उनका इंतजार कब खत्म होगा

सुभाषिनी अली Updated Thu, 23 Jan 2014 07:07 PM IST
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When kashmiri pundit return their home

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एक और 19 जनवरी बीत गई। यह एक ऐसे दिन की सालगिरह है, जिसे धीरे-धीरे लोग भूलने लगे हैं। 19 जनवरी, 1990 को करीब 40,000 कश्मीरी पंडित परिवारों ने कश्मीर की उस घाटी को बड़ी मजबूरी में छोड़ा, जो कुछ झपकियों में उनके लिए स्वर्ग से नरक में परिवर्तित हो गई थी। घरों को अलविदा कहते समय शायद उन्होंने सोचा होगा कि विदाई कुछ दिनों की होगी, पर 24 वर्षों के बाद भी उस विदाई का अंत होता नहीं दिख रहा है।
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इन परिवारों ने जबर्दस्त भय के माहौल में अपना घर छोड़ा था। 1989 के आम चुनावों में उभरती राजनीतिक ताकतों को बेइमानी का सहारा लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जीत हासिल करने से वंचित रखा। कई प्रत्याशियों को जेलों में बंद कर दिया गया। नई पीढ़ी के एक बड़े हिस्से का विश्वास लोकतंत्र से ही उठ गया और सीमा पार से धार्मिक आतंकवाद के दिखाए जाने वाले सुहाने सपनों का आकर्षण बहुत बढ़ गया। 'आजादी' का नारा घाटी में गूंजने लगा; छोटे बच्चे भी नकाब बांधे आजादी के जुलूसों में शामिल होने लगे।
जिस घाटी में कत्ल की घटना वर्षों में कभी-कभार घटती थी, वहां एके 47 की गोलियों की आवाज तेजी के साथ जानी-पहचानी हो गई। इस माहौल में वे कश्मीरी पंडित, जो कश्मीरी संस्कृति के बराबर के हकदार थे, खुद को अजनबी महसूस करने लगे। कश्मीरियत की जगह आजादी की मांग और धार्मिक उन्माद ने लेना शुरू कर दिया। उनके लिए इन दोनों से खतरा था। उनके पड़ोसी उन्हें शक की निगाह से देखने लगे और कुछ तो उन्हें दुश्मन भी मानने लगे। फिर उन पर हमले शुरू हो गए। कुछ महिलाओं का अपहरण हुआ। मां-बेटी के साथ बलात्कार हुआ। कुछ हफ्तों में ही 600 हत्याएं हुईं।
फारूक अब्दुल्ला की सरकार हट चुकी थी और जगमोहन के नेतृत्व में राष्ट्रपति शासन क्रियान्वित किया जा चुका था, पर सुरक्षा देना तो दूर, सुरक्षा देने का कोई आश्वासन भी शासन की तरफ से नहीं दिया जा रहा था। और फिर 18-19 जनवरी की रात में, शासन की तरफ से ऐलान हुआ कि अगर पंडित परिवार वादी छोड़ना चाहता है, तो उनको पूरी सरकारी मदद मिलेगी, पर सरकार की ओर से सुरक्षा की उम्मीद किसी को नहीं करनी चाहिए।

अपना घर, सामान-असबाब, बाग, खेत, अपनी पूरी सभ्यता छोड़कर करीब तीन लाख औरतें, पुरुष और बच्चे ट्रकों और बसों में लदकर जम्मू लाए गए। यहां उन्हें कई महीनों तक ठिठुरती ठंड में तंबूओं के नीचे रहना पड़ा। करीब साल भर बाद उनके लिए सरकार ने एक कमरे के क्वार्टर बनाए। जिन परिवारों का कोई सदस्य सरकारी कर्मचारी था, उसका तबादला वादी से बाहर कर दिया गया। हर परिवार को सरकार की तरफ से जिंदा रहने भर का राशन मिलने लगा। आज भी लगभग इन्हीं परिस्थितियों में करीब 30,000 परिवार रह रहे हैं।

इन विस्थापितों, खासतौर से महिलाओं की शारीरिक और मनोवैज्ञानिक स्थिति पर 2005 और 2011 में दो सर्वेक्षण किए गए, जिनके नतीजे एक जैसे हैं। घर से बिछड़ने की सबसे गहरी और काली छाप महिलाओं और लड़कियों पर पड़ती है। ठंडी हवाओं के आदी कश्मीरी पंडितों पर मौसम की मार पड़ी, उन्हें मलेरिया और टायफाइड जैसी बीमारियों का शिकार होना पड़ा। घर से दूर होना और संयुक्त परिवार तथा मोहल्लेदारी का टूटना, इन महिलाओं और लड़कियों के लिए नागवार गुजरा।

दोनों ही सर्वेक्षण बताते हैं कि बिना निजता के रहने का असर महिलाओं और लड़कियों के स्वास्थ्य पर बहुत बुरा हुआ। वे कई तरह की बीमारियों का शिकार हो गईं और उनकी मां बनने की क्षमता भी प्रभावित हुई। निजता के अभाव में कई लड़कियां यौन उत्पीड़न का भी शिकार हुईं। इस समुदाय में पहले तलाक नहीं के बराबर होते थे, मगर विस्थापन के कारण तलाक के मामले भी बढ़े। कई परिवारों का यही मत था कि किसी तरह से लड़कों को पढ़ाकर कमाने लायक बना दिया जाए।

24 वर्षों में जम्मू-कश्मीर में कई सरकारें आईं और गईं। लंबे अरसे तक तो राष्ट्रपति शासन ही रहा। केंद्र में भी कांग्रेस, भाजपा, संयुक्त मोर्चा की सरकारें रहीं, लेकिन कश्मीरी विस्थापितों की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया। वह आज भी अधर में लटके हुए हैं। उनके अंदर एक उम्मीद बनी हुई है कि कभी न कभी वह घर जरूर लौटेंगे।

अपने आपको सभ्य कहने वाले समाज के लिए इस सभ्यता के दावे की सच्चाई को साबित करने के लिए विस्थापितों की वापसी आवश्यक है। संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान ने, जिन्होंने अपने जीवन के दौरान बहुत व्यापक और क्रूर विस्थापन देखे, इस समस्या पर काफी गंभीर विचार किया था। उनका मानना था कि विस्थापितों की वापसी के लिए कई बातें जरूरी हैं। पहला, सरकार और शासन अपना इरादा पक्का करें। विस्थापन के जिम्मेदार लोग और समूह अफसोस जताएं, और फिर विस्थापित होने के लिए मजबूर लोगों के साथ हुए जुर्म और अत्याचार के लिए जिम्मेदार लोगों को कानूनी सजा मिले।

अभी तक हमारा समाज अपने सभ्य होने का परिचय नहीं दे पाया है। जुल्म के शिकार और तकलीफजदा लोगों की ओर आंखें मूंदकर ‘अतीत को भुला दो, आगे की सोचो’ का उपदेश देने का उसका रवैया है। कश्मीर की विस्थापित महिलाओं के दर्द का एहसास तो शायद असम के कोकराझार में वर्षों से शिविरों में पड़े विस्थापित या दिल्ली के पुनर्वास शिविरों में मौजूद दंगा पीड़ित सिख विधवाओं और मुजफ्फरनगर में प्लास्टिक के नीचे अपने बच्चों को लिपटाकर सर्द रातों को सिसक-सिसक कर काटने वाली माताएं ही समझ सकती हैं।

2011 में कश्मीर में पंचायत चुनाव हुए थे। इस चुनाव के कई नतीजे आश्चर्यजनक थे, लेकिन एक नतीजा चौंकाने वाला था। बारामुला के वुसान गांव में आशा भट्ट विजयी हुईं। उनका परिवार गांव का अकेला हिंदू परिवार था, लेकिन वह अच्छे बहुमत से जीतीं। आशा मानती हैं कि उनकी विजय उसके समुदाय के लिए एक संदेश है, एक निमंत्रण है। उसके गांव के अब्दुल गनी वानी कहते हैं कि हमने आशा को इसलिए जिताया था कि हमारे बिछड़े पंडित भाई-बहन वापस आ जाएं। आशा और उसके गांव वाले हम सबको रास्ता दिखा रहे हैं।
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