सोशल मीडिया की क्रांति का हश्र

थामस एल. फ्रीडमैन Updated Fri, 05 Feb 2016 06:39 PM IST
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The fate of the social media revolution

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पिछले कुछ वर्षों के दौरान हम अरब क्रांति और ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट से लेकर इंस्ताबुल, कीव और हांगकांग स्क्वायर की क्रांतियों के गवाह रहे हैं, जिन्हें सोशल मीडिया ने चिंगारी दी। मगर जब धुआं छंटा, तो पता चला कि ये क्रांतियां कोई नई स्थायी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करने में नाकाम रहीं। दरअसल इन क्रांतियों से एक साथ कई स्वर उठे, जिनमें सहमति कायम करना असंभव हो गया।
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ऐसे में सवाल है कि क्या सोशल मीडिया कुछ नया बनाने के बजाय बनी-बनाई चीजों को बिगाड़ रहा है? पिछले महीने एक शख्स ने इसका जवाब 'हां' में दिया। यह शख्स कोई और नहीं, बल्कि मिस्र में गूगल के कर्मचारी वाएल घोनिम हैं, जिनके अनाम फेसबुक पेज ने 2011 में तहरीर चौक की क्रांति को भड़काने में अहम भूमिका निभाई थी और जिसकी वजह से हुस्नी मुबारक का तख्ता पलट गया। मगर यह क्रांति सही मायने में कोई लोकतांत्रिक विकल्प देने में नाकाम रही। उसके बाद से सिलिकॉन वैली में बस गए घोनिम ने एक टेड टॉक पोस्ट कर बताया कि आखिर क्या कुछ गलत हुआ था। उन्होंने इस पोस्ट की शुरुआत इन शब्दों के साथ कीः 'मैंने एक बार कहा था कि यदि आप को समाज को आजाद कराना है, तो सिर्फ इंटरनेट की जरूरत होगी। पर मैं गलत था। मैंने यह बात तब कही थी, जब एक अनाम फेसबुक पेज बनाकर मैंने मिस्र की क्रांति को भड़काने में मदद की थी। अरब क्रांति ने सोशल मीडिया की असली ताकत को सामने ला दिया, लेकिन इसी ने इसकी सबसे बड़ी कमजोरी को भी उजागर किया। जिस युक्ति ने तानाशाहों के पतन के लिए हम सब को जोड़ा था, अंततः हमारे बिखरने की भी वही वजह बना।'
घोनम आगे विस्तार से बताते हैं, '2000 के दशक के शुरुआती वर्षों में अरब के लोग इंटरनेट पर मानो टूट पड़े थे। वे ज्ञान के भूखे थे और उन्हें अवसर चाहिए था, वे दुनिया के बाकी हिस्से के लोगों से जुड़ना चाहते थे।' मगर जून, 2010 में चीजें बदल गईं, जैसा कि वह बताते हैं, 'इंटरनेट ने हमेशा के लिए मेरी जिंदगी बदल दी। अचानक मेरी नजर फेसबुक पर एक तस्वीर पर पड़ी, जो एक मिस्र के युवक का शव थी, जिस पर उत्पीड़न के निशान साफ दिख रहे थे। उसका नाम खालिद सईद था। 29 साल का खालिद एलेक्जेंड्रिया का रहने वाला था, जिसे पुलिस ने मार दिया था। उस तस्वीर को देखकर लगा, मानो मैं ही खालिद हूं। इसके बाद मैंने फेसबुक पर एक पेज बनाया और उसे नाम दिया 'हम सब खालिद सईद हैं'। सिर्फ तीन दिन के अंदर ही इस पेज पर एक लाख लोग आ चुके थे। ये मिस्र के मेरे जैसे लोग थे, और उनकी चिंता भी एक जैसी थी।'
जल्द ही घोनिम और उनके मित्रों ने फेसबुक के इस पेज का इस्तेमाल 'आइडिया क्राउडसोर्स' की तरह करना शुरू किया और फिर यह पेज अरब दुनिया में सर्वाधिक फॉलो करने वाला पेज बन गया। इसने लोगों को एहसास कराया कि वे अकेले नहीं हैं।

जल्द ही मिस्र की सुरक्षा सेवाओं ने घोनिम को पकड़ लिया, उसे पीटा और फिर ग्यारह दिनों तक नजरबंद कर दिया। लेकिन उसकी रिहाई के तीन दिन बाद ही उसके फेसबुक पेज ने लाखों प्रदर्शनकारियों को एकजुट कर दिया, नतीजतन मुबारक का तख्ता पलट गया। घोनिम कहते हैं, 'जल्द ही यह उत्साह ठंडा पड़ गया, क्योंकि हम सहमति बनाने में नाकाम हो गए। जिससे राजनीतिक संघर्ष गहरे ध्रुवीकरण में बदल गया। स्वर और तीखे होते गए। गलत सूचनाएं, अफवाह और घृणा फैलाने वाले भाषणों की बाढ़-सी आ गई। पूरा वातावरण जहरीला हो गया। मेरी ऑनलाइन दुनिया मानो शोर, झूठ और घृणा फैलाने वाले भाषणों से भरा युद्ध का मैदान बन गई।'

आर्मी और इस्लामिस्ट्स ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल एक दूसरे पर कीचड़ उछालने के लिए किया, तो घोनिम और उसके जैसे लोकतंत्र समर्थक हाशिये पर आ गए। उनकी क्रांति को मुस्लिम ब्रदरहुड ने चुरा लिया और जब वह भी नाकाम हो गया, तो उस पर आर्मी ने कब्जा जमा लिया और उसने ऐसे सेक्युलर युवाओं को गिरफ्तार कर लिया था, जिन्होंने सबसे पहले इस क्रांति को ताकत दी थी। आर्मी ने खुद का बचाव करने के लिए अपना फेसबुक बना लिया। घोनिम कहते हैं, 'ऐसा लगा, मानो हम हार गए। तकरीबन दो वर्षों तक मैंने खामोशी ओढ़ ली और जो कुछ हो रहा था, उसे देख रहा था।'

सोशल मीडिया के बारे में आज वह कुछ इस तरह से सोचते हैं, पहली बात, हमें पता नहीं है कि अफवाहों को कैसे नियंत्रित किया जाए। लोगों के पक्षपातपूर्ण विचार को सच बताने वाली अफवाहों पर न केवल यकीन किया जा रहा है, बल्कि यह लाखों लोगों में फैल भी रही है। दूसरी बात, हम ऐसे लोगों से ही बात करना चाहते हैं, जो हमसे सहमत हों और सोशल मीडिया की मेहरबानी से हम लोगों को चुप करा सकते हैं, उन्हें अनफॉलो कर सकते हैं या फिर प्रतिबंधित कर सकते हैं। तीसरी बात, ऑनलाइन विमर्श जल्द ही उन्माद में बदल जाता है, और ऐसा करते हुए हम शायद भूल जाते हैं कि स्क्रीन के पीछे बैठे लोग सचमुच में इंसान हैं, न कि कोई अवतार। चौथी बात, अपने विचार को बदलना वाकई कठिन हो गया है। सोशल मीडिया की गति और उसके साहस के कारण हम जल्द ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए बाध्य हो जाते हैं और दुनिया के जटिल मसलों पर भी सिर्फ 140 कैरेक्टर में अपने तीखे विचार व्यक्त कर डालते हैं। और जब हम एक बार ऐसा करते हैं, तो यह सदा के लिए इंटरनेट पर दर्ज हो जाता है। घोनिम कहते हैं कि पांचवी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सोशल मीडिया कुछ इस तरह हो गया है कि इसमें दोतरफा संवाद के बजाय एकालाप, विमर्श की जगह पोस्ट और गहरे संवाद की जगह खोखली टिप्पणियों ने ले ली है। यह सब ऐसा है, मानो हम इस बात पर सहमत हैं कि हम यहां सिर्फ अपनी बात कहने के लिए हैं, एक दूसरे से बात करने के लिए नहीं।

घोनिम ने उम्मीद नहीं छोड़ी है। उन्होंने अपने कुछ मित्रों के साथ पीआरएलआईओ डॉट कॉम नाम से एक वेबसाइट शुरू की है, जिसमें विवादास्पद और अहम मुद्दों पर संवाद किया जा सकता है। इसका मकसद मतभेदों को कम करना है। घोनिम कहते हैं, आज मैं यह मानता हूं कि यदि हम किसी समाज को मुक्त कराना चाहते हैं, तो पहले हमें इंटरनेट को आजाद करने की जरूरत है।
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