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जर्मन के प्रति यह अनुराग क्यों

sudheesh pachauriसुधीश पचौरी Updated Tue, 25 Nov 2014 07:25 PM IST
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Why this passion for German
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जर्मन भाषा की जगह संस्कृत पढ़ाए जाने के आदेश को लेकर जिस तरह की बहस छिड़ी है, उससे विगत कांग्रेस शासन की भाषाई ‘चोर नीति’ न केवल पकड़ी गई है, बल्कि भारतीय स्कूलों में विदेशी भाषाओं और उनके लिए सक्रिय तत्वों और सत्ता की साठगांठ भी खुल गई है। यह इसी देश में हो सकता है कि अपनी प्राचीन भाषा संस्कृत की पढ़ाई का आदेश दिए जाने पर जर्मनी के राजदूत सबसे मुखर होकर बोल रहे हैं, और बताया जाता है कि जर्मन चांसलर तक ने मोदी से आग्रह किया कि जर्मन की पढ़ाई जारी रखने की बाबत कुछ करें!
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अजीब सीन है! हमारे देश में कौन-सी भाषा पढ़ाई जाए, इसमें एक पराया देश हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रहा है और जिसका साथ कुछ देसी अंग्रेज देते दिखते हैं! ऐसा हस्तक्षेप जर्मनी में भारत करे, तो कैसा लगे? एक संप्रभु देश की भाषा नीति पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है! नए आदेश के अनुसार, जर्मन भाषा की गैरकानूनी तरीके की अनिवार्यता को हटाया गया है और छात्र हित में एक वैकल्पिक भाषा के रूप में पढ़ाने की व्यवस्था दी गई है। फिर भी अंग्रेजी मीडिया में हल्ला इस तरह मचाया जा रहा है, मानो इस देश में संस्कृत कोई विदेशी भाषा हो और जर्मन संविधान की अधिसूचित भाषा!

अगर त्रिभाषा फॉर्मूले के नजरिये से देखें, तो केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन को तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाया जाना त्रिभाषा फॉर्मूले की शुद्ध अवहेलना था। यह धतकरम त्रिभाषा फॉर्मूले के नियमों की अनदेखी करके नहीं, उसके विपरीत जाकर किया जा रहा था। बताया जा रहा है कि जर्मन को तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाने के लिए एक जर्मन संस्थान और केंद्रीय विद्यालय बोर्ड के बीच ‘समझौता’ किया गया था। इससे ऐसा लगता है कि जर्मन पढ़ाने का जो काम हो रहा था, वह ‘कानूनी’ था। सच यह है कि त्रिभाषा फॉर्मूले के अंतर्गत तीसरी भाषा पढ़ाने के लिए देशी भाषाओं में से किसी एक को चुना जा सकता है, किसी विदेशी भाषा को नहीं।

सवाल यह है कि जर्मन की अनिवार्यता को हटाने का सरकार ने मन क्यों बनाया। इसका जवाब मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने स्वयं दिया है कि वह संविधान की शपथ से बंधी हैं और तीसरी भाषा के रूप में जर्मन की पढ़ाई जारी रखना त्रिभाषा फॉर्मूले की अवमानना है। उन्होंने यह भी कहा कि बीच सत्र में जर्मन की पढ़ाई छोड़ने से बच्चों की हानि न हो, इसके लिए, जर्मन की पढ़ाई को वैकल्पिक भाषा के रूप में जारी रखा जा सकता है, लेकिन तीसरी भाषा के रूप में उसकी जगह संस्कृत पढ़ाई जानी चाहिए। स्मृति ईरानी ने जारी गलती को सुधार कर एकदम ठीक काम किया है। लेकिन कुछ लोग तर्क दिए जा रहे हैं कि यह छात्रों और जर्मन भाषा, दोनों के साथ अन्याय है। क्या वाकई जर्मन के साथ अन्याय हो रहा है?

नियमतः एक विदेशी भाषा वैकल्पिक ही हो सकती है, अनिवार्य नहीं। अगर विदेशी भाषा अनिवार्य हो सकती हो, तो जर्मनी को अपने देश में संस्कृत या हिंदी को अनिवार्य पठनीय भाषा के रूप में मान्यता देने की पहल करके दिखाना चाहिए। भाषा का बिजनेस एकतरफा क्यों हो? मंत्री के उठाए कदम के आलोचक पहले इस एकतरफा बिजनेस को दोतरफा करने की दलील क्यों नहीं देते? साफ कहने की जरूरत है कि भारत किसी विदेशी भाषा का पीकदान नहीं है। जर्मन के पक्षधर जरा बताएं तो कि जर्मन के प्रति उनका यह विकट अनुराग किस कारण है? स्पैनिश, फ्रेंच, लैटिन, यूनानी या चीनी भाषा को क्यों नहीं लिया गया? और अगर लेना ही था, तो त्रिभाषा फॉर्मूले को धता बताकर क्यों लिया? सबसे अजीब तर्क जर्मन राजदूत के रहे, जिन्होंने एक अंग्रेजीपरस्त अखबार में जर्मन और संस्कृत के साम्य और जर्मन की अनिवार्यता पर स्कूली बच्चों जैसे तर्क दिए। कैसा अजीब तर्क है कि पुरखा भाषा से बराबरी कर जर्मन का मार्केट बनाया जा रहा है।

आजकल भाषा एक बड़ा बिजनेस है। अंग्रेजीपरस्त भाषा नीति के फलस्वरूप, अंग्रेजी की बड़ी व्यापारिक सफलता को देखकर फ्रेंच, जर्मन और स्पैनिश भाषाएं इस देश में अपने ग्राहक ढूंढ रही हैं, ताकि अपने शिक्षा-व्यवसाय को और बढ़ा सकें। वे हमारे स्कूलों मे अपनी भाषाओं के लिए जगह बनवाकर, अपने विश्वविद्यालयों के लिए भावी शिक्षार्थी तैयार करती रहती हैं, जो उनको यूरो-डॉलर देकर वहां जाकर पढ़ें! मीडिया में निकलने वाले विज्ञापन बताते रहते हैं कि उन्हें भारतीय छात्रों की जरूरत है, ताकि उनकी कमाई हो सके।

इंग्लैंड और अमेरिका के अनेक विश्वविद्यालय जब से लाखों भारतीय विद्यार्थियों को आकर्षित कर अरबों डॉलर की कमाई करने लगे हैं, तब से यूरोप के अन्य देश भी भारतीय छात्रों को पटाने में लगे नजर आते हैं। भारतीय छात्र स्कूल में जर्मन पढ़ेंगे, तो उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी ही जाएंगे। यह है जर्मन की वर्चस्वकारी नीति, जो ज्ञान पर हावी रहेगी! यही नक्शा है भाषा के बिजनेस का!

यह इस देश की भाषाओं का दुर्भाग्य है कि उनके पक्ष में बोलना पिछड़ापन कहलाता है, और विदेशी भाषा को आधुनिक होने का तमगा देता है। जब हिंदी बोलना, उसके पक्ष में बोलना कई अंग्रेजीपरस्तों के लिए हिंदूवादी होना हो उठता है, तो संस्कृत का पक्ष लेना कुफ्र से कम न होगा। संस्कृत का एक दुर्भाग्य यह भी है कि उसे पंडागीरी की भाषा मान लिया गया है। उसके वकील अगर कोई बनते हैं, तो उमा भारती या अशोक सिंघल, जिनके छूते ही संस्कृत को हिंदुत्ववाद से जोड़ दिया जाता है और उसे सांप्रदायिक भाषा की तरह पेश किया जाने लगता है! कौन बताए कि संस्कृत ज्ञान की बड़ी भाषा थी, और अब तक है, अगर उसे कोई पढ़े तो। उसका आकर्षण तो इतना है कि उसके धुर विरोधी सेक्यूलर तक अपने बच्चों के नाम संस्कृतगर्भित रखते हैं!

‘गुड़ खाएं और गुलगुलों से परहेज’ छाप विमर्श इसी को कहते हैं!
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