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विपक्ष को क्या हो गया है

नीरजा चौधरी Updated Mon, 11 Mar 2019 06:18 PM IST
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चुनाव आयोग ने आखिरकार लोकसभा चुनाव के लिए बिगुल बजा ही दिया। अगले पांच वर्षों के लिए सरकार का नेतृत्व कौन करेगा, इसका पता अब आगामी 23 मई को ही चलेगा। चुनाव आयोग की घोषणा से पहले ही हालांकि चुनाव प्रचार शुरू हो गया था। पुलवामा हमले में सीआरपीएफ के 40 जवानों के शहीद होने के बाद से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले तीन हफ्तों से देश के विभिन्न हिस्सों में एक के बाद एक बैठकों को संबोधित किया। हर जगह उन्होंने भावनात्मक भाषण दिया। 'मैं इस मिट्टी की सौगंध खाता हूं' या 'बालाकोट तो बस शुरुआत है आगे और भी कुछ होना बाकी है' जैसी बात कहकर उन्होंने आतंकवाद का समर्थन करने वाले पाकिस्तान को सबक सिखाने की अपनी मजबूत सरकार की मंशा जताई।
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हर बैठक में उन्होंने अपने सामान्य अंदाज में पाकिस्तान और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बना दिया और बताया कि आगामी चुनाव में देश का नेतृत्व करने के लिए एक मजबूत नेता की जरूरत है।

चाहे जिस तरह से भी आप देखें, 2019 के चुनावी संघर्ष के केंद्र में नरेंद्र मोदी ही हैं। पुलवामा हमले से मोदी को लाभ मिलने से पहले पिछले वर्ष राज्य विधानसभाओं के चुनाव के दौरान लोग यह कहते थे कि वे 2019 में मोदी को वोट देंगे। वे निचले (राज्य) स्तर पर परिवर्तन चाहते थे, लेकिन ऊपर (राष्ट्रीय स्तर पर) मोदी को ही चाहते हैं।

पुलवामा ने उस प्रवृत्ति को आगे ही बढ़ाया है। जब एक भावनात्मक मुद्दा लोगों के मानस पर हावी होने लगता है, तो वह कम से कम कुछ हद तक तुरूप का पत्ता बन जाता है। जाति और समुदाय जैसे अन्य विचार सामान्य परिस्थितियों में ही हावी होते हैं। ऐसा 1971 में तब हुआ था, जब इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का स्पष्ट आह्वान किया था। ऐसा आपातकाल के खिलाफ 1977 में उत्तर भारत में भी हुआ था। ऐसा 1984 में भी हुआ था, जब अपने सुरक्षाकर्मियों ने ही इंदिरा गांधी की हत्या कर दी थी। और ऐसा एक हद तक 2017 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी हुआ था, जब लोगों को लगा कि नोटबंदी के जरिये नरेंद्र मोदी ने 'अमीरों को ठोका।' इसने बेरोजगारी पैदा की और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया, लेकिन यह बाद में प्रकट हुआ।

विपक्ष के नेताओं द्वारा कुछ साल पहले कहा जाता था कि मोदी आखिरी क्षणों में अपनी टोपी से खरगोश निकालेंगे। उस खरगोश के बारे में अटकलें लगाई गईं। क्या वह पाकिस्तान कार्ड का इस्तेमाल करेंगे? चीन अब जिस खुले तरीके से पाकिस्तान का समर्थन करता है, उसे देखते हुए क्या वह ऐसा कर सकते हैं? लेकिन अब लगता है कि पुलवामा और बालाकोट वह 'खरगोश' साबित हो सकता है।

राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अपनी जीत और उससे पहले कर्नाटक में सरकार बनाने के बाद कांग्रेस (और वास्तव में विपक्षी नेता) शायद यह समझ बैठे थे कि अपने ही तरीके से वे तस्वीर बदल सकते हैं। विपक्ष अब भी उस वास्तविकता को नहीं समझ पाया है कि उनके दूसरी ओर एक ऐसा नेता है, जिसके पास सत्ता तो है ही, जो किसी भी कीमत पर जीत हासिल करने में यकीन रखता है और उस लक्ष्य की प्राप्ति में भारी ऊर्जा लगता है।

इसके अलावा बालाकोट हमले के बाद देशभक्ति और राष्ट्रवाद के बारे में मोदी के दावे को न तो कांग्रेस और न ही कोई अन्य विपक्षी नेता चुनौती देने में सक्षम है। इसके बजाय मोदी के मैदान (पुलवामा-बालाकोट) पर कमजोर तरीके से लड़ते हुए वे सवाल उठा रहे हैं कि हवाई हमले में कितने आतंकवादी ढेर हुए हैं। इससे मोदी को विपक्ष के सवाल को तोड़ने-मरोड़ने का मौका मिलता है कि वे जवानों की देशभक्ति पर सवाल उठा रहे हैं।

पिछले वर्ष कांग्रेस और राहुल गांधी किसानों के संकट और युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी जैसे ज्वलंत मुद्दों को सामने लाने में सफल रहे थे। लेकिन इस बार चुनाव की घोषणा होने तक विपक्ष चुनाव के लिए एजेंडा निर्धारित करने और आम लोगों को परेशान करने वाले मुद्दों तक पर ध्यान खींचने में अक्षम रहा है।

इस बार के लोकसभा चुनाव को रसायन विज्ञान बनाम अंकगणितीय चुनाव के रूप में पेश किया गया है। यानी मोदी की कैमिस्ट्री बनाम संयुक्त विपक्ष का अंकगणित। 2014 के चुनाव में भाजपा को 31 फीसदी वोट मिले थे, जबकि 69 फीसदी वोट विपक्ष को मिले थे। और विपक्ष इस आधार पर काम कर रहा था कि अगर यह 69 फीसदी वोट एक साथ आ गया, तो वह मोदी को कड़ी टक्कर दे सकेगा, भले उसके पास मोदी का मुकाबला करने के लिए उनके जैसा सर्वस्वीकार नेता न हो। इसीलिए कहा गया कि अगर विपक्षी दल उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे आधा दर्जन बड़े राज्यों में एकजुट हो जाएं, तो भाजपा की 80-100 सीटें कम हो सकती हैं।

हाल के हफ्तों में यह रसायन विज्ञान और अंकगणित बनाम कमजोर अंकगणित का मामला बन गया है। मोदी-शाह की जोड़ी ने जद (यू) और शिवसेना जैसे नाराज सहयोगियों को मनाने पर जोर दिया और उनकी मांगें पूरी कर अलग गठबंधन बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ा।

दूसरी ओर, विपक्ष (जो अपनी 'एकता' पर भरोसा कर रहा था) उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में अपनी सभी ताकतों को एक साथ लाने में अक्षम रहा, जो दो राज्यों में एक नई कहानी बनाने में मदद कर सकते थे।

उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा और रालोद ने गठबंधन किया, लेकिन कांग्रेस को उसमें शामिल नहीं किया, जो विपक्षी मतों में निश्चित रूप से कटौती करेंगे। निश्चित रूप से कांग्रेस को कुछ और सीटें देने से यह संभव था, जो बदले में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और गुजरात जैसे अन्य राज्यों में सपा-बसपा को समायोजित कर सकती थी। इस तरह का गठबंधन होने से दोनों को लाभ होता। दिल्ली में कांग्रेस का 'आप' के साथ न जाने का फैसला अक्षम्य है, क्योंकि इसका नतीजा दीवार पर स्पष्ट रूप से लिखित है।

ऐसा लगता है, मानो पुलवामा के बाद विपक्ष को सांप सूंघ गया है। अगर उनके पास अपने प्रतिद्वंद्वी से टक्कर लेने का मौका है, तो उन्हें तेजी से काम करते हुए आम लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों को चुनावी बहस में सामने लाने की जरूरत है।
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