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मोदी के तीन ‘सकार’

sudheesh pachauriसुधीश पचौरी Updated Sun, 15 Jun 2014 12:06 AM IST
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प्रधनमंत्री मोदी जी ने तीन ‘सकारों’ पर जोर दिया है-स्केल, स्किल और स्पीड! मात्रा, कौशल और तीव्रगति!
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राष्ट्रपति के भाषण पर हुई बहस का जवाब देते हुए जो बातें उन्होंने कहीं, उनमें ‘कौशल प्रदान करने वाली शिक्षा’ पर जोर रहा। उन्होंने कहा कि हम ‘कुशलता’ का निर्यात कर एक बार फिर दुनिया के ‘गुरु’ बन सकते हैं।

कौशल या हुनर, स्किल सिखाने वाली शिक्षा देने पर मोदी का जोर क्यों है? इसलिए कि वह इसे गुजरात में आजमा चुके हैं। वह हुनर और मेन्युफैक्चरिंग का महत्व पहचानते हैं और यह भी जानते हैं कि अगर भारत में मेन्युफैक्चरिंग बढ़ेगा, तो उसका विकास न केवल समावेशी होगा, बल्कि आत्मनिर्भरता लाएगा। मेन्युफैक्चरिंग तेज करने के लिए चाहिए हस्त कौशल या हस्त शिल्प देने वाली ‘हुनर’ सिखाने वाली और दक्षता देने वाली शिक्षा, जो उत्पादकता से जुड़ी हो, जिसे सीखकर युवा उत्पादक बन सकें और उद्यमी बन सकें। चीन के तेज विकास में तुरुप का पत्ता मेन्युफैक्चरिंग ही है, जबकि अपने समाज में जो हस्त कौशल और शिल्पकलाएं परंपरा से उपलब्ध थीं, पिछले बीस-पच्चीस साल में, वे उपेक्षित और खत्म की गई हैं। पिछले बरसों में एफडीआई वित्तीय पूंजी और ग्लोबल उपभोक्ता-बाजार की खुली आमद ने हमारे बाजारों को विदेशी चीजों से पाट दिया है, जिन पर गर्व से लिखा होता है ‘अनटच्ड बाई ह्युमन हैंड्स!’

कहने की जरूरत नहीं कि जिस दिन ‘अनटच्ड बाई ह्यूमन हैंड्स’ के लिए हम मुंहमांगी कीमत देने लगे, उसी दिन हमारे अपने ‘हाथ’ कट गए। हस्तशिल्प हीन हो गए। हस्तकौशल से मन हट गया।

हमने देखा कि ‘आईआईटी’ महान हो गई, लेकिन ‘आइटीआई’ हीन बन गए। बिजली का काम जानने वाला हीन हो गया। बिजली पर थ्योरी बघारने वाला महान! कारीगर हीन हो गए। ऑटोमेशन जिंदाबाद हो गया। यह ऊंच-नीच न होती, तो हम कहां से कहां पहुंचे होते। शिल्प गया, तो बेरोजगारी बढ़ी। अपनी ‘मंदी’ इस कारण से भी बढ़ी। ‘सेवा क्षेत्र’ सर्वप्रमुख हो गया। अंग्रेजी पढ़ कॉल सेंटर में अंग्रेजी गिटपिट से काम किया, लेकिन नौजवान साइकिल का पंक्चर लगाना भूल गए। न जाने कितने कारीगर, कितने शिल्पी जो अपने हुनर की वजह से ‘उत्पादकता’ बढ़ाते रहे, हुनर को हीन देखकर किनारे हो गए।

हर गांव-कस्बे-शहर-महानगर में बीस-पच्चीस साल पहले तक पुराने शिल्पी, कारीगर जैसे कपड़ा सिलने वाले दर्जी, जूते गांठने वाले, पंक्चर लगाने वाले, मिटटी के खिलौने बनाने वाले, कपडों पर किचनकारी करने वाले लोग हीन हो गए। कमीज का बटन टूटा, तो हम फिर लगा न सके। फटी, तो घर में सिल न सके। सूई की नोंक में धागा पिरोना तक भूल गए, जूते फटे, तो मरम्मत न करा सके, क्योंकि जूता गांठने वाले को नाइकी और एडिडास ने गली के नुक्कड़ पर काम ही नहीं देने दिया। पुराना जूता फेंक नया ले आए। एक विराट युवा मिडिल क्लास अपने हाथ की कलाकारी भूल गई, जबकि इस समाज में हस्तशिल्प ने इकोनॉमी संभाल रखी थी। हर कस्बा, हर गांव का युवा अब या तो दोयम दरजे का मैनेजमेंट कोर्स करता है या दोयम इंजीनियरी करता है या बीए-एमए करता है, जो उसे हाथ के हुनर से और दूर करते हैं। वह ‘बाबू’ बनना चाहता है। कारीगर या शिल्पी नहीं ,जबकि वह जानता है कि सब बाबू नहीं बन सकते।
हमारी माध्यमिक और उच्च शिक्षा प्रणाली को कुछ ऐसी गलत दिशा दी गई कि शिल्प की महत्ता खो गई और रट्टूपन की महत्ता बढ़ गई। विश्वविद्यालयी शिक्षा समाज की जरूरतों से जोड़ी ही नहीं गई। इसीलिए उसका पराभव हुआ।

उदाहरण देखें-दो साल पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में मुंबई की एक बड़ी कंपनी आई, जिसे पढ़े-लिखे युवाओं की भर्ती करनी थी। विश्वविद्यालय ने अच्छे नंबर वाले ग्यारह सौ ग्रेजुएट युवाओं की लिस्ट दी। सबके साक्षात्कार के बाद कंपनी ने सिर्फ तीन युवाओं को योग्य पाया। बाकी के लिए कहा कि इनके नंबर बहुत अच्छे हैं, लेकिन इनके पास न तो कोई ‘कौशल है, न ‘संचार क्षमता’ (कम्यूनिकेशन स्किल), न ‘इन्फॉरमेशन टेक्नोलोजी, न सामान्य गणितीय हिसाब करने की क्षमता! देश के नंबर वन विश्वविद्यालय के छात्रों का हाल जब यह है, तो बाकी क्या होगा?

जो शिक्षा रही, उसने रट्टूवीर पैदा किए। नए तकनीकी दक्ष और संचार क्षम छात्र नहीं बनाए।‘पंद्रह दिन में अंग्रेजी सीखें’ और ‘दो महीने में कप्यूटर डिप्लोमा लें’ चल निकले। न सही अंग्रेजी आई, न हिंदी। संचार क्षमता नहीं बढ़ी, कंप्यूटिंग क्षमता भी दीन रही।

इसी कारण दिल्ली विश्वविद्यालय ने घिसे-पिटे पुराने स्नातक पाठ्यक्रम और ढांचे को ‘बहुस्तरीय उपाधिपरक निकास’, मल्टीपल डिग्रीज एक्जिट वाला बनाकर उसे रोजमर्रा की जरूरतों, दक्षता एवं कौशल तथा शोध से जोड़कर चार वर्षीय ढांचे में ढाला, जिसमें खेल, एनसीसी संस्कृति आदि को भी बराबर की महत्ता दी गई, ताकि छात्र का एक सकारात्मक और कमेरा व्यक्तित्व विकसित हो सके। इसके लिए राष्ट्रीय शिल्प विकास परिषद से करार कर शिक्षा में शिल्प प्रशिक्षण बढ़ाने की कोशिश की। इस बदलाव का सबसे ज्यादा विरोध उस मुट्ठी भर वामपंथी गिरोह की ओर से आया, जो युवाओं को हमेशा की तरह बेरोजगार रख उनका इस्तेमाल करना चाहता है।

इसके बावजूद दिल्ली विश्वविद्यालय ने शिक्षा को कागजी डिग्री से हटाकर देश की समस्याओं को हल करने के लिए जरूरी ज्ञान एवं कौशल की शिक्षा तथा शोध से जोड़ दिया। वामपंथी विरोधी कोलकाता विश्वविद्यालय को एक बार इसी तरह खत्म कर चुके हैं, लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय खत्म नहीं होगा, क्योंकि उसके साथ उसके छात्र, उसके माता-पिता, अध्यापक हैं, और अब तो उसके पास मोदी के तीन ‘सकार’ में से एक सकार ‘स्किल’ का बल भी है।
मोदी का मार्ग सही मार्ग है। कौशल नहीं, तो कर्म भी फल नहीं देगा। यही है हमारी शिक्षा का ‘योगःकर्मसु कौशलम्!’
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