कैसा भारत चाहते थे गांधी?

Ramchandra Guhaरामचंद्र गुहा Updated Sun, 30 Aug 2015 07:37 PM IST
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What type India Gandhi wanted?

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अपने पिछले कॉलम में अविभाजित भारत के बारे में जो मैंने लिखा, उस पर कई लोगों की टिप्पणियां मुझे मिलीं। कुछ समर्थन में, तो कुछ आलोचना में। हालांकि इसमें अचरज जैसी तो कोई बात है नहीं, क्योंकि विभाजन हमेशा से एक विवादित विषय रहा है। लेकिन इनमें से कुछ प्रतिक्रियाएं वाकई हैरत में डालने वाली थीं। दरअसल, कुछ लोगों ने मुझ पर जवाहरलाल नेहरू का पक्षधर होने, तो कुछ ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस का समर्थक होने की तोहमत लगाई। सवाल यह है कि क्या ये दोनों आरोप किसी एक दिल, दिमाग या भारतीय पर लगाए जा सकते हैं। और अगर वाकई ऐसा है, तो यह कुछ दैवीय बात है। मेरा तर्क साफ था कि अगर 1946 के कैबिनेट मिशन को स्वीकार कर लिया जाता, तो हमें एक विभाजित और कमजोर भारत देखने को मिलता। मगर फिर भी, उन शर्तों पर हुए विभाजन के नतीजे कम भयानक साबित होते। मैं इस कॉलम में दो सवाल उठाना चाहता हूं। पहला, क्या विभाजन को कुछ समय पहले रोका जा सकता था? दूसरा, समय का वह कौन-सा बिंदु था, जिसके बाद कांग्रेस और मुस्लिम लीग की मांगों के बीच सामंजस्य बैठाना मुमकिन नहीं रह गया?
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कुछ लेखक दावा करते हैं कि 1942 में गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन ने विभाजन की आशंका को बढ़ा दिया था। इस आंदोलन की वजह से अंग्रेजी हुकूमत और कांग्रेस के बीच की दूरी बढ़ गई थी, क्योंकि इसके कई नेता जेल में भर दिए गए थे। वहीं, जिन्ना के पास मुस्लिम लीग के संगठन को मजबूत करने और अंग्रेजों के नजदीक आने का भरपूर मौका था। कुछ गहरी याद्दाश्त वाले लेखक शायद विभाजन की जड़ों को 1940 में ढूंढ सकते हैं, जब मुस्लिम लीग ने अपना कथित पाकिस्तान प्रस्ताव पारित किया था। डेविड गिलमार्टिन और वेंकट धुलिपाला जैसे विद्वान भी मानते हैं कि इस प्रस्ताव से पूरे भारत के मुसलमानों में उत्साह की लहर दौड़ने लगी थी और उनके भीतर एक स्वतंत्र राष्ट्र का सपना पनपने लगा था। इसके बाद पाकिस्तान के लिए समर्थन की आवाजें बढ़ती गईं। हालांकि जिन्ना को सभी मुसलमानों की आवाज नहीं माना जा सकता था। मगर, इसमें दोराय नहीं कि 1946 तक आते-आते वह एक ऐसी मांग का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जिसका आकर्षण काफी बढ़ चुका था।
इतिहास में थोड़ा और पीछे लौटते हैं। 1937 में कांग्रेस ने संयुक्त प्रांत में मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार बनाने से इन्कार कर दिया था। एक दूसरे महत्वपूर्ण प्रांत बॉम्बे में कांग्रेस ने अपने नेता के तौर पर ज्यादा योग्य पारसी की जगह एक हिंदू को चुना। इससे कांग्रेस पर बहुसंख्यकों पर आधारित राजनीति करने का आरोप लगा, जिससे सांप्रदायिक विभाजन की भावना को फैलने का मौका मिला। तो क्या विभाजन की जड़ों की तलाश 1937 पर पहुंचकर रुक जानी चाहिए? या फिर इसके लिए थोड़ा और पीछे 1930 में जाना चाहिए, जब विख्यात कवि मुहम्मद इकबाल मुस्लिम लीग के अध्यक्ष चुने गए थे? अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा था, 'उत्तर-पश्चिम में एक संगठित मुस्लिम राज्य का गठन ही कम से कम इस क्षेत्र के मुसलमानों की अंतिम नियति है।' यह पहली दफा था, जब किसी प्रतिष्ठित मुस्लिम ने इतने साफ लफ्जों में विभाजन का समर्थन किया था। क्या यही पाकिस्तान के बनने का आरंभ बिंदु था, और बाद के विचारक इसी कड़ी में मुस्लिम बहुसंख्यक बंगाल से पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत को जोड़ते चले गए? दरअसल, वह आदरणीय इकबाल नहीं थे, जिन्होंने विभाजन के बीज बोए थे। जिस शख्स ने यह काम किया, वह इकबाल से भी ज्यादा आदरणीय थे। वह गांधी थे। गौरतलब है कि 1920 से 1922 के बीच गांधी ने खिलाफत और असहयोग आंदोलन का नेतृत्व किया। खिलाफत आंदोलन के साथ उलेमा के भी हित जुड़े थे, जिसके चलते आधुनिक सोच वाले मुसलमान इससे अलग रहे। असहयोग आंदोलन में ब्रिटिश राज के खिलाफ सड़कों पर व्यापक प्रदर्शन किया गया, हालांकि यह अहिंसक था। लेकिन इससे नरमपंथी अलग रहे। जिन्ना स्वतंत्र सोच वाले मुस्लिम थे, साथ ही, वह नरमपंथियों के भी अगुआ थे। जिन्ना, गांधी के इन दोनों आंदोलनों के खिलाफ थे। इसी वजह से दिसंबर, 1920 में कांग्रेस के महत्वपूर्ण नागपुर अधिवेशन में गांधी के समर्थकों ने उनका जमकर विरोध किया।
1920 तक गांधी और जिन्ना के रिश्ते काफी मधुर थे। मगर उसके बाद उनमें दरार दिखने लगी। तो, वह शायद कांग्रेस का नागपुर अधिवेशन था, जहां विभाजन की जड़ों की अपनी तलाश को हम विराम दे सकते हैं। शायद नहीं। इस यात्रा में हमारा अंतिम पड़ाव 1920 नहीं, बल्कि 1906 होगा, जब मुसलमान जमीदारों और सामंतों का एक समूह वॉयसराय लॉर्ड मिंटो से मिला और उसने हिंदुओं के प्रभुत्व से बचाने के लिए मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग की। उनकी यह मांग मंजूर कर ली गई। 1909 से मुस्लिम मतदाताओं को दूसरी अन्य आबादी से अलग कर दिया गया। विभाजनकारी राजनीति के लिए इसने उत्प्रेरक का काम किया और जिसकी तार्किक परिणति पृथक राष्ट्रों के निर्माण के रूप में सामने आई।

तर्क-वितर्क, साजिश की कहानियां और काफी पहले दिवंगत हो चुके नेताओं के खिलाफ विषवमन निरंतर जारी रहेगा। लेकिन मैं इस कॉलम का अंत विभाजन से आगे जाकर करना चाहता हूं। दो राष्ट्रों के निर्माण से भारतीयों के सामने एक बुनियादी सवाल पैदा हुआ कि जिन मुसलमानों ने भारत में ही रहना स्वीकार किया उनके साथ सरकार का बर्ताव कैसा होना चाहिए?

1947 के बाद भारत में पाकिस्तान से आने वाले हिंदू और सिख शरणार्थियों की बाढ़ जैसी आ गई। उनकी तकलीफों से प्रतिकार की भावना पैदा हुई और फिर दिल्ली सहित उत्तर भारत में मुस्लिमों के विरुद्ध हिंसा भड़क गई। गांधी ने इसका विरोध किया। 15 नवंबर, 1947 को गांधी ने एक भाषण में कहा, 'मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि भारत हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों का है। जो कुछ हो रहा है, उसके लिए आप मुस्लिम लीग पर यह दोष मढ़ सकते हैं और कह सकते हैं कि इसके लिए दो राष्ट्र का सिद्धांत इसकी जड़ में है। आप यह भी कह सकते हैं कि मुस्लिम लीग ने यह जहर बोया। इसके बावजूद मैं यह कहना चाहता हूं कि यदि हम भी दूसरों के साथ ऐसा बुरा बर्ताव करें तो यह हिंदू धर्म के साथ विश्वासघात होगा।'

अपने भाषणों और रेडियो प्रसारणों में गांधी अपने हिंदू भाइयों से कहते थे कि पाकिस्तान में चाहे जो हो रहा हो, आपकी यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि आप मुस्लिमों के साथ भाइयों जैसा व्यवहार करें। और जब उनकी कही बातों का असर नहीं हुआ, तो उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी, जिससे दिल्ली में हिंसा भड़क गई। और फिर 30 जनवरी, 1948 को उनकी हत्या कर दी गई। हिंदू, उनकी ही बिरादरी के एक शख्स द्वारा राष्ट्रपिता की हत्या किए जाने से हतप्रभ रह गए। मुस्लिमों के खिलाफ हमले रुक गए।

भारत के विभाजन के सात दशक बाद इस पर होने वाली बहस का सिर्फ अकादमिक महत्व है। लेकिन इसके अवशेषों को कैसे नियंत्रित किया जाए, यह प्रश्न उतना ही अहम है। हिंदुत्व के पैरोकार अब भी भारतीय मुसलमानों से उनकी वफादारी साबित करने की मांग करते हैं। यहीं पर गांधी के शब्द प्रासंगिक लगते हैं, पाकिस्तान (या बांग्लादेश) अपने अल्पसंख्यकों के साथ चाहे जैसा व्यवहार करते हों, भारत की सरकार और यहां के नागरिकों को प्रतिशोध की नीति से निजात पानी होगी।
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