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दो राष्ट्रीय खजानों की प्रशस्ति में

Ramchandra Guhaरामचंद्र गुहा Updated Sun, 23 Feb 2020 05:05 AM IST
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रामचंद्र गुहा
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पिछले महीने शैक्षिक अनुसंधान से संबंधित गैरलाभकारी संगठन प्रथम ने अपने अस्तित्व के पच्चीस साल पूरे किए। ऐसे ही, पिछले साल के अंत में पर्यावरणीय शोध के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन कल्पवृक्ष के चालीस साल पूरे हुए। इन दोनों ही चर्चित संगठनों की वर्षगांठ को मीडिया ने तवज्जो नहीं दी, चाहे वह मुख्यधारा का मीडिया हो या वैकल्पिक, डिजिटल मीडिया हो या प्रिंट। यह दुर्भाग्यपूर्ण था, क्योंकि प्रथम और कल्पवृक्ष, दोनों ही बेहतरीन संगठन हैं, और शिक्षा तथा पर्यावरण के जिन क्षेत्रों में वे काम करते हैं, वे भारत के भविष्य के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं।
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चूंकि मैं पिछले काफी साल से इन संगठनों के कामकाज से परिचित हूं, इसलिए मैंने इस चुप्पी को तोड़ने और इन दो राष्ट्रीय खजानों की प्रशस्ति में अपने व्यक्तिगत विचार व्यक्त करने का निश्चय किया। कल्पवृक्ष की शुरुआत 1979 में दिल्ली में हाई स्कूल के कुछ छात्रों ने मिलकर की थी। मैं इस लेख में उनमें से कुछ के नाम लेना चाहता था, लेकिन कल्पवृक्ष ने ऐसा करने से मुझे मना किया, क्योंकि यह समूह शुरू से ही सामूहिक पहचान को व्यक्तिगत पहचान पर तरजीह देता है।

इसलिए उनकी पहचान जाहिर करने के बजाय मुझे कृपया सिर्फ उनके काम के बारे में कहने दें। केवी (अपने लिए इसने यही नाम चुना है) की शुरुआत राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पारिस्थितिकी के प्रति रुचि जताने के साथ हुई।

इसने एक तरफ अरावली पहाड़ियों के आसपास देसी वनस्पतियों और पक्षियों के बारे में जानना शुरू किया, दूसरी ओर, इन पहाड़ियों को शहरी विस्तार और अनियंत्रित खनन से बचानेकी कोशिश भी शुरू की। 1980 के दशक की शुरुआत में कल्पवृक्ष के सदस्यों ने दिल्ली से बाहर अपना विस्तार करना शुरू किया। उन्होंने चिपको आंदोलन के कार्यकर्ताओं के साथ हिमालय का भ्रमण शुरू किया, जिन्होंने उन्हें व्यावसायिक वानिकी से पर्वतीय पारिस्थितिकी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बचाने के बारे में चेताया। इसके बाद उन्होंने खुद ही नर्मदा घाटी का दौरा किया और उस नदी पर बनने वाले विशाल बांधों से आदिवासी समुदायों पर पड़ने वाले असर का अध्ययन किया।

उनकी रिपोर्ट द इकोनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली के जून, 1984 के अंक में प्रकाशित हुई, जिसने सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर का ध्यान खींचा और उन्होंने इन बांधों से बेघर और विस्थापित होने वालों के हित में काम करने के लिए तत्काल नर्मदा घाटी की ओर कूच किया। कल्पवृक्ष के संस्थापक सदस्यों में से कुछ ने दूसरे क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिबद्धता जताई : मसलन, पत्रकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता और यूनिवर्सिटी प्रोफेसर के रूप में उन्होंने अपनी काबिलियत का परिचय दिया। जबकि कुछ सदस्य टिकाऊ पर्यावरणीय भविष्य के अपने मूल काम पर ही टिके रहे। उन्होंने पूर्वोत्तर, पश्चिमी घाट और अंडमान-निकोबार जैसे दूरस्थ और संवेदनशील क्षेत्रों में स्थानीयसमुदायों के साथ मिलकर फील्ड रिसर्च का काम किया और क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी को दुरुस्त किया।

कल्पवृक्ष अब भी, जिसका मुख्यालय अब पुणे है, एक जीवंत और ऊर्जावान संगठन बना हुआ है तथा उसी आदर्शवादी भावना से संचालित होता है, जैसा कि वह चालीस साल पहले था। प्रथम का गठन मुंबई में जनवरी, 1995 में हुआ था। इसके संस्थापक सदस्यों माधव चव्हाण तथा फरीदा लांबे की शैक्षिक और शोध की पृष्ठभूमि थी तथा दोनों सशक्त सामाजिक अंतर्ज्ञान से चालित थे। इन्होंने सबसे पहले मुंबई की झुग्गियों में रहने वाले उन बच्चों के लिए काम किया, जो अपने परिवार की सामान्य आय में योगदान करने के लिए स्कूल छोड़ देते थे।

कल्पवृक्ष की ही तरह अपने गृहनगर में ठोस काम के जरिये अपनी साख बनाने केबाद प्रथम ने मुंबई से बाहर अपना विस्तार करना शुरू किया। 'हर बच्चा स्कूल में हो और अच्छी तरह पढ़ाई करे'-इस उद्देश्य के साथ अब तक इसने तेईस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज की है। प्रथम ने शिक्षक प्रशिक्षण और पाठ्यक्रम विकास के क्षेत्रों में अग्रणी
भूमिका निभाई है।

इसके पास अखिल भारतीय स्तर पर प्रशिक्षकों का नेटवर्क है, जो देश भर के दसियों हजार स्कूलों में काम करते हैं, जिनका फोकस मुख्य रूप से पाठ और अंकगणित जैसे विषयों में छोटे बच्चों में बुनियादी कौशल भरने का है। प्रथम के पास एक सशक्त रिसर्च विंग भी है, और जिसका पता पिछले अनेक वर्षों से उसके द्वारा जारी की जाने वाली सालाना शैक्षिक रिपोर्टों से चलता है। ये रिपोर्टें देश के अलग-अलग राज्यों में विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों तथा विषयों के बारे में सच्चाई से हमारा सामना कराती हैं।

असर रिपोर्टें शैक्षिक अनुसंधान के क्षेत्र में सोने की खान साबित हुई हैं, और दूसरे क्षेत्रों में प्रभावी नीतियां तैयार करने के लिए आधार का काम कर सकती हैं। प्रथम बुक्स के जरिये इस संगठन ने बच्चों के लिए सैकड़ों किताबें विभिन्न विषयों और भाषाओं में प्रकाशित की है। मैंने चूंकि पर्यावरण विशेषज्ञ के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी, इसलिए पेशेवर तौर पर कल्पवृक्ष के साथ मैंने अनेक बार काम किया है।

मैं शैक्षिक शोधकर्ता नहीं हूं, इसलिए प्रथम के बारे में उस अधिकार के साथ बात नहीं कर सकता। लेकिन इसके संस्थापकों और कर्मचारियों के साथ मेरी कई मुलाकातें हुई हैं, और मैं इनके ज्ञान, प्रतिबद्धता और अपनी आलोचना से सीखने की उनकी शानदार क्षमता का कायल हूं। नोबेलजयी अभिजीत बनर्जी और इस्थर डुफ्लो भी प्रथम के प्रशंसकों में से हैं, और उन्होंने प्रथम के साथमिलकर अपना शोध कार्य किया है। कल्पवृक्ष और प्रथम को मैं न सिर्फ नजदीक से जानता हूं, बल्कि कई मामले में उनकी समानताएं देखकर मैं हैरान भी हूं। जैसे कि दोनों ने देश के दूसरे शहरों में जड़ें जमाने से पहले एक शहर को चुना, एक ने दिल्ली, तो दूसरे ने मुंबई को।

दोनों वैश्विक संगठनों केसाथ काम करते हैं, लेकिन भारत में उनकी जड़ें गहरी हैं। दोनों वास्तविक और प्राथमिक शोध में विश्वास करते हैं; दोनों ने अपने शोध पर आधारित महत्वपूर्ण किताबों की सीरीज प्रकाशित की है। दोनों चाहते हैं कि उनका शोध जनमत और सरकारी नीति निर्माण को प्रभावित करे। और आखिरी बात यह कि देश के कुछ दूसरे एनजीओ के विपरीत, जिनकी कहानी अपने संस्थापकों के करिश्मे और व्यक्तित्व से शुरू और खत्म होती है, इन दोनों ने संगठन को अधिक महत्व दिया है।


इन दो महान भारतीय संस्थाओं की वर्षगांठों की मीडिया ने अनदेखी की, तो यह आश्चर्यजनक नहीं है। भारतीय मीडिया मूलतः राजनीति से संचालित होता है। वह पिछले चुनाव से आगे देखता है या पिछले चुनाव की ओर मुड़कर देखता है, तथा मंत्री ने क्या कहा, और विपक्षी नेता ने क्या ट्वीट किया, इन्हीं का विश्लेषण करता है। चुनाव और राजनीतिक पार्टियों से मोहाच्छन्न मीडिया के लिए शिक्षा और पर्यावरण जैसे मुद्दे महत्व नहीं रखते।

जबकि देश का भविष्य हमारे स्कूल, कॉलेज तथा हमारी हवा, पानी, मिट्टी जंगलों की हालत पर निर्भर करता है। शायद यही उपयुक्त समय है, जब हम कल्पवृक्ष और प्रथम के कामकाज पर ज्यादा ध्यान दे सकते हैं। इसकी शुरुआत के तौर पर इस कॉलम के पाठक इन दोनों संगठनों की वेबसाइट्स पर जा सकते हैं।  
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