काशी ने सिखाया सहिष्णुता का पाठ

आर विक्रम सिंह Updated Wed, 27 Jan 2016 08:06 PM IST
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Kashi Taught lesson of Tolerance

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दादरी, पूर्णिया और मालदा असहिष्णुता के नए उदाहरण हैं। जब पाकिस्तान बनना था, तो असहिष्णुता के तेवर दूसरे थे। आज फिर असहिष्णुता नए तेवर में नए मुकाम तलाश रही है। इस देश को असहिष्णुता के तेवर दिखाते भी नहीं बन रहा। उस समय जिन्ना ने कहना शुरू किया था कि हिंदू-मुसलमान दो कौमें हैं। उनका सह अस्तित्व संभव ही नहीं है। कभी जिन्ना ने जो बहस प्रारंभ की थी, वह अपने राजनीतिक अंजाम तक पहुंच गई थी। जिन्ना खुद भारतीय मुसलमानों को नेहरू-पटेल के हवाले कर चले गए थे। पाकिस्तान की स्वीकार्यता ही शेष भारत की धार्मिक असहिष्णुता का प्रतीक बनी और जब तक पाकिस्तान का अस्तित्व है, यह बहस किसी न किसी रूप में चलती रहेगी। सत्ता की राजनीति ने ही इस संकट को गहरा किया है। अब जब पुनः बहस चली है, तो 1947 का जिन्न इस सवाल के साथ फिर सामने है कि इस बहस का अंत कहां जाकर होगा?
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ऐसे में हिंदू समाज की धार्मिक सहिष्णुता की बेबाक समीक्षा की जरूरत महसूस होती है। हमारे सनातनधर्मी समाज का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक-सांस्कृतिक स्थल निर्विवाद रूप से वाराणसी है। इस नगरी की संस्कृति की सहिष्णुता-असहिष्णुता में क्या मार्गदर्शक भूमिका बनती है, यह विचार योग्य है। काशी ने बहुत से विरोधाभासों को आत्मसात किया है। शिव की इस नगरी में विष्णु भी हैं, हनुमान जी भी, तुलसीदास हैं, तो कबीर भी। काशी में अंतिम अवतार के रूप में बुद्ध भी आए। काशी अलग-अलग दिशाओं से बहने वाली सांस्कृतिक धाराओं को समायोजन व समरसता की ओर ले आती है। यह रामानंद की भक्ति के साथ उन्हीं के शिष्य कबीर के विद्रोह को भी समेटे हुए है। क्या सहिष्णुता, क्या असहिष्णुता! यहां शब्द अपनी अर्थवत्ता खो बैठते हैं।
पता नहीं, काशी से कितने लोग पाकिस्तान गए? गए भी या नहीं। काशी ने फिरोजशाह तुगलक का शासन काल देखा है, जब मंदिरों की नगरी में एक भी मंदिर साबुत नहीं बचा था, जब बलपूर्वक धर्मांतरण का दौर प्रारंभ हुआ था। अत्याचार, प्रताड़ना के बावजूद राख के नीचे सनातन धर्म-संस्कृति का शोला जलता ही रहा। बाद में अकबर-टोडरमल के काल में बहुत से मंदिरों का जीर्णोद्धार हुआ। करीब सौ वर्षो बाद इतिहास के फलक पर औरंगजेब का उदय हुआ। वही औरंगजेब, जिनके नाम पर कल तक दिल्ली में एक सड़क भी हुआ करती थी। औरंगजेब ने काशी में गंगा के तट पर स्थित भगवान विष्णु के बिंदुमाधव मंदिर के साथ-साथ विश्वेश्वर शिव मंदिर को सिर्फ ध्वस्त ही नहीं किया, बल्कि उन परिसरों में विशाल मस्जिदों का निर्माण भी किया। काशी ने उन मस्जिदों के साथ भी रहना सीख लिया। मंदिरों के ध्वस्त होने के बावजूद काशी का महत्व सनातनधर्मी समाज में किसी प्रकार कम नहीं हुआ। मंदिरों का ध्वस्त होना हिंदू समाज की आंतरिक कमजोरियों यथा, जात-पांत, छुआछूत, सामाजिक अक्षमता, भीरूता व अन्य बहुत से कारणों का परिणाम था। भविष्य में भी जो पराजय होगी, वह भी इसी कारण से होगी।
मुगल काल के बाद काशी मराठों के क्षेत्राधिकार में आ गई। यहीं से काशी का स्वर्ण काल पुनः प्रारंभ हुआ। महारानी अहिल्याबाई होल्कर का 28 वर्षों का शासनकाल प्रताड़ित-खंडित समाज के लिए संजीवनी के समान था। उस समय काशी में धर्मांतरित समाज की भी पर्याप्त आबादी थी। मराठों के शासन काल में मंदिरों के ध्वंसावशेषों पर निर्मित मस्जिदों को हटाकर पुनः भव्य मंदिरों का निर्माण संभव था। मराठा सेनापतियों ने ऐसा सोचा भी था। लेकिन काशी ने अपने स्वर्ण काल में भी उन मस्जिदों को ध्वस्त नहीं होने दिया। महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा निर्मित काशी विश्वनाथ मंदिर के शिखरों पर महाराजा रंजीत सिंह ने सोने के पत्तर चढ़ाए। अहिल्याबाई ने धर्म के उत्थान के लिए खजाना खोल दिया, लेकिन इन मस्जिदों को हाथ भी नहीं लगाया गया। उसका क्या कारण रहा होगा?

सेक्यूलर इतिहासकारों ने इसके अपने कारण दिए हैं। किंवदंतियों के अनुसार, काशी के ब्राह्मणों का कहना था कि मस्जिदों को ध्वस्त तो किया जा सकता है, लेकिन उस स्थान का पुनः मंदिर के लिए उपयोग कैसे किया जाएगा? फिर धर्मांतरित समाज के संबंध में यह यक्ष प्रश्न उपस्थित हुआ कि क्या नवनिर्मित मंदिरों के साथ उन्हें भी वापस लाया जा सकता है, क्योंकि वे भी तो ध्वस्त मंदिरों के समान सामाजिक ध्वंस के प्रतिफल थे। यदि नहीं लाया जा सकता, तो उनके पूजास्थलों अर्थात मस्जिदों को ध्वस्त कर देने से क्या हित सिद्ध होने वाला है? वैसे में, क्या एक समाज ‘न हिंदू-न मुसलमान’ की त्रिशंकु गति को प्राप्त नहीं हो जाएगा? इन गंभीर प्रश्नों पर विचार करते हुए तत्कालीन काशीवासी ब्राह्मण समाज ने मस्जिदों को ध्वस्त करने के बारे में अपनी सहमति नहीं दी। दरअसल बड़ा सवाल अनुत्तरित था कि यदि हम धर्मांतरित समाज को पुनः दीक्षित नहीं कर सकते, तो उनके पूजा स्थलों को ध्वस्त करने का औचित्य ही क्या है।

काशी उस दौर में अपने धार्मिक-सांस्कृतिक वैभव की ओर बढ़ती रही, लेकिन हिंदुओं ने अपनी हृदयस्थली में स्थित मस्जिदों के बारे में नहीं सोचा, क्योंकि जो मुस्लिम थे, वे शत्रु नहीं थे। वे राष्ट्रीय पराजय के परिणाम थे। उनसे शत्रुता हो भी नहीं सकती थी। सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े बहुत से कार्य काशीवासी मुस्लिम समाज ने अपना लिए थे। वे क्रमशः काशी के सांस्कृतिक विस्तार के आवश्यक अंग बन चुके थे। चूंकि वे हमारे अपने थे, इसलिए किसी बादशाह, किसी सुल्तान द्वारा बनवा दी गई वे मस्जिदें दुश्मनों की नहीं थीं। इसलिए काशी उन मस्जिदों को खंडित करने के लिए तैयार नहीं हुई।

काशी के इस उदाहरण से सहिष्णुता-असहिष्णुता की बहस की सिर्फ आधारभूमि ही नहीं बनती, बल्कि सबको समाहित करने वाली काशी स्वतः समाधान भी दे देती है।

-लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के सदस्य हैं
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