यह लड़ाई सिर्फ मुरुगन की नहीं

सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 29 Jan 2015 11:12 PM IST
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this is not the fight of murugan only.

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बहुत ही सुंदर और सहज तरीके से पेरुमाल मुरुगन ने गांव में बसे एक छोटे-से परिवार की कहानी लिखी है। इसका नाम है, एक हिस्सा स्त्री, अर्धनारीश्वर का दूसरा नाम। जिस 'नियोग' प्रथा का जिक्र मुरुगन ने किया है, वह तमाम गाथाओं और शास्त्रों में देवों, साधुओं और मामूली इन्सानों की क्रिया के रूप में मौजूद है।
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यह पुस्तक चार साल पहले तमिल भाषा में प्रकाशित हुई थी और बहुत जनप्रिय हुई। किसी ने इसके खिलाफ एक शब्द नहीं बोला। बोलने का कारण भी नहीं था। साहित्य के माध्यम से परंपराओं, धार्मिक रीतियों और देवी-देवताओं के आचरण पर तीखी टिप्पणी करना तमिलनाडु की पुरानी विरासत है। दशकों से उस राज्य में सत्तासीन दोनों ही द्रविड़ राजनीतिक पार्टियां इस विरासत की उत्तराधिकारी हैं। इस परंपरा से जुड़ा सबसे बड़ा नाम ईवी रामास्वामी नायकर 'पेरियार' का है, जिनकी कलम और जुबान, दोनों ही सबसे अधिक तीखी आलोचना के लिए जिम्मेदार थे।
इस सबके बावजूद पिछले वर्ष दिसंबर में अचानक संघ परिवार के लोगों ने मुरुगन की किताब सार्वजनिक तौर पर जलाई, उस पर रोक लगाने की मांग की, उसके खिलाफ जबर्दस्त गाली-गलौज की और जिस घर में मुरुगन रहते हैं, उसे छोड़ने के लिए उन्हें मजबूर किया। 12 जनवरी को जिला प्रशासन ने उन्हें 'शांति वार्ता' के लिए बुलाया। उनके साथ उनके वकील भी गए। बहुत सारे छात्र भी जाना चाहते थे, पर उन्हें मना कर दिया गया। आगे का बयान, उनके वकील से सुनिए- हम लोगों को डीआरओ (डिस्ट्रिक्ट रेवेन्यू ऑफिसर) के कमरे में पहुंचाया गया... डीआरओ ने बिना शर्त माफीनामा लिखने पर जोर दिया, फिर किताब के बहुत हिस्से निकालने की बात की गई। पेरुमल टूट रहे थे...उन्होंने कहा, कुछ भी लिख दो, कुछ भी कर लो, मुझे स्वीकार है...पुलिस ने पेरुमल की तनिक भी मदद नहीं की। जिला प्रशासन ने उन्हें पूरी तरह से नीचा दिखाया। साहित्यिक स्वतंत्रता और संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (अ) की चिंताएं भी नहीं थीं। पेरुमल को भेड़ियों के हवाले कर दिया गया।
जिला प्रशासन और सरकार ने तो संविधान का मजाक उड़ाया ही, द्रमुक और अन्नाद्रमुक पार्टियों ने भी चुप्पी साधकर अपनी विरासत का मखौल उड़ाने का काम किया। केवल स्टालिन ने व्यक्तिगत तौर पर मुरुगन का समर्थन किया। दूसरी ओर, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी ने मुरुगन का समर्थन करने के साथ तमाम बुद्धिजीवियों, लेखकों, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों तथा उनके संगठनों के साथ बड़े प्रदर्शनों का आयोजन किया। तमिलनाडु उच्च न्यायालय ने भी पुस्तक पर रोक लगाने की मांग ठुकरा दी।

यह बात अब सुनने को आने लगी है कि मुरुगन, जो प्राचार्य हैं, निजी शिक्षण संस्थाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ अक्सर बोलते थे। तो क्या निहित स्वार्थ अब अपने बचाव के लिए धर्म के नाम पर हमला करने वाले संगठनों के साथ साठगांठ करके हमारे तमाम अधिकारों को समाप्त करने की नापाक प्रयास में जुट गए हैं? एक बात तो स्पष्ट है। यह लड़ाई तमिलनाडु के मुरुगन अकेले की नहीं, हम सब की है।
लेखिका माकपा की पूर्व सांसद हैं
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