प्रॉपर्टी की कीमत में गिरावट क्यों नहीं

मधुरेंद्र सिन्हा Updated Thu, 18 Feb 2016 06:49 PM IST
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Why not drop in property prices

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देश में रियल एस्टेट की कीमतें ठहर गई हैं और कई इलाकों में दाम गिरे भी हैं, लेकिन डेवलपर आगे कीमतें गिराने को तैयार नहीं हैं। वह भी ऐसी स्थिति में, जब बाजार में ग्राहक नहीं हैं। हालत यह है कि दिल्ली-एनसीआर और मुंबई-नवी मुंबई में तीन लाख से भी ज्यादा फ्लैट बिकने को तैयार हैं, लेकिन उनके खरीदार नहीं है। यह विचित्र स्थिति है, क्योंकि यह मांग और आपूर्ति के साधारण से आर्थिक नियम के सरासर विरुद्ध है। इसका मतलब है कि रियल एस्टेट डेवलपर हर हालत में कीमतों को उसी स्तर पर बनाए रखने के लिए अड़े हुए हैं। इसका नतीजा है कि उनके पास धन की कमी हो गई है और उनकी चल रही परियोजनाओं में भी विलंब हो रहा है। इसका खामियाजा उनके ग्राहक उठा रहे हैं। डेवलपर इस समय दाम घटाने के बजाय खरीदारों को लुभाने की कोशिश में लगे हुए हैं। वे उन्हें बड़े-बड़े गिफ्ट भी दे रहे हैं, मसलन कारें, विदेश यात्राएं वगैरह। इन सबके पीछे मकसद एक ही है कि दाम न गिरने पाएं। इसका नतीजा है कि रियल एस्टेट सेक्टर में मंदी के बावजूद दाम उस तरह नहीं गिर रहे, जितने गिरने चाहिए थे।
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देश में जब तेजी का दौर आया, तब रियल एस्टेट भी बढ़ा। लाखों मकानों की जरूरत महसूस हुई और तेजी से निर्माण शुरू हुआ। धड़ाधड़ फ्लैट बनने लगे और डेवलपर बड़े पैमाने पर पैर फैलाने लगे। बाजार में आई तेजी का उन्होंने खूब फायदा उठाया। उधर फाइनेंसर तथा सटोरिये मैदान में आ डटे और उन्होंने भी पैसा लगाना शुरू कर दिया। नतीजतन दाम आसमान छूने लगे। मुंबई तो छोड़िए, गुड़गांव में फ्लैटों की कीमतें करोड़ों में जा पहुंची। यह जमीनी हकीकत से दूर की स्थिति थी, जिसका हश्र ऐसा ही होना था। आज ऐसे महंगे मकानों के खरीदार बाजार में हैं ही नहीं। खरीदारों का तर्क सीधा-सा है कि जब सिंगापुर, हांगकांग जैसी बिजनेस सिटी में इनसे कम दाम पर मकान मिलते हैं, तो यहां यह तेजी क्यों? गुड़गांव या यहां तक कि अब मुंबई में भी आखिर ऐसा क्या है कि पांच-छह करोड़ में तीन बेडरूम के फ्लैट बिकें? जिन लोगों के पास पर्याप्त पैसा था, उन्होंने तो खरीद लिया, लेकिन अब ग्राहक बाजार से गायब हो गए हैं।
दरअसल आम जन प्रॉपर्टी में निवेश करके अपना भविष्य सुरक्षित करना चाहता है और ऐसा हुआ भी। लेकिन मकानों की कीमतें इतनी बढ़ती चली गईं कि उसने प्रॉपर्टी में निवेश बंद कर दिया। इस तरह से खरीदारों का एक वर्ग बाहर हो गया। यही हाल सटोरियों का रहा, जो ज्यादा समय तक प्रॉपर्टी अपने पास नहीं रख सकते। वे भी अपना पल्ला झाड़कर बाहर हो गए।
अब ऐसी परिस्थितियों में मकानों की कीमतें गिरनी ही चाहिए। डेवलपर यह तर्क दे सकते हैं कि उन्होंने जमीन महंगी खरीदी थी। लेकिन अगर हम ध्यान से देखें, तो पाएंगे कि अब कंस्ट्रक्शन में काम आने वाले सामान की कीमतों में भारी गिरावट आई है। मकान बनाने में तीन कारक सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। वे हैं-मजदूरी, सीमेंट और स्टील। बेशक मजदूरी में गिरावट नहीं आई है, लेकिन नए यंत्रों के इस्तेमाल से उसकी लागत में कटौती हो रही है।

सबसे बड़ी गिरावट आई है स्टील की कीमतों में। मकान में काम आने वाले सरिया की कीमतें इन दिनों 36 हजार रुपये प्रति टन के आसपास हैं, जबकि तीन-चार साल पहले यह पचास हजार रुपये के पार था। इसी तरह सीमेंट की कीमतों में भी गिरावट आई है। एक समय सीमेंट कंपनियों ने कार्टेल बनाकर इनकी कीमतें कृत्रिम तौर पर बढ़ा दी थीं। लेकिन सीसीआई द्वारा भारी जुर्माना लगाए जाने के बाद अब सीमेंट की कीमतें भी गिर गई हैं। दिवाली से अब तक इसके भाव सौ रुपये प्रति बोरी गिर गए हैं। इस तरह डीजल की कीमतों में भी थोड़ी गिरावट आई ही है और पेट्रोल के भी दाम गिरे हैं। इन सभी को देखते हुए इनका लाभ ग्राहकों को मिलना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा।

बैंकों की ब्याज दरों में अब धीरे-धीरे कटौती की जा रही है और इसका फायदा सभी को मिलना चाहिए। सच्चाई है कि ब्याज दरों में गिरावट के साथ-साथ डेवलपरों को कीमतें भी गिरानी चाहिए। आने वाले समय में ब्याज दरें और गिरेंगी और दाम भी उसी अनुपात में गिरने चाहिए। रियल एस्टेट के खरीदार भी उस दिशा में देख रहे हैं, क्योंकि ऊंची ब्याज दरों ने मकान खरीदने की उनकी इच्छा पर पानी फेर दिया है। लेकिन वे समझदार भी हो गए हैं और लुभावने विज्ञापनों के बावजूद इंतजार कर रहे हैं कि दाम गिरकर उनकी पहुंच में आ जाएं। ऐसे में रियल एस्टेट के खिलाड़ियों को दाम गिराने के बारे में सोचना चाहिए।

देश में रियल एस्टेट का भी एक कार्टेल है और राजनीतिज्ञों तथा अफसरों के साथ मिलकर वे खेल करते रहे हैं। लेकिन अब इस क्षेत्र में पारदर्शिता आने लगी है। कड़े कानून और रेगुलेटर के आ जाने से इसका भी असर दिखेगा। सरकार को रियल एस्टेट सेक्टर की मदद भी करनी चाहिए, ताकि दाम कम हों। अभी एक परियोजना शुरू करने के पहले 50 से भी ज्यादा क्लियरेंस लेने होते हैं, जिनसे न केवल समय बर्बाद होता है, बल्कि धन की भी बर्बादी होती है। इसका खामियाजा डेवलपर नहीं, ग्राहक भुगतता है। अगर प्रक्रिया को आसान बना दिया जाए, तो कीमतों में कमी निश्चित रूप से होगी।

रियल एस्टेट के खिलाड़ी अगर चाहते हैं कि उन्हें फिर से खरीदार मिलें, तो उन्हें प्रापर्टी की कीमतों में कम से कम 20 प्रतिशत की कटौती करनी ही होगी। उसके बाद ही ग्राहक उनके पास आएंगे। इन कीमतों पर तो खरीदारों की कमी बनी ही रहेगी, क्योंकि इस समय बाजार में मुट्ठी भर जरूरतमंद ही बैठे हैं। अगर कीमतें गिरती हैं, तो उसका लाभ न केवल ग्राहकों को, बल्कि वित्तीय संस्थाओं और रियल एस्टेट डेवलपरों को भी मिलेगा। उसी से फिर एक सिलसिला चल निकलेगा।
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