कौन हैं जो देश को तोड़ना चाहते हैं?

तवलीन सिंह Updated Sun, 21 Feb 2016 07:31 PM IST
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Who want to break nation

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पिछले सप्ताह हमने दिल लगाकर यह तय किया कि देशभक्ति क्या चीज है और देशद्रोही का क्या मतलब है। निष्कर्ष यह निकला कि सारा दोष केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का था, जिसने छात्रों के एक 'मामूली प्रदर्शन' को इतने बड़ा हंगामे में तब्दील हो जाने दिया। अधिकतर पंडितों ने प्रधानमंत्री को उपदेश दिया कि छात्र आखिर छात्र होते हैं, सो, उनको अपनी बातें रखने की छूट होनी चाहिए, चाहे उन बातों से देशद्रोह की बू ही क्यों न आती हो। इस दौरान कुछ ऐसे लेख भी छपे, जिनमें यह साबित करने की कोशिश की गई कि जेएनयू में अभी जो कुछ हुआ और हो रहा है, वह सिर्फ इसलिए कि भाजपा इस वामपंथी विचारधारा वाले विश्वविद्यालय पर कब्जा जमाना चाहती है।
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मैंने तमाम लेख पढ़े और खूब सारी टीवी चर्चाएं सुनीं, और यह पाया कि अर्णब गोस्वामी के अलावा किसी ने इस पर रोशनी डालने का प्रयास नहीं किया कि जेएनयू में जो नारे लगे, उनमें जेहाद शुरू करने का संदेश छिपा था। ऐसे नारे कोलकाता की जाधवपुर विश्वविद्यालय में भी सुनने को मिले हैं।
इस पर कुछ कहने से पहले मैं यह कहना चाहूंगी कि कन्हैया कुमार को गिरफ्तार करके गृह मंत्रालय ने गलती की। उस पर राजद्रोह का आरोप लगाकर उसे हीरो बना दिया गया है। बाद में जेएनयू के कई छात्रों ने उन नारों को नकारा और साबित करना चाहा कि कन्हैया कुमार इस तरह के नारे नहीं लगा रहा था। लेकिन सुन तो रहा था। उसने उन लोगों को रोकने की कोशिश क्यों नहीं की, जो नारे लगा रहे थे? कन्हैया कुमार को अगर जेल न भेजा गया होता, तो उससे ये सवाल पूछे जा सकते थे। अब कहां से शुरू करेंगे वह जांच-पड़ताल, जिसकी गंभीर आवश्यकता सिर्फ जेएनयू में नहीं, जाधवपुर और अन्य विश्वविद्यालयों में भी है? ये जांच इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इसी से मालूम पड़ेगा कि भारतीय विश्वविद्यालयों में क्या सचमुच ऐसी जेहादी ताकतें घुस गई हैं, जिनका मकसद भारत को तोड़ना है?
हमारी समस्या यह है कि हमारे तमाम वामपंथी राजनीतिक दल इस डरावने यथार्थ का सामना करने से कतराते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि ज्यादा बोलने से मुस्लिम मतदाता कहीं नाराज न हो जाएं। सो, कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी के बाद जेएनयू छात्रों के साथ हमदर्दी जताने के लिए राजनेताओं की लंबी कतार लग गई, जिसमें राहुल गांधी भी थे। किसी ने उनसे नहीं पूछा कि क्या वह भारत की बर्बादी और कश्मीर की आजादी का समर्थन करते हैं। उलटे मीडिया ने इन नारों से ध्यान हटाकर उस पटियाला हाउस पर ध्यान केंद्रित किया, जहां भाजपा के एक विधायक और उसके साथियों ने न सिर्फ छात्रों की, बल्कि पत्रकारों की भी पिटाई की। ऐसी हिंसा गलत है, लेकिन क्या अब भी हम उन नारों की ओर वापस नहीं लौट सकते, जिनका स्पष्ट संदेश देश को तोड़ना है?

मुझे उन नारों से तकलीफ हुई है। अगर मैं गृह मंत्री होती, तो कन्हैया कुमार को गिरफ्तार करने के बदले इसकी जांच करवाती कि नारे लगाने वाले छात्र कौन थे। जेएनयू के छात्र कह रहे हैं कि अजनबी लोग उनके बीच घुस आए थे। अगर ऐसा है, तो यह काफी गंभीर है। गृह मंत्री से मेरा विनम्र सुझाव है कि वह कन्हैया को बाइज्जत बरी कर दें, ताकि हम उस जांच पर ध्यान केंद्रित कर सकें कि यह सब क्यों हो रहा है, और इसके पीछे कौन है। कन्हैया कुमार को गिरफ्तार करने से इस महत्वपूर्ण विषय से ध्यान हट गया है।
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