धर्मस्थलों में स्त्रियों के प्रवेश पर पाबंदी क्यों

सुधांशु रंजन Updated Tue, 02 Feb 2016 06:28 PM IST
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 Why the ban on women entering religious places

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धर्म के नाम पर शताब्दियों से अपने खिलाफ चले आ रहे भेदभाव को खत्म करने के लिए महिलाएं कृतसंकल्प दिखती हैं। वे अपना अधिकार मांग रही हैं। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के शनि शिंगणापुर मंदिर में स्त्रियों को प्रवेश नहीं करने दिया गया, हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी है। केरल के सबरीमला स्थित अयप्पा मंदिर में 10 से 50 वर्ष की उम्र की औरतों के प्रवेश पर रोक है। यह मामला उच्चतम न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। मुंबई के हाजी अली शाह दरगाह में भी स्त्रियों के प्रवेश पर पाबंदी है। कुछ मुस्लिम महिलाओं ने बम्बई उच्च न्यायालय में इसे चुनौती दी है। न्यायालय ने कहा है कि वह सबरीमला मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की प्रतीक्षा करेगा। यानी उच्चतम न्यायालय का निर्णय ऐतिहासिक होने जा रहा है, जो महिलाओं के मौलिक अधिकार बनाम धर्म की स्वतंत्रता को परिभाषित करेगा।
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उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर सबरीमला के अयप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को चुनौती दी गई है। अभी न्यायालय को इस पर विचार करना है, किंतु न्यायमूर्ति दीपक मिश्र के मौखिक कथन पर बहस छिड़ गई है, जिसमें उन्होंने कहा कि संविधान उम्र, लिंग या जाति के आधार पर भेदभाव की इजाजत नहीं देता है। इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने याचिका दायर कर अदालत से निर्देश जारी करने की प्रार्थना की है, ताकि सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश मिले। जनहित याचिका में दलील दी गई है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 25 एवं 26 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है।
तर्क दिया जा सकता है कि संविधान का अनुच्छेद 25 किसी धर्म को अपने तरीके से व्यवहार में लाने, उसे प्रकट करने एवं उसका प्रचार करने की छूट देता है। इस आधार पर पुजारियों को अधिकार है कि वे इसकी व्यवहार पद्धति को निर्धारित करें। परंतु इस अनुच्छेद में इसकी सीमा भी निर्धारित कर दी गई है कि इस अधिकार का इस्तेमाल सार्वजनिक व्यवस्था, शांति, नैतिकता एवं अन्य मौलिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा।
न्यायमूर्ति मिश्र का यह कथन तार्किक है कि सार्वजनिक पूजा स्थल तथा मठ में फर्क है। अदालत को यह विचार करने का पूरा अधिकार है कि कोई खास रिवाज उस धर्म का अभिन्न अंग है या नहीं। यह समीक्षा संबंधित धर्म के सिद्धांतों के आधार पर की जाएगी। राजस्थान बनाम सज्जन लाल मामले में उच्चतम न्यायालय ने जैन धार्मिक न्यासों के प्रबंधन के संबंध में धार्मिक सिद्धांतों पर विचार किया। वर्ष1954 में सर्वोच्च अदालत ने रतिलाल पानचंद गांधी बनाम बम्बई में व्यवस्था दी थी कि संविधान के अनुच्छेद 25 (2) (क) के तहत राज्य वैसी गतिविधियों को नियंत्रित कर सकता है, जो आर्थिक, वाणिज्यिक या राजनीतिक चरित्र के हों, भले ही उनका संबंध धार्मिक रिवाजों से हो। इसके अलावा, अनुच्छेद 25 (2) (ख) के अंतर्गत सामाजिक सुधार के उपायों की छूट है और इसे धर्म के साथ हस्तक्षेप के नाम पर खारिज नहीं किया जा सकता। कानून की कसौटी पर लिंग के नाम पर किसी प्रतिबंध को उचित ठहराना मुश्किल है। मासिक धर्म के समय महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर विचार वैज्ञानिक दृष्टिकोण से करने की जरूरत है।
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