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कांग्रेस के लिए परीक्षा हैं ये चुनाव

नीरजा चौधरी Updated Sun, 02 Dec 2018 06:43 PM IST
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भाजपा-कांग्रेस
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जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार शुरू हुआ, तब लग रहा था कि भाजपा को मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़, तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) को तेलंगाना, क्षेत्रीय दल को मिजोरम और कांग्रेस को राजस्थान में बढ़त मिल रही है। लेकिन अब जबकि प्रचार लगभग खत्म हो गया है या होने को है, और ग्यारह दिसंबर को परिणाम आने वाले हैं, तब कांग्रेस राजस्थान में दृढ़ता से आगे बनी हुई है, जबकि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 'कांटे की टक्कर' है। सबसे हैरानी की बात है कि तेलंगाना में लोग बराबर का मुकाबला बता रहे हैं।
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मात्र दो महीने पहले तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव दूसरी बार भारी बहुमत से चुनाव जीतने की स्थिति में दिख रहे थे। हालात उनके इतने अनुकूल थे कि उन्होंने छह महीने पहले ही अपना कार्यकाल खत्म कर चुनाव का आह्वान कर दिया था। पर अचानक हालात बदल गए। कांग्रेस और चंद्रबाबू नायडू, माकपा और टीजेएस (तेलंगाना जन समिति-जिसके प्रमुख ने अलग तेलंगाना आंदोलन का नेतृत्व किया था) के बीच गठबंधन ने केसीआर के लिए चुनौती पैदा कर दी।

नायडू के इस 'मास्टर स्ट्रोक' के अलावा (और उम्मीद है कि आंध्र प्रदेश में भी यह गठबंधन दोहराया जाएगा) चुनाव प्रचार में एक अन्य मोड़ तब आया, जब सोनिया गांधी ने हैदराबाद के बाहरी इलाके मेडचल में एक रैली को संबोधित किया, जिसने कांग्रेस को उत्साह से भर दिया। राज्य गठन के बाद पहली बार तेलंगाना आईं सोनिया ने भावुक होकर लोगों को बताया कि कैसे केसीआर ने उनके बच्चों के साथ दगा किया, जब उन्होंने तेलंगाना को राज्य का दर्जा दिया था। उस समय लाखों लोग चुनावी रैली में मौजूद थे और उनमें से कई लोगों का मानना है कि यदि सोनिया गांधी बड़े पैमाने पर चुनाव प्रचार करने में सक्षम होतीं, तो कांग्रेस या प्रजाकुटिमी (गठबंधन) की जीत की संभावना बढ़ जाती।

मैंने पिछले दो हफ्तों के दौरान मध्य प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना में 2,500 किलोमीटर की यात्रा की, ताकि यह जान सकूं कि लोग क्या कह रहे हैं। सबसे पहली बात जो मैंने महसूस की, वह यह कि राहुल गांधी के प्रति लोगों की धारणा बदल रही है। यह अलग ही राहुल थे, जिन्होंने जोधपुर की रैली में सरल और सीधे तरीके से लगभग चालीस मिनट तक चुटीले वाक्यों (पंच लाइन) के जरिये भाषण दिया। रैली के बाद कई लोगों ने कहा कि राहुल बहुत अच्छा बोले।

लोगों ने उनके पंच लाइन पर उत्साही प्रतिक्रिया दी, जो पहले नहीं होता था। एक दुकानदार ने कहा, जब लोगों का मन बदलना शुरू होता है, तो अन्य चीजें भी स्वीकार्य हो जाती हैं।

आज राजस्थान में इस बात की चर्चा नहीं हो रही है कि कौन-सी पार्टी जीतने वाली है-कांग्रेस या भाजपा? बल्कि चर्चा इस पर हो रही है कि अगले मुख्यमंत्री कौन होंगे-सचिन पायलट या अशोक गहलोत? देखने लायक बात है कि राहुल गांधी के मंदिरों में जाने को लेकर हिंदुओं में कोई प्रतिक्रिया नहीं है। उज्जैन में प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर के आसपास लोगों से बात करने पर लोगों ने कहा, 'देर आए दुरुस्त आए।' 'यह अच्छी बात है कि एक नास्तिक आस्तिक बन गया।' 'अगर कोई जनसेवा करना चाहता है, तो उसे विधाता का आशीर्वाद लेना ही चाहिए।' लोगों का कहना था कि राहुल चुनाव को देखकर ही मंदिर-मंदिर जा रहे हैं, पर ऐसा सभी राजनेता करते हैं!

एक और परिवर्तन दिख रहा है। उत्तर प्रदेश के विपरीत बहुत लोग नोटबंदी की आलोचना कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भाजपा को नोटबंदी का सर्वाधिक लाभ मिला, क्योंकि तब लोगों को लगा था कि मोदी ने अमीरों को सबक सिखाकर गरीबों की मदद की है। जैसे, गुजरात में सूरत के व्यापारियों ने दबे स्वर में बताया था कि किस तरह से उनके व्यवसाय को नोटबंदी से नुकसान पहुंचा है, पर वोट उन्होंने भाजपा को ही दिया था। लेकिन मध्य प्रदेश के कई व्यापारी (ऐसा मुझे ग्वालियर में सुनने को मिला) खुलेआम नोटबंदी और जीएसटी के खिलाफ कांग्रेस को वोट देने की बात कर रहे थे, जिसने उनके व्यापार को नुकसान पहुंचाया। सवर्ण जातियां भाजपा की आरक्षण समर्थक नीति से नाराज थीं, इसलिए उन्होंने सपाक्स नाम से राजनीतिक पार्टी बना ली, जिससे कांग्रेस के मुकाबले भाजपा को ज्यादा नुकसान पहुंचने की उम्मीद है। भाजपा से सवर्ण जातियों के मोहभंग के स्पष्ट संकेत हैं, जिन्होंने लंबे समय से भाजपा का समर्थन किया है।

इसके संकेत हैं कि कांग्रेस ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम जैसे अपने पुराने वोट बैंक की तरफ मुड़ सकती है, जिन्हें इंदिरा गांधी ने काफी प्रयास के बाद खासकर उत्तर प्रदेश में एकजुट रखा था। यह राहुल गांधी के शिवभक्त होने के दावे और मंदिर जाने के पीछे की वजह हो सकती है। वह सभी प्रमुख मंदिरों में गए, जैसा कि उनकी दादी इंदिरा गांधी ने सत्तर के दशक के अंत और अस्सी के दशक के प्रारंभ में किया था। इसके अलावा कांग्रेस की मुस्लिम समर्थक पार्टी की छवि तो है ही।

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि भले ही जितने भी राज्यों में कांग्रेस 2018 में सरकार बना पाने में सफल रहे, लेकिन इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि कांग्रेस पुनर्जीवित हो रही है। वैसे यह कहने की जरूरत नहीं कि चुनावी राजनीति में 'जो जीता वही सिकंदर' होता है। और भले ही परिवर्तन की इच्छा स्पष्ट है, कांग्रेस का संगठन हर जगह कमजोर है। भाजपा के पास जितनी दुरुस्त मशीनरी और पैसा है, उसे देखते हुए यह और भी स्पष्ट दिखता है। वास्तव में तेलंगाना की रैली में लोग खुलेआम कांग्रेस कार्यकर्ताओं से पूछ रहे थे कि वे उन्हें कितना पैसा देंगे। क्या टीआरएस ने जितना पैसा दिया है, वे उससे ज्यादा देंगे?

और एक आखिरी बात नरेंद्र मोदी के बारे में, जो इन राज्य चुनावों के केंद्र में नहीं थे, हालांकि उन्होंने हर जगह प्रचार किया। लेकिन कहीं भी अपनी प्रतिष्ठा को दांव पर नहीं लगाया। फिर भी गुजरात और कर्नाटक की तरह मध्य प्रदेश में भी खासकर युवाओं को मैंने यह कहते हुए पाया कि राज्य चुनाव में भले ही वे गैर भाजपा दलों को वोट दे रहे हैं, पर 2019 में वे मोदी को ही वोट देंगे। 
2019 के लोकसभा चुनाव का नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि विपक्षी एकता कितनी मजबूत होगी। और अभी तो स्थितियां और भी करवट लेंगी। 
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