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स्मार्ट फोन से स्मार्ट पत्रकारिता

sudheesh pachauriसुधीश पचौरी Updated Sat, 24 Jun 2017 01:04 PM IST
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सुधीश पचौरी
सुधीश पचौरी
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चीन के ‘यीवू इंडस्ट्रियल ऐंड कमर्शियल कॉलेज’ की एक इक्कीस वर्षीय छात्रा ने हाथ में सेल्फी स्टिक ली, सेल्फी स्टिक के साथ अपनी कमेंटरी की और फिर ‘लाइव स्ट्रीमिंग’ की और अपने मोबाइल को बहुत से ‘किस’ भेजे!
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ये तमाम तरकीबें उसने कॉलेज के पाठयक्रम से सीखी, जिसमें वह ‘मॉडलिंग और शिष्टाचार’ पढ रही है। यहां छात्रा ही वाचक है। छात्रा ही वीडियोग्राफर है। छात्रा ही लाइव स्ट्रीम कर रही है। छात्रा ही अपने मोबाइल को ‘किस’ भेज रही है। एक मानी में यह छात्रा एक नई नस्ल की पत्रकार है, जो खुद को, केंपस को, मोबाइल को, एक घटना और खबर की तरह पेश कर रही है। लेकिन उसे भी मॉडल बनना है, उसके लिए ‘शिष्टाचार’ सीखना है।

क्या हमारे यहां किसी विश्वविद्यालय में ऐसा कुछ पढ़ाया जा रहा है। जी नहीं। इधर तो अभी भी पहले पत्रकार नारद और अंतिम पराडकर बने हुए हैं।
चीन के समकालीन मॉस कम्यूनिकेशन के सीन को देखेंः वहां अपने स्मार्टफोन का उपयोग करने वाले सत्तर करोड़ अपनी जीवनशैली को लाइव स्ट्रीम करके अपनी ब्राडिंग करते रहते हैं, अनेक अपने बिजनेस को आगे बढाते रहते हैं। समूची कहानी के केंद्र में स्मार्टफोन है। वही मीडियम है, वही मेसेज है।

अपने यहां का कम्यूनिकेशन सीन भी लगभग ऐसा ही है। आप शहर या गांव कहीं देख लें, हर युवा के हाथ में स्मार्टफोन है, कान में आडियो कॉर्ड है, मुंह के आगे माइक है और अधिकतर समय वह या तो किसी से बात कर रहा/रही है या गाने सुन रहा/रही है या मेसेज भेज रहा/रही है या पढ़ रही है। छोटे-बड़े व्हाट्सएप ग्रुप बने हुए हैं, कम्यूनिटीज बनी हुई हैं। उनके फेसबुक पेज हैं। वे तुरंता सूचना और ओपिनियन निर्माता हैं। यूट्यूब और फेसबुक पर अनेक उत्साही युवाओं ने मोबाइलों पर सीधे देखे जा सकने वाले न्यूज चैनल तक खोल लिए हैं, जहां कोई भी खबर देने वाला वीडियो बनाने वाला, कमेंटरी देने वाला विचार देने वाला समीक्षा करने वाला हो सकता है।

यह एकदम नया संचार जगत है। अब न प्रिंट पर फोकस है न रेडियो पर है न टीवी पर है, अब ये सारे माध्यम आपके स्मार्टफोन में हैं!पहले माध्यम घर में था अब चौबीस घंटे आपकी जेब में हैं, आपके हाथ में है। आप ही मेसेंजर हैं, आप ही मेसेज हैं, आप ही मीडियम हैं, आप ही उपभोक्ता हैं।

अपने यहां पत्रकारिता कोर्स पढ़ाने वाले बहुत से संस्थानों को इस बदलाव का होश तक नहीं है। बहुत से अभी तक प्रिंट या रेडियो या वीडियो तक महदूद हैं। इंटरनेट, फेसबुक, यूट्यूब, वीडियो ब्लॉगिंग शेयर कर वाइरल कर, किस तरह परंपरागत मीडिया को बेकार कर रहे हैं, ये मीडिया शिक्षण संस्थानों को मालूम ही नहीं। इसीलिए न जाने कितने मीडिया शिक्षण संस्थान बंद हो चुके हैं या बंद होने वाले हैं।
सूचना तकनीक ने अपने तेज बदलाव के जरिये सूचनाक्रिया को बदल दिया है। एक वक्त में पत्रकारिता ‘विशिष्ट कर्म’ था अब हर नागरिक पत्रकार;सिटीजन जर्नलिस्ट है। तब ‘मीडियम ही मेसेज’ था, अब ‘मीडियम एक मसाज’ है यानी ‘एक चंपी’ है। ‘पेड न्यूज’ की जगह ‘फेक न्यूज’ ने ले ली है। मार्शल मकलूहान की जगह मार्क जुकेरबर्ग ने ले ली है, गूगल और फेसबुक के साम्राज्य ने ले ली है।

पत्रकारिता के पठन-पाठन से लंबे अरसे से जुड़े मेरे जैसे एक अध्यापक ने पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रमों की व्यर्थता को बार-बार महसूस किया है। एक वक्त था जब दिल्ली के आस-पास हजारों मीडिया शिक्षण संस्थान खुले थे और सिर्फ एक सर्टिफिकेट दे दिया करते थे।छात्र उनको लेकर अपने जुगाड़ से कहीं न कहीं नौकरी पा जाते थे। तब प्रिंट और टीवी के उठान का वक्त था। ये वक्त सोशल मीडिया का और एक सुपर मीडियम के रूप में ‘स्मार्ट फोन’ का है। 

‘पत्रकार की नैतिकता’, ‘समाज को बदलने में पत्रकारिता की भूमिका’, ‘पत्रराकारिता और आजादी’ आदि टॉपिक देखकर अब उल्टियां आती हैं। मीडिया एक कॉरपोरेट बिजनेस ही रहता, तो गनीमत थी वह खुद ‘क्रोनी केपीटलिज्म’ का ‘तकिया’ बन गया है।

मीडिया के इस अनादर्श समय में अगर मीडिया पढ़ाना ही है, तो छह महीने का ऐसा कोर्स पढाएं, जो नब्बे फीसदी प्रेक्टिकल हो और रोजगार देने में सक्षम हो और उसे उस तरह बनाएं जिस तरह चीन के यीवू कॉलेज ने बनाया है, जो इंडस्ट्री से और कॉमर्स से जुडा है। यीवू का मॉडल ठीक न लगे, तो अपना बनाएं, लेकिन जो भी मॉडल होगा वह ‘उद्योग और कॉमर्स’से जुड़े बिना संभव नहीं।

यह नए किस्म के ‘सिटीजन जर्नलिस्ट’ का जमाना है। जिसके भी हाथ में स्मार्टपफोन है, वह एक ‘कंपलीट सिटीजन जर्नलिस्ट’ है। अगर उसके पास सोशल मीडिया में सक्रिय मित्र मंडली है, तो वह अपने ‘सूचना प्रोडक्ट’ को ‘वाइरल’ कर उसमें ‘वेल्यू ऐड’ कर सकता है, जिसे शाम तक कोई न कोई टीवी चैनल मुद्दा बना सकता है। यहां ‘फेक न्यूज’ और ‘फेंकू न्यूज’ से लेकर ‘यथार्थ न्यूज’ हो सकती है। बहुत सी बिग स्टोरीज यहीं से उठाई जाती हैं। अब ‘खबर’ और ‘ओपिनियन’ मिक्स हो चले हैं। ओपिनियन ही न्यूज है, न्यूज ही ओपिनियन है!

पिछले दिनों स्मार्टफोन ‘एक नया निर्णायक मीडियम’ बना है। ‘डिजिटल क्रांति’ से लेकर वह तरह-तरह के ‘सर्विस ऐप्स’ का वाहक बना है। वही टीवी और रेडियो रिसीवर है और वही उनका ‘कंटेट प्रोवाइडर’ भी है। आज उसी की ‘खबर-लीलाएं’ पठन-पाठन अभीष्ट है। 

‘खबर के लिए खबर’ वाला जमाना गया। यह उस तरह की ‘खबर’ और ‘ओपिनियन’ की मिक्सिंग का जमाना है, जो इकोनॉमी को कहीं न कहीं छुए यानी उसे गति दे! इसका मतलब ये नहीं कि खबर विज्ञापन बन जाए, मतलब सिर्फ इतना है कि खबर ‘अनुत्पादक’  न हो, वह समाजार्थिक रूप से ‘उत्पादक’ हो!
  
  
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