पाकिस्तान में हिंदू आबादी

मरिआना बाबर Updated Fri, 26 Feb 2016 06:49 PM IST
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The Hindu population in Pakistan

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हाल ही में लाहौर लिटरेचर फेस्टिवल के लिए पाकिस्तान आईं, शर्मिला टैगोर ने अपने पाकिस्तानी मुरीदों की एक पीढ़ी की उन पुराने दिनों की याद ताजा कर दी, जब वह बालीवुड की सुंदर अभिनेत्रियों में से एक थीं। लेकिन यह पहली बार था, जब उनके पाकिस्तानी मुरीद उन्हें व्यक्तिगत रूप से देख रहे थे और उनकी सादगी से प्रभावित थे। एक अन्य महिला, जिन्होंने लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा, वह थीं श्रीमती पाशा युसूफ हारून, जिन्ना के करीबी युसूफ हारून की पत्नी। 92 वर्षीय श्रीमती पाशा ने पहली बार विभाजन के बाद के उन दिनों का जिक्र किया, जब जिन्ना और उनकी बहन फातिमा जिन्ना उनके कराची स्थित घर 'सी फील्ड' में मेहमान बनकर आए थे।
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यह जानना दिलचस्प है कि बीती सदी के चालीस के दशक के आखिरी दिनों में अपने डाइनिंग कक्ष के दृश्य का उन्होंने कैसे वर्णन किया, जहां जिन्ना पाकिस्तान के भविष्य के झंडे पर विचार कर रहे थे और यह टिप्पणी की थी कि झंडे पर अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करने वाला जो सफेद हिस्सा है, उसे बढ़ाया जाना चाहिए।
आज पाकिस्तान के झंडे पर अर्धचंद्र और सितारे हैं और सफेद बॉर्डर पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन यह वास्तव में दुखद और शर्मनाक है कि छह दशकों के बाद पाकिस्तान में हिंदुओं के विवाह को नियंत्रित करने के लिए सिंध प्रांत में हिंदू विवाह अधिनियम के जरिये पंजीकरण एवं दस्तावेजीकरण का कानून पारित किया गया है। यही कानून सिख, जैन, बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए लागू होगा।
हिंदू कहते हैं कि बिना कानून के उनकी औरतें बलात्कार या जबरन विवाह का आसान शिकार बनती थीं और अपने रिश्ते को साबित करने के लिए उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। विधवाओं को विशेष रूप से परेशानियां होती थीं।

विवाह के आधिकारिक सुबूत के बिना हिंदू समुदाय के लिए सरकारी दस्तावेज जारी करवाना या वीजा पाने के लिए बैंक अकाउंट खुलवाने से लेकर पैतृक संपत्ति हासिल करना तक संभव नहीं था। हिंदू पाकिस्तान में दूसरे सबसे बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक समूह हैं, जिनकी आबादी 33 लाख है, लेकिन उनके विवाह को पंजीकृत करने के लिए कोई वैधानिक प्रक्रिया नहीं थी। अब जबरन धर्मांतरण के खिलाफ वहां खूब आवाजें उठ रही हैं और इस बुराई को सामने लाने में लोकप्रिय संचार माध्यमों ने प्रभावी भूमिका निभाई है।

हिंदुओं की मौजूदगी पाकिस्तान के संसद में भी है, हालांकि पाकिस्तान में हिंदू विभिन्न इलाकों में बिखरे हुए हैं। करीब 95 फीसदी हिंदू सिंध प्रांत में हैं। थारपकड़ में ज्यादातर जमीनें हिंदुओं की हैं। सिंध के केवल थारपकड़ जिले में ही हिंदू बहुसंख्यक हैं-51 प्रतिशत। अन्य जिले जहां हिंदुओं की बड़ी आबादी है, वे हैं-मीरपुर खास (41 फीसदी), सांघर (35 फीसदी), उमरोकट (43 फीसदी)। करीब 82 फीसदी पाकिस्तानी हिंदू निचली जातियों से हैं, जिनमें से ज्यादातर श्रमिक हैं। जिन शहरों में हिंदुओं की आबादी है, वे हैं-कराची, हैदराबाद, जाकोबाबाद, लाहौर, पेशावर और क्वेटा।

जबरन या आर्थिक प्रलोभन के कारण धर्मांतरित हिंदू इस्लाम का नहीं, बल्कि गरीबों को राहत प्रदान करने और उनके धार्मिक अधिकारों की रक्षा करने में राज्य सत्ता की विफलता का प्रतिनिधित्व करते हैं। शायद यह भी एक मुल्क के रूप में पाकिस्तान की बीमारी के लक्षण हैं। जैसा कि कहा जाता है, अल्पसंख्यकों की स्थिति देश की सेहत का हाल बताते हैं।

पाकिस्तानी हिंदू काउंसिल के अध्यक्ष चेला राम केवलानी ने हिंदू विवाह अधिनियम का स्वागत किया है, खासकर इस तथ्य का कि हिंदू जोड़े के विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष रखी गई है। लंबे समय से हिंदू समुदाय और सिविल सोसाइटी द्वारा अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं के धर्मांतरण के खिलाफ आवाजें उठती रही हैं। अब इस नए अधिनियम के अनुसार, पुरुषों और औरतों, दोनों को विवाह के लिए दो गवाह और हर विवाह को स्थानीय यूनियन काउंसिल में पंजीकृत कराना जरूरी है।

अब यह देखने वाली बात होगी कि यह कानून स्थानीय संस्कृति और परंपराओं से ऊपर जगह बना पाता है या नहीं। संस्कृति एवं परंपरा के नाम पर गैर-हिंदू पाकिस्तानियों को भी, खासकर बड़े नगरों एवं शहरों से दूर-दराज के इलाकों में मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं।

हिंदू विवाह विधेयक के मसौदे के एक प्रावधान, जिसमें कहा गया कि अगर पति या पत्नी, कोई भी धर्म परिवर्तन करता है, तो विवाह रद्द हो जाएगा, का सबने विरोध किया। एक पक्ष का कहना है कि इस प्रावधान से इस बात का डर है कि छोटी बच्चियों की तरह विवाहित महिलाओं का भी जबरन धर्मांतरण के लिए इसका दुरुपयोग हो सकता है। पाकिस्तान के प्रमुख हिंदू समूह ने सरकार से इस विवादित प्रावधान को मसौदे से हटाने की मांग की है। उसका तर्क है कि इससे अल्पसंख्यक महिलाओं का जबरन धर्मांतरण बढ़ेगा।

एक्सप्रेस ट्रिब्यून में ताहा केहर लिखती हैं-हाल के वर्षों में यह समस्या राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर चली गई है और अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बन गई है। पाकिस्तान से अन्य मुल्कों में पलायन की मजबूरी के चलते हिंदुओं के लिए यह एक बुनियादी जरूरत बन गई है कि वे अपने विवाह का वैधानिक दस्तावेज अपने पास रखें। सख्त वीजा कानून और आप्रावासन कानून ने भी हिंदू विवाह को पंजीकृत करने के लिए अलग कानून की जरूरत को बल दिया है।

इसलिए सिंध के अलावा अब मुल्क के अन्य हिस्सों में रहने वाले हिंदुओं के लिए भी विवाह कानून लागू करने की जरूरत है। खैबर पख्तुनवा एवं बलूचिस्तान विधानसभा ने पहले ही प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को इस संबंध में कानून बनाने के लिए अधिकृत कर दिया है। इस बीच इस्लामाबाद में एक संसदीय समिति ने यह सिफारिश की है कि राजधानी विकास प्राधिकरण को एक मंदिर और इस्लामाबाद के हिंदुओं के लिए एक श्मशान का निर्माण करना चाहिए।

लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं
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