कोरोना काल में पाकिस्तान में पढ़ाई

mariana babarमरिआना बाबर Updated Fri, 24 Apr 2020 08:12 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media

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विभाजन से पहले मेरे माता-पिता कुछ समय के लिए लखनऊ में रहे थे। बाबा फौज में थे और निकाह के बाद यह उनकी पहली पोस्टिंग थी। बाबा खैबर पख्तूनख्वा के एक गांव से ताल्लुक रखते थे और अपनी युवावस्था में उन्होंने प्रिंस ऑफ वेल्स इंडियन मिलिटरी कॉलेज, देहरादून में अध्ययन किया था, जिसे आज राष्ट्रीय इंडियन मिलिटरी कॉलेज के रूप में जाना जाता है। उनके करीबी दोस्त, पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख जनरल गुल हसन, और पाकिस्तान के दो पूर्व वायुसेना प्रमुख, नूर खान और असगर खान ने भी देहरादून में पढ़ाई की थी।
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मुझे याद है कि बाबा ने कहा था कि वह दक्षिण भारत की एक यात्रा पर तब चौंक गए, जब उन्होंने एक व्यक्ति को सड़क की सफाई करते हुए देखा, फिर उस व्यक्ति ने एक अखबार निकाला और पढ़ना शुरू किया। ऐसा कहकर बाबा दक्षिण भारत की साक्षरता के बारे में बता रहे थे। इतिहास में लौटने का कारण यह है कि आज कोरोना महामारी के समय दुनिया के दूसरे बच्चों की तरह पाकिस्तानी बच्चे भी स्कूल से बाहर हैं। एक अनुमान के अनुसार, करीब दो अरब छात्र अपने शिक्षण संस्थानों से बाहर हैं। पाकिस्तान में कोविड-19 के पुष्ट मामले 10,000 का आंकड़ा पार कर गए हैं और सरकार ने इस हफ्ते बच्चों को पढ़ाई में व्यस्त रखने के लिए उपाय किए हैं।
हालांकि स्कूलों और कॉलेजों में इम्तहान रद्द कर दिए गए हैं। पाकिस्तान में साक्षरता दर लगभग 58 फीसदी है। बेशक पूरे मुल्क में साक्षरता दर अलग-अलग हो सकती है। जैसे कि एक सर्वे में इस्लामाबाद में साक्षरता दर 85 फीसदी तक दिखाई गई है, जबकि हजारा जिले के तोरघर में यह दर महज 23 फीसदी है। उत्तर के जनजातीय इलाके में महिलाओं की साक्षरता दर मात्र 9.5 फीसदी है। 
ऐसे में, इस हफ्ते यहां सरकार ने टेलीस्कूल चैनल नाम से एक नया टीवी चैनल स्थापित किया है, जो एक शानदार पहल है। इस चैनल को पूरे पाकिस्तान के दूर-दराज के छात्र भी देख सकते हैं। लॉकडाउन के समय, जब अधिकांश बच्चे घर पर रहने के लिए मजबूर हैं, तब यह चैनल बच्चों के घर में शैक्षिक सामग्री पहुंचाने जैसा है। कई निजी स्कूलों ने भी अपनी व्यवस्था शुरू की है, जहां वे बच्चों को ऑनलाइन पढ़ा रहे हैं, पर पाकिस्तान के सरकारी स्कूलों में यह सुविधा नहीं है। उनके लिए यह टेलीस्कूल चैनल सबसे अच्छा विकल्प है, जो कक्षा एक से 12 वीं कक्षा तक शिक्षा प्रदान करेगा। पाकिस्तान के निजी और सरकारी, दोनों तरह के स्कूलों में करीब पांच करोड़ बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।

इस चैनल की शुरुआत के बाद मुल्क के अलग-अलग हिस्सों से आवाजें उठ रही हैं कि महामारी खत्म हो जाने के बाद भी इस चैनल को खासकर दूरदराज के क्षेत्रों के उन बच्चों के लिए जारी रखना चाहिए, जिनके यहां कोई स्कूल नहीं है। बहुत लोगों का कहना है कि मुल्क में शिक्षा की खराब हालत को देखते हुए यह चैनल गेमचेंजर हो सकता है और भारी बदलाव ला सकता है।

अंग्रेजी दैनिक एक्सप्रेस ट्रिब्यून की टिप्पणी है कि 'यदि सही तरीके से अमल किया जाए, तो एक व्यापक ई-लर्निंग कार्यक्रम बच्चों को न केवल बेहतर शिक्षा दे सकता है, जो वास्तव में उन्हें पटरी पर लाए, बल्कि मिडिल स्कूल की पढ़ाई पूरा करने से पहले ही पढ़ाई छोड़ने के बजाय पढ़ाई जारी रखने के लिए उनके और उनके परिवारों की हौसला अफजाई भी कर सकता है।' अखबार आगे लिखता है कि ऐसे में, भविष्य में 2020 की खौफनाक कोरोना महामारी को मानवता और आर्थिक मुश्किलों के लिए कम और मुल्क को मजबूत करने की दिशा में काम करने के लिए ज्यादा याद किया जाएगा।

हालांकि इस नए टेलीविजन चैनल की गुणवत्ता और उसके असर के बारे में बात करना अभी जल्दबाजी होगा। सबसे महत्वपूर्ण है बच्चों और उनके माता-पिता की प्रतिक्रिया, जो इस सेवा को सुधारने में बड़ी भूमिका निभाएगी। कोई नहीं जानता कि असमंजस की यह स्थिति कब खत्म होगी, यह एक साल तक चल सकती है। यहां स्कूलों को गर्मियों की छुट्टियों तक आधिकारिक रूप से बंद कर दिया गया है, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि गर्मियों की छुट्टियों के बाद वे खुलेंगे या नहीं। 

इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट ऐंड इकोनोमिक अल्टरनेटिव में वरिष्ठ रिसर्च फेलो डॉ फैसल बारी पिछले दो हफ्ते से ऑनलाइन पढ़ा रहे हैं। वह कहते हैं, 'यदि हम ऑनलाइन शिक्षा की दिशा में और आगे बढ़ते हैं, तो यह जानने के लिए, कि क्या इससे शिक्षा की गुणवत्ता में बदलाव होता है, बहुत सारे शोध की आवश्यकता है। हमें शिक्षा पर इसके असर का पता लगाने के लिए मध्यम से दीर्घ अवधि तक व्यक्तिगत उपकरणों और व्यक्तिगत प्रौद्योगिकियों पर बहुत अधिक शोध करने  की जरूरत है।'

ऑनलाइन शिक्षण के साथ एक समस्या यह है कि बहुत-से छात्र ऐसे हैं, जिनके पास इंटरनेट कनेक्शन तक नहीं है, जबकि अन्य लोगों की शिकायत है कि इंटरनेट की जो रफ्तार है, उससे ऑनलाइन कक्षाओं का लाभ नहीं उठाया जा सकता। बहुत से छात्रों के पास स्मार्टफोन, लैपटॉप या डेस्कटॉप नहीं है। एक दूसरे आंकड़े के मुताबिक, महज  एक तिहाई पाकिस्तानियों के पास ब्रॉडबैंड इंटरनेट है और 3 जी व 4 जी के भी इतने ही सब्सक्राइबर बताए जाते हैं।

डॉ. बारी कहते हैं, 'मैंने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर छात्रों के लिए व्हाट्सएप ग्रुप भी बनाए हैं। इसमें बहुत अधिक संचार मुमकिन है। इसमें छात्र किसी भी समय सवाल पूछ सकते हैं, और अगर कोई उपकरण उन तक नहीं पहुंचा है, तो वे इस बारे में हमें बता सकते हैं।  मैं छात्रों को कक्षा के समय और असाइनमेंट की समय सीमा याद दिलाने के लिए भी इस ग्रुप का उपयोग करता हूं।'

शोधकर्ता और एलयूएमएस स्कूल ऑफ एजुकेशन में पढ़ाने वाली सूफिया ए सिद्दीकी कहती हैं कि इस उथल-पुथल के बीच जीवन ने हमें मौका दिया है। वह कहती है कि 'हमें एक देश के रूप में अपनी शिक्षा प्रणाली के उद्देश्य, डिजाइन, वितरण और मूल्यांकन पर पुनर्विचार करने का मौका दिया जा रहा है। चूंकि कोविड-19 कोई फर्क नहीं करता, लिहाजा इसने हमें याद दिलाया है कि हम योजना के सबसे जरूरी मूल सिद्धांतों पर लौटें : यानी एक अच्छा जीवन जीने के लिए मनुष्य को क्या सीखना चाहिए?' (लेखिका वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार हैं।)
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