विज्ञापन

पिछले भूकंप से हमने क्या सीखा, क्या वाकई कुछ भी नहीं?

मरियाना बाबर Updated Fri, 27 Sep 2019 01:52 AM IST
विज्ञापन
भूकंप
भूकंप - फोटो : a
ख़बर सुनें
मैं रावलपिंडी में एक नेत्र रोग विशेषज्ञ के पास गई थी, जब भूकंप के भारी झटकों से धरती हिल उठी। कुछ सेकंडों तक झटका महसूस हुआ और जल्दी ही खत्म हो गया। रिक्टर पैमाने पर इस भूकंप की तीव्रता 5.6 मापी गई, जबकि अक्तूबर, 2005 में आए भूकंप की तीव्रता 7.6 थी, जिसमें कम से कम 75,000 लोग मारे गए थे।
विज्ञापन
मेरे घर पर पेंटर एक बड़ी सीढ़ी पर खड़े होकर पुताई का काम कर रहा था, जिसने भूकंप के झटके से संतुलन खो दिया और जमीन पर गिर पड़ा। हालांकि वह सुरक्षित बच गया, पर डरा हुआ था। लेकिन सबसे बड़ी खबर मीरपुर के एक घर से आई, जिसमें एक बूढ़ी महिला अपने दो दिव्यांग बच्चों के साथ रहती थी। काफी बहादुरी के साथ वह अपने दोनों बेटों को बाहर निकालने में कामयाब रही, जबकि कुछ ही देर बाद वह पूरा घर गिर गया।

वर्ष 2005 के भूकंप में न केवल रावलपिंडी हिल गई थी, बल्कि झटके भी अधिक समय तक रहे थे। तुलनात्मक रूप से इस बार लोगों को बाहर निकलने का पर्याप्त समय मिला। रावलपिंडी सुरक्षित बच गई थी और मैं दोपहर में देर से अपने घर पहुंच पाई। लेकिन सोशल मीडिया और टेलीविजन नए मीरपुर के बारे में अलग ही कहानी बता रहे थे, जो पाक अधिकृत कश्मीर में सक्रिय सामवाल-झरीक कास फॉल्ट लाइन पर स्थित है। यह मुजफ्फराबाद से बहुत दूर नहीं है और सिस्मिक जोन-4 पर है। वर्ष 2005 के भूकंप में मुजफ्फराबाद तबाह हो गया था। बाग, रावलकोट और उनके आसपास के गांवों सहित कुछ इलाके इस बार फिर से प्रभावित हुए हैं। दिलचस्प बात यह है कि पिछले सौ वर्षों से नया मीरपुर में भूकंप नहीं आया है।

इस बार का भूकंप 2005 के भूकंप से अलग है, जब नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ का कश्मीर हिल गया था और बालाकोट, जहां हाल ही में भारतीय जेट विमान ने बम गिराया था,  पूरी तरह बर्बाद हो गया था। उस भूकंप की फॉल्ट लाइन (दरार) बालाकोट के मुख्य बाजार से होकर गुजरी थी, जहां उस समय तीस हजारों लोगों की आबादी थी और बारह यूनियन काउंसिल ने ऐसी स्थिति का सामना किया, जब शवों को दफनाने के लिए कफन और ताबूत की कमी पड़ गई थी। उस भूकंप में 75,000 लोग मारे गए थे।

सौभाग्य से इस बार नुकसान कम हुआ और अब तक पचास से कम लोग मरे हैं, लेकिन सैकड़ों लोग घायल हुए हैं और घर व इमारतें पूरी तरह बर्बाद हो गई हैं। सिंध का एक अखबार लिखता है कि पाकिस्तान के भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार, देश का सबसे बड़ा शहर कराची घटिया निर्माण सहित अपने सभी शहरी खतरों के साथ-साथ 'ध्यान देने योग्य' भूकंपीय खतरे के क्षेत्र में भी स्थित है। कई इलाके इतनी घनी आबादी वाले हैं कि केवल एक हल्के झटके से ही बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हो सकता है।

अक्तूबर, 2005 के विपरीत इस बार भूकंप दोपहर में देर से आया और स्कूलों में छात्र नहीं थे। 2005 में तो स्कूल कब्रिस्तान बन गए थे। पाक अधिकृत कश्मीर के इन शहरों में साक्षरता की दर बहुत ऊंची है, क्योंकि खासकर ब्रिटेन में रहने वाले कश्मीरियों द्वारा शिक्षा के लिए काफी धन भेजा जाता है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि जब फॉल्ट लाइन पर स्थित सरकारी स्कूल दिशा- निर्देशों का पालन करते हैं, तब निजी स्कूल भी उनका पालन करें।

त्रासदी यह रही कि नया मीरपुर जाने वाली सभी सड़कों में भूकंप से दरारें आ गई थीं और बाद में बारिश के कारण वे पानी में डूब गईं। इलाके में चलने और राहत कार्यक्रम चलाने का भी कोई उपाय नहीं था, क्योंकि जल्द ही रात हो गई और चारों तरफ अंधेरा छा गया। संचार और बिजली की सभी सुविधाएं बर्बाद हो गईं।

आज पाकिस्तान में यह सवाल पूछा जा रहा है कि 2005 के भूकंप से हमने क्या सीखा। मीरपुर और आसपास के क्षेत्रों की ओर से आई रिपोर्ट के अनुसार, फॉल्ट लाइन (जो बालाकोट और मीरपुर के कुछ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए एक सतत खतरा पेश करता है) से दूर नया शहर बसाने का प्रस्ताव कभी रखा ही नहीं गया। इसके बजाय भूमाफियाओं ने कुछ जमीनों पर कब्जा कर लिया और कुछ स्थानों पर बनी तीन मंजिला इमारतें आपदा का खतरा पैदा करती हैं। खैबर पख्तुनख्वा की आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रांत के सभी 26 जिले अब प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से संवेदनशील हैं, क्योंकि फॉल्ट लाइन इलाके में होने के साथ-साथ वे खराब मौसम की बढ़ती आवृत्ति का सामना कर रहे हैं।

इस आपदा से निपटने के लिए पहला कदम राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने उठाया, जिसके मुखिया एक सेवारत जनरल हैं। अगले दिन सेना प्रमुख हेलिकॉप्टर से वहां पहुंचे और सेना को तेजी से हालात सामान्य बनाने के निर्देश दिए। चूंकि इस बार आपदा छोटी है, इसलिए इसकी काफी उम्मीद है कि एनडीएमए प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल अफजल ने जो वादा किया है, उसे जल्द पूरा किया जाएगा।

पाकिस्तान में शायद ही कोई ऐसी जगह हो, जहां से भूकंप की फॉल्ट लाइन न गुजरती हो। वर्ष 2007 में योजना आयोग ने आपदाओं से बचने के कुछ सुझाव दिए थे, लेकिन जैसा कि पाकिस्तान में आम है, किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और इसके लिए कोई कदम नहीं उठाया गया।

2005 की तबाही से सरकार की सोच बदलनी चाहिए थी, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसी समझदारी नजर नहीं आती। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, भौगोलिक स्थिति के लिहाज से पाकिस्तान अन्य किसी भी देश की तुलना में प्राकृतिक आपदाओं के लिए ज्यादा संवेदनशील है, ग्लोबल वार्मिंग के कारण ऐसी घटनाओं में भारी वृद्धि हुई है।

एक विचार यह भी सामने आया है कि विदेशी मदद लेने में पाकिस्तान समझदारी दिखाएगा। ठीक है कि इस बार भोजन और दवा की आवश्यकता नहीं है, लेकिन लोग जिन आघात से गुजरे हैं और लोगों की जो जरूरतें हैं, उन पर भी विचार किया जाना चाहिए। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेने से प्रतिष्ठा घट नहीं जाती। हर कोई आपदा आने पर कुछ दिनों तक उस पर ध्यान केंद्रित करता है। पाकिस्तान को याद रखना चाहिए कि उसे नियमित रूप से मूसलाधार बारिश, बाढ़ और सूखे का सामना भी करना पड़ रहा है, जिससे निपटने के लिए दीर्घकालीन रणनीति की जरूरत है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Disclaimer


हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।
Agree
Election
  • Downloads

Follow Us