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गांधी की जाति क्या थी?

Ramchandra Guhaरामचंद्र गुहा Updated Tue, 13 Jun 2017 02:45 PM IST
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रामचंद्र गुहा
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मार्च, 1922 में गांधी को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उन्हें जब अदालत में पेश किया गया, तो मजिस्ट्रेट ने उनसे कहा कि वह अपनी जाति या पेशा बताएं। उन दिनों कानून बहुत कठोर था और कैदी को अपनी पहचान इसी तरह बतानी पड़ती थी। गांधी ने जवाब दिया कि वह एक किसान और बुनकर हैं। मजिस्ट्रेट चौंक गया, उसने उनसे दोबारा यही सवाल किया और उसे जवाब भी वही मिला। 
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हमें अभी याद दिलाया गया है कि गांधी एक बनिया परिवार में पैदा हुए थे। लेकिन 1922 में यदि रहे भी हों तो, बहुत कम बनिया ही किसान या बुनकर रहे होंगे, यहां तक कि आज भी ऐसी ही स्थिति है। गांधी ने खुद के बारे में जो बताया था, वह बिलकुल सही था। साबरमती आश्रम में गांधी व्यापार नहीं करते थे, बल्कि रोजाना कताई करने के अलावा वह खेती के साथ प्रयोग तथा पशुपालन किया करते थे। अहमदाबाद कोर्ट में दिया गया गांधी का वह बयान उनके द्वारा जीवनपर्यंत अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन से जाति को अप्रासंगिक कर दिए जाने का असाधारण उदाहरण है। 

उनकी इस प्रतिबद्धता की झलक पहले ही मिल गई थी। सितंबर, 1888 में मोहनदास गांधी ने, तब वह बीस वर्ष से भी कम के थे, समुद्र के रास्ते से इंग्लैंड जाकर कानून की पढ़ाई करने का फैसला किया। उनके इस कदम ने उनके दकियानूसी मोढ बनिया समुदाय को उद्वेलित कर दिया। समुदाय के मुखिया ने मोहनदास को चेतावनी दी कि अगर वह समुद्री यात्रा करते हैं, तो उन्हें बिरादरी से बाहर कर दिया जाएगा। मगर उस नौजवान ने उसकी बात अनसुनी कर दी और वहां चले गए। प्रस्थान से कुछ दिनों पहले, जैसा कि गांधी ने आत्मकथा में लिखा है, उन्हें हर तरफ से ताना मारा जाने लगा। उन्होंने लिखा, 'मैं कहीं भी जाता था, तो लोग ताने मारते थे। एक बार टाऊनहॉल के करीब से गुजर रहा था कि लोगों ने मुझे घेर लिया और मुझ पर फब्तियां कसने लगे और मेरे भाई को चुप रहकर यह सब देखना पड़ा।' 

बनिये अक्सर कई तरह की सामाजिक बंदिशों से बंधे रहे हैं और आज भी हैं। लंदन में गांधी एक ईसाई जोशिया ओल्डफील्ड के साथ एक घर पर रहे और उसके साथ भोजन भी करते थे। बाद में दक्षिण अफ्रीका में वह और उनकी पत्नी कस्तूरबा हेनरी और मिली पोलक के साथ न केवल एक घर में रहे, बल्कि उनकी रसोई भी एक थी। हेनरी यहूदी थे और मिली ईसाई और दोनों श्वेत थे। तब जोहान्सबर्ग दुनिया के सर्वाधिक नस्लभेदी देश का सर्वाधिक नस्लभेदी शहर हुआ करता था। अपने उल्लेखनीय कार्यों से गांधी दंपत्ति और पोलक दंपत्ति ने भारतीयों के जातिवाद और यूरोपियों के नस्लवाद को खारिज कर दिया।

दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रहों के दौरान एक पारसी रुस्तमजी, एक मुस्लिम काछलिया और एक तमिल नायडू गांधी के करीबी साथी हुआ करते थे। उनके यहूदी मित्र और उनके साथ रहने वाले हेनरी पोलक ने देखा कि किस तरह उन्होंने सारी सीमाएं लांघीं। पोलक ने दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह और उसके नेता के बारे में सजीवता से लिखा, हालांकि दुर्भाग्य से वह प्रकाशित नहीं हो सका।

उन्होंने लिखा, 'जन्म से वह वैष्णव बनिया हैं, मगर प्रकृति में ब्राह्मण हैं; अपने साथियों के शिक्षक हैं, पर उपदेशक के रूप में नहीं, बल्कि अपने व्यवहार से; आवेग में क्षत्रिय हैं, क्योंकि उदारता से उन सारे लोगों की रक्षा करते हैं, जिन्होंने उन पर खुद के संरक्षण को लेकर भरोसा किया है; अपनी पसंद से शूद्र हैं, क्योंकि अपने सबसे कमजोर और तिरस्कृत साथियों के वह सेवक हैं। ऐसा कहा जाता है कि रामकृष्ण ने एक बार एक परित्यक्त की गंदी झोपड़ी की अपने बालों से सफाई की थी, ताकि वह अपने अहंकार और अछूतों के प्रति तिरस्कार की भावना से मुक्त हो सकें। ऊंची जाति में पैदा हुए प्रधानमंत्री (राजकोट) के पुत्र (गांधी) को अपने घर की और उस कारावास की कोठरी की गंदगी की सफाई करते देखा गया, जिसमें उन्हें कैद किया गया था।' 

पोलक ने गांधी के सभी जातियों का होने और कुल मिलाकर किसी जाति को न मानने के बारे में बात करते हुए उनकी सार्वभौमिक आस्था के बारे में लिखा, उनके धर्म का मतलब शक्ति और सहिष्णुता से है। वह जन्म से हिंदू हैं, मगर वह मुस्लिमों, ईसाइयों, पारसियों, यहूदियों, बौद्धों, कन्फ्यूशियों का सम्मान करते हैं और सभी को अपना आध्यात्मिक भाई मानते हैं। वह उनमें से किसी के साथ भेद नहीं करते।

वह यह मानते हैं कि सारे धर्म मुक्ति की ओर ले जाते हैं, यह सब ईश्वर को अलग अलग तरीके से देखने के मार्ग हैं और सभी मनुष्य पहले मानव हैं और उसके बाद ही वह किसी धर्म के अनुयायी। इसलिए सभी धर्मों को मानने वाले यहां तक किसी भी धर्म को नहीं मानने वाले भी उनके मित्र, प्रशंसक और मददगार हैं।'

गांधी के चार पुत्र थे और सभी उनकी तरह तकनीकी रूप से बनिया थे। मगर उनके दो दत्तक पुत्रियों, जिनमें से एक का जन्म निचली जाति के परिवार में हुआ ( लक्ष्मी) और दूसरी अंग्रेज महिला मैडलिन स्लेड थीं, जिन्हें मीराबेन के नाम से जाना गया। दक्षिण अफ्रीका की तरह गांधी ने भारत में भी अपने व्यक्तिगत और राजनीतिक जीवन से व्यापक रूप से जाति और धार्मिक विशिष्टता को अस्वीकार किया। उनके करीबी दोस्त एक ईसाई पादरी सी एफ एंड्रयूज थे, जोकि जीवनपर्यंत भारत के दो सबसे बड़े समुदायों, हिंदुओं और मुस्लिमों में सद्भावना की कोशिश करते रहे। 

अधिकांश भारतीय राजनीतिक दलों की तरह भाजपा जाति या धर्म को बढ़ावा नहीं दे सकती। दलितों को जाटव और गैरजाटव में बांटकर ओबीसी को यादवों और गैरयादवों में बांटकर और भारतीयों को हिंदुओं और मुसलमानों में बांटकर वह चुनाव जीतना और सत्ता में बने रहना चाहती है। इसलिए भाजपा अध्यक्ष द्वारा गांधी को उनकी जाति के आधार पर सीमित किए जाने को समझा जा सकता है। यह अलग बात है कि अमित शाह की टिप्पणी ने उनके अपने और राष्ट्रपिता के नैतिक मूल्यों के बीच की कभी न भरने वाली खाई को प्रदर्शित किया है। 
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