मोदी दोबारा के मायने: शुरू-शुरू में विपक्ष के 22 नेता कहते रहे कि अगले प्रधानमंत्री मोदी नहीं बनेंगे

sudheesh pachauriसुधीश पचौरी Updated Wed, 29 May 2019 03:32 AM IST
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जो चुनाव हारे हैं, वे हार के झटके से अभी तक नहीं उबरे हैं और जो जीते हैं, वे अगले पांच साल का नक्शा बना रहे हैं। शुरू-शुरू में विपक्ष के 22 नेता कहते रहे कि अगले प्रधानमंत्री मोदी नहीं बनेंगे। या तो गडकरी बनेंगे या फिर नया प्रधानमंत्री गठबंधन या कांग्रेस से आएगा। अब जब गठबंधन और कांग्रेस बुरी तरह से हार चुके हैं, तो उनके समर्थक बुद्धिजीवी मोदी/भाजपा की धांसू जीत और विपक्ष की हार के कारण खोजने में लगे हैं। इनका कहना है कि विपक्ष के पास मोदी के मुकाबले कोई चेहरा नहीं था। साथ ही विपक्ष के पास भाजपा के ‘राजनीतिक नैरेटिव’ को मात देने वाला कोई वैकल्पिक ‘राजनीतिक नैरेटिव’ नहीं था।
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वे चिल्लाते रहे कि मोदी कहकर भी न विदेश से कालाधन लाए, न किसी को पंद्रह लाख रुपये दिए, न किसानों को सही कीमत दी, न युवाओं को हर बरस दो करोड़ रोजगार दिए। उल्टे राफेल सौदे में भ्रष्टाचार किया और कि ‘चौकीदार चोर है’! इस आलोचना के साथ विपक्षी नेता उत्तर प्रदेश के गठबंधन की सफलता की कल्पना करके कहते रहे कि उत्तर प्रदेश हारी तो भाजपा गई! जाति का गणित भाजपा को हराने की गारंटी है। जाति ही भाजपा के राष्ट्रवाद की काट है।
जब सरकार ने ‘बालाकोट ऐक्शन’ किया, तो विपक्षी कहने लगे कि यह अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए किया कराया है। मोदी सिर्फ ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के अंधराष्ट्रवादी नारे के सहारे जीतना चाहते हैं। कई एग्जिट पोल जब भाजपा को तीन सौ से ऊपर सीट देने लगे, तब भी विपक्ष कहता रहा कि एग्जिट पोल भाजपा का खेल है। लेकिन जब 23 मई को नतीजे आए, तो भाजपा की 303 सीट देख विपक्ष की बोलती बंद हो गई।
ऐसा क्यों हुआ? विपक्ष, कांग्रेस और उसके थिंकटैंक बुद्धिजीवी भाजपा की आसन्न जीत क्यों नहीं देख पाए? मोदी, संघ और भाजपा की ताकत और अपनी ताकत की ऐसी भीषण ‘मिस रीडिंग’ क्यों हुई? इसलिए कि विपक्ष अपने ‘मोदी फोबिया’ के चलते मोदी के दैनिक विमर्शों, संघ और भाजपा के संगठन की ताकत और उनके पांच बरस के शासन की नीतियों और उपलब्धियों को कम से कमतर करके आंकता रहा।
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