गांधी और गांवों की ओर लौटने का वक्त

K C Tyagiके. सी. त्यागी Updated Fri, 29 May 2020 08:29 AM IST
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सरदार वल्लभ भाई पटेल और महात्मा गांधी (फाइल फोटो)
सरदार वल्लभ भाई पटेल और महात्मा गांधी (फाइल फोटो)

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कोरोना संक्रमण 1918 के बाद का सबसे मुश्किल दौर है। उस समय भी देश में स्पैनिश फ्लू से करीब सवा करोड़ लोगों की जान चली गई थी। फिर 1930 की महामंदी जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर गई थी। इस समय भी हालत बदतर होते जा रहे हैं। लगभग 40 करोड़ भारतीय अपना रोजगार खो चुके हैं। कल-कारखाने भयंकर मंदी के शिकार हैं।
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रोजगार सृजन के उपाय किए जा रहे हैं। लघु उद्योगों के लिए आकर्षक योजनाएं बनाई गई हैं। उद्योग-व्यवसाय को दोबारा खड़ा करने के लिए बैंक और सरकार द्वारा कई राहत पैकेज दिए जा चुके हैं, पर स्थिति नियंत्रण से बाहर है। संक्रमण का खराब दौर अभी आना शेष है, ऐसी आशंका कई विशेषज्ञ जता चुके हैं।
कृषि क्षेत्र से आई खबरें जरूर सकारात्मक एवं अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की दिशा में दिखाई पड़ती हैं। नीति आयोग और रिजर्व बैंक के गवर्नर ने कृषि क्षेत्र की जो तस्वीर पेश की है, वह उत्साहवर्धक है। महामारी के प्रकोप के बावजूद कृषि क्षेत्र में तीन प्रतिशत से अधिक की वृद्धि होने की संभावना है, जबकि भारत की आर्थिक विकास दर-6 फीसदी रहने का अनुमान है।
आगामी खरीफ फसल के लिए भी मौसम का अच्छा अनुमान होने के कारण चावल एवं दालों के रिकॉर्ड उत्पादन के लक्षण हैं। आगामी फसल का रकबा भी पिछले वर्ष के मुकाबले 38 फीसदी अधिक आंका जा रहा है।

कोरोना के कारण संपूर्ण बंदी का दौर किसानों को भी झेलना पड़ा है। शुरुआती दौर में असमय वर्षा, ओलावृष्टि और तेज हवाओं के कारण लगभग 20 फीसदी फसल बर्बाद हो गई। अप्रैल की शुरुआत से रबी की फसल बाजार में उपलब्ध होती है, लेकिन पूर्ण बंदी के कारण यह सिलसिला 20 अप्रैल के बाद शुरू हुआ। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान व मध्य प्रदेश में कुल गेहूं का 80 प्रतिशत उत्पादन होता है। पर मंडियों में किसानों का शोषण जारी है।

सरकारी घोषणा के बावजूद, कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को एम. एस. स्वामीनाथन आयोग की  अनुशंसा के अनुरूप  50 फीसदी से अधिक बढ़ाकर रखा जाएगा, मात्र 4.5 फीसदी की वृद्धि की गई और बारिश की वजह से भीगे गेहूं और सरसों को क्रमशः 200 और 400 रुपये प्रति क्विंटल के कम दामों पर बेचने को मजबूर होना पड़ा।

शायद इसी कारण केंद्र सरकार को मंडी अधिनियम में सुधार करने पड़े, ताकि बिचौलिये और आढ़तियों के कुचक्रों से किसानों को राहत मिल सके। धान एवं दालों के लिए भी सरकारी खरीद की कीमत में वृद्धि न के बराबर है। ऐसे फैसलों से किसान हतोत्साहित होते हैं और सरकारी लक्ष्य हासिल करने में भी परेशानी आती है।

आर्थिक नियोजन के ढांचे को पूर्ण रूप से बदलने का यही सही वक्त है। प्राथमिकताओं की अदला-बदली का दौर भी अब आ चुका है। यह सर्वविदित है कि प्रथम योजना के स्वरूप को लेकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल में वैचारिक भिन्नता थी। नेहरू जी सोवियत मॉडल से प्रभावित थे। वह बड़े उद्योगों को रोजगार प्रदान करने एवं राष्ट्रीय उत्थान के लिए उपयुक्त माध्यम मानते थे। जबकि सरदार पटेल स्वराज्य, ग्रामीण अर्थव्यवस्था का ढांचा मजबूत करने एवं कृषि व लघु उद्योग को प्राथमिकता देकर राष्ट्र को स्वावलंबी बनाना चाहते थे।

सरदार पटेल की असमय मृत्यु ने परिस्थितियां बदल दीं। इस बीच उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक भूमि सुधार लागू कर चौधरी चरण सिंह किसान नेता के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे। तब जमींदारी उन्मूलन एक अविश्वसनीय कार्यक्रम लगता था। उस समय गांव की परती जमीन, रास्तों और आबादी क्षेत्र के साथ नदी, तालाबों तथा जंगल वाले इलाके सभी जमींदार के पास थे।

ज्यादातर किसान पुश्त-दर-पुश्त जिस जमीन पर पसीना बहाकर अन्न पैदा करते, जमींदारों की कृपा दृष्टि फिसलते ही उससे वे बेदखल कर दिए जाते। जमींदारों के कारिंदे किसानों पर ज्यादती करते थे, तो पुलिस भी जमींदारों के साथ खड़ी होती थी। उन दिनों कांग्रेस के नेतृत्व का बड़ा हिस्सा उन्हीं समृद्ध जमींदार परिवारों से आता था।

उत्तर प्रदेश का जमींदारी उन्मूलन तब देश भर की कांग्रेस सरकारों के लिए चुनौती के रूप में था। चौधरी चरण सिंह के इन्हीं सुधारों का नतीजा है कि नक्सलवादी आंदोलन की परछाईं उत्तर प्रदेश में नहीं दिखी, जबकि पड़ोसी राज्य बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और ओडिशा भूमिहीन किसानों के असंतोष के केंद्र बने हुए हैं। गांधी जी के तर्ज पर ही सरदार पटेल एवं चौधरी चरण सिंह पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि को प्राथमिक स्थान देना चाहते थे।

प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि के लिए 36 फीसदी राशि का आवंटन हुआ, जो दूसरी पंचवर्षीय योजना में घटकर 23 फीसदी रह गया। जबकि पहली पंचवर्षीय योजना में उद्योगों के लिए आवंटित राशि मात्र पांच फीसदी थी, जो अगली योजना में बढ़कर 23 फीसदी हो गई। पंडित नेहरू देशभक्त राजनीतिज्ञ थे, इसीलिए 11 दिसंबर, 1963 को लोकसभा में अपनी प्राथमिकता पर अफसोस जाहिर करते हुए उन्होंने कहा था, 'मेरी और योजना आयोग की गलती के कारण देश की आर्थिक संपत्ति का बहुत बड़ा भाग चंद आदमियों के हाथ में इकट्ठा हो गया। मैं लोकसभा को वचन देता हूं कि भविष्य में ऐसी गलती नहीं होगी।'

आज विश्व की अर्थव्यवस्था इतिहास की सबसे बड़ी मंदी की ओर बढ़ रही है। भारत अगर इस मंदी से निपटने में सफल रहा, तो इसका श्रेय देश के पर्याप्त खाद्यान्न भंडार को जाएगा। देश का मौजूदा अनाज भंडार करीब डेढ़ साल तक लोगों की खाद्यान्न संबंधी जरूरतें पूरी करने में सक्षम है। इस आपदा में भी देश के करोड़ों लोगों को मुफ्त भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है।

जो प्रवासी मजदूर गांव लौट रहे हैं, वे ऐसी दुर्दशा के शिकार हुए हैं कि उनका पुनः शहर लौटना आसान नहीं होगा। लिहाजा, पुनः गांधी की ओर लौटना होगा। गांव का ढांचा अब भी रोजगार देने में सक्षम है। जरूरत गांवों को स्वावलंबी बनाने की है। उदारीकरण की बयार ने सिर्फ समृद्धि के कुछ टापुओं का निर्माण किया है। स्वास्थ्य सेवाओं की कुव्यवस्था इसका जीता-जागता उदाहरण है। 29 मई चौधरी चरण सिंह को स्मरण करने का दिन है। वह मानते थे कि देश की समृद्धि का रास्ता गांव एवं खेत-खलिहानों से होकर ही गुजरेगा।
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