उदार लोकतंत्र की धीमी मौत...पी चिदंबरम उठा रहे हैं सवाल

पी चिदंबरम Updated Sun, 01 Nov 2020 07:23 AM IST
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सार

हमारे संविधान की प्रस्तावना में ही न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व जैसे शब्द हैं जो परिभाषित करते हैं कि एक राष्ट्र के रूप में हम कौन हैं। फ्रांस की क्रांति के समय यही शब्द युद्ध का नारा थे :  स्वतंत्रता,  समता, बंधुत्व या मौत। फ्रांस के मौजूदा घटनाक्रम में ये शब्द अहम हो गए हैं।
 

विस्तार

भारत के संविधान की एक प्रस्तावना है। बहुत से लोग प्रस्तावना को नहीं पढ़ते या उसका महत्व नहीं समझते। यहां तक कि जो लोग 'मौलिक अधिकार', 'अनुच्छेद 32' या 'आपातकाल' जैसे चुनिंदा प्रावधानों से परिचित हैं, वे भी शायद प्रस्तावना के बारे में नहीं जानते।
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जिस दिन संविधान सभा ने इसे अपनाया, प्रस्तावना ने यह घोषणा की, 'हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने का संकल्प लेते हैं।' (हमारे देश को परिभाषित करने के लिए समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्द जनवरी 1977 में जोड़े गए थे) प्रस्तावना आगे जाकर यह भी घोषित करती है कि 'हम संकल्प लेते हैं कि अपने समस्त नागरिकों को:
  • न्याय...
  • स्वतंत्रता...
  • समता...प्रदान करेंगे और उन सब में 
  • बंधुता को बढ़ाएंगे...'
यही वे शब्द हैं, जो परिभाषित करते हैं कि एक राष्ट्र के रूप में हम कौन हैं और भारतीय गणराज्य-एक उदार लोकतंत्र- कैसा होगा। 

ये शब्द चिरस्थायी हैं

यही शब्द फ्रांस की क्रांति (1789) के समय युद्ध का नारा थे : स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व या मौत। कुछ देश फ्रांस के लोगों को और उन सभी लोगों को जो उसकी सीमा में रहना चाहते हैं, यह याद दिलाने के लिए कि यही वे शब्द हैं, जो हमेशा फ्रांसीसी गणराज्य और फ्रांसीसी लोगों को परिभाषित करेंगे, राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। एक इस्लामी आतंकवादी के हाथों एक शिक्षक सैम्युल पैटी के मारे जाने के बाद मैक्रों ने कहा, 'हम हर तरह के मतभेदों को शांति की भावना से स्वीकार करते हैं। हम नफरत स्वीकार नहीं कर सकते और हम विवेकसम्मत बहस की रक्षा करेंगे। हम यह जारी रखेंगे। हम हमेशा मानवीय गरिमा और सार्वभौमिक मूल्यों के पक्ष में खड़े होंगे।'

अनेक देशों ने इन तीन शब्दों को किसी न किसी रूप में अपने संविधानों में शामिल किया है। वे खुद के उदार लोकतंत्र होने का दावा करते हैं, जैसा कि भारत करता है। हालांकि तेजी से अनेक देशों में, जिनमें भारत भी शामिल है, यह दावा कमजोर साबित हो रहा है। अनेक देश तो पहले परीक्षण 'लोकतंत्र' के रूप में ही नाकाम हैं, अगले परीक्षण की तो बात ही छोड़ें कि ये लोकतंत्र 'उदार' हैं या नहीं।

अंधेरे की ओर

टाइम पत्रिका के हाल के अंक में दुनिया के सौ सर्वाधिक प्रभावशाली लोगों की सूची दी गई है। मैंने इसमें राष्ट्र या सरकार के छह प्रमुखों पर गौर किया : नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग, एंजिला मर्केल, जेएर बोलसोनारो (ब्राजील) डोनाल्ड ट्रंप और साइ इंग वेन (ताइवान)। मोदी और ट्रंप वास्तव में निर्वाचित लोकतंत्रों के नेता हैं, लेकिन वे भी 'उदार' होने की चिप्पी को खारिज कर देंगे। केवल मर्केल और साइ वास्तविक उदार लोकतंत्रों की प्रमुख हैं। यदि आप कुछ बड़े और ताकतवर देशों के प्रमुखों का नाम जोड़ेंगे, तो तस्वीर और बदतर हो जाएगी। मध्य एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और हमारे पड़ोस में निरंकुश और निर्वाचित लोकतंत्रों के अनेक उदाहरण हैं, लेकिन उनमें कोई वास्तविक उदार लोकतंत्र नहीं है। 

टाइम पत्रिका ने मोदी के बारे में लिखा : '...दलाई लामा ने सौहार्द और स्थिरता के उदाहरण के रूप में भारत की प्रशंसा की है। नरेंद्र मोदी ने इन सबको संदेह में डाल दिया... उनकी पार्टी ने न केवल उत्कृष्टतावाद को बल्कि बहुलतावाद को भी खारिज किया...महामारी के संकट की घड़ी विरोध को दबाने का बहाना बन गई। और दुनिया का सबसे जीवंत लोकतंत्र अंधेरे में खो गया।'

अन्य देश भी अपनी परछाई से लड़ रहे हैं। जस्टिस रुथ बादेर गिन्सबर्ग की मौत के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने बिना कोई समय गंवाए जज एमी कोनी बारेट को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के लिए नामांकित किया और नामांकन की प्रक्रिया अप्रत्याशित रूप से सिर्फ तीस दिनों में पूरी कर ली। उदार अमेरिकी, विशेष रूप से महिलाओं को आशंका है कि स्कूल का समावेशन, गर्भपात का अधिकार, सस्ती स्वास्थ्य सुरक्षा और गैरपक्षपाती प्रवासन नियमों के रूप में मिली बड़ी उदार उपलब्धियां हाथ से निकल सकती हैं।

हम कौन हैं?

लोकतंत्र का अर्थ एक उदार देश नहीं होता। किसी लोकतंत्र को थोड़े से समय में 'अनुदारता' में बदला जा सकता है, जैसा कि भारत में हो रहा है। लाखों लोगों की नागरिकता को संदेह में डाल दिया गया है, बोलने की आजादी पर अंकुश लगाया गया है, मीडिया की नकेल कसी गई है, प्रदर्शनों पर रोक है या उन्हें कड़ाई से सीमित किया गया है, राजनीतिक जोड़तोड़ को बढ़ावा दिया जा रहा है, राज्य एक धर्म या एक भाषा को संरक्षण दे रहा है, बहुलतावाद को संस्कृति बताकर बढ़ावा दिया जा रहा है, अल्पसंख्यक और वंचित तबके भय में जी रहे हैं, पुलिस अपने राजनीतिक आकाओं के आदेश का पालन करती है न कि कानून का, सेना राजनीतिक मुद्दों पर भी बोल रही है, कर व कानून लागू करने वाली एजेंसियां उत्पीड़न का औजार बन गई हैं, दुखद बात यह है कि सिर्फ कुछ लोग ही देख रहे हैं कि क्या हो रहा है। और जो लोग देख भी पा रहे हैं, उनमें से कई चुप ही रहेंगे।

जब संसद में बिना मतदान के कानून पारित करवाए गए; जब राजनेताओं को बिना किसी आरोप के महीनों तक हिरासत में रखा गया; जब लेखकों, कवियों, प्रोफेसरों, विद्यार्थियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ राष्ट्रद्रोह के मामले दर्ज हों; जब शताब्दियों पुराने एक धर्म स्थल को ढहा दिए जाने के मामले में किसी को दोषी न ठहराया जाए; जब एक लड़की के मृत्युपूर्व बयान के कई दिनों बाद तक एफआईआर दर्ज न की जाए और किसी को गिरफ्तार न किया जाए, जिसके साथ बलात्कार और बर्बर हमला हुआ था; जब 'एनकाउंटर' शब्द पुलिस की शब्दावली का हिस्सा बन जाए; जब राज्यपाल निर्वाचित सरकारों के कामकाज में बाधा डालें; और जब महत्वपूर्ण संस्थानों को प्रमुखों के बिना छोड़ दिया गया हो या बहुत से पद रिक्त हों, तब देश गहरे अंधेरे की ओर एक कदम आगे बढ़ जाता है।

नवंबर, 2019 में एक बंदूकधारी ने न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च की दो मस्जिदों पर हमला कर 51 लोगों की हत्या कर दी थी। तब प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न ने कहा था, 'वे भी हमारे हैं। वह व्यक्ति नहीं, जिसने हमारे खिलाफ यह हिंसा की।' मैक्रों और अर्डर्न उन कुछ नेताओं में से हैं जो उस स्वर में बात कर रहे हैं, जिसमें हम सुनना चाहते हैं। जब हम उदार लोकतंत्र को मौत की ओर धीमे से बढ़ते देख रहे हैं, तो हमें खुद से पूछना चाहिए कि 'हम कौन हैं'?

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