह ली जा सकती है। सरकार सक्रिय रूप से ज्यां द्रेज और रीतिका खेड़ा जैसे अध्येताओं से संपर्क कर सकती है, जो कि किसानों और मजदूरों से जुड़ी संवेदनशीलता के बारे में नॉर्थ ब्लॉक में बैठे अर्थशास्त्रियों की तुलना में कहीं बेहतर जानते हैं। उन्हें उन शानदार पूर्व स्वास्थ्य सचिवों को भी शामिल करना चाहिए, जिन्होंने चिकित्सा बिरादरी के साथ काम करते हुए एड्स से उपजे संकट को नियंत्रित करने में, एच1एन1 के सफाये और भारत से पोलियो का उन्मूलन करने में मदद की थी।

नेहरू और पटेल ने जैसी राष्ट्रीय सरकार का गठन किया था, शायद वह आज संभव न हो। फिर भी, आज जो लोग सत्ता में हैं, उन्हें अन्य राजनीतिक दलों के काबिल पुरुषों और महिलाओं से सलाह और सहायता लेने से कोई रोक नहीं रहा है। न ही उन अर्थशास्त्रियों और न ही समाजसेवियों से, जिन्होंने अतीत की सरकारों के साथ अपने अनुभव को साझा किया। ऐसे राष्ट्रीय संकट के समय में मोदी सरकार को अपने अहम और पक्षपात को दृढ़ता के साथ एक किनारे रखने की शालीनता और साहस दिखाना चाहिए-जैसा कि अगस्त, 1947 में कांग्रेस ने किया था।
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