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हिंदी पट्टी में बदलाव की हवा

नीरजा चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार Updated Tue, 11 Dec 2018 08:39 PM IST
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नीरजा चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार
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पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को 2019 का सेमी फाइनल बताया जा रहा था, जिसमें कांग्रेस विजयी रही है। पांच में से तीन राज्यों-राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पुनर्जीवित हुई है। हिंदी पट्टी में बदलाव की यह हवा बेहद महत्वपूर्ण है, जिसे आगामी लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखा जाना चाहिए।
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राहुल गांधी निर्विवाद रूप से कांग्रेस की इस जीत के नायक हैं। इन चुनावों में उन्होंने तीन मुद्दे उठाए, जो कामयाब रहे। ये मुद्दे थे-किसानों का आक्रोश, युवाओं में  व्याप्त बेरोजगारी और आरक्षण। इसके अलावा उन्होंने नोटबंदी का भी मुद्दा उठाया। चुनावी सभाओं में नोटबंदी पर लोगों की नाराजगी मैंने साफ-साफ महसूस की। राहुल गांधी ने करीब सत्तर रैलियां कीं, जो प्रधानमंत्री की चुनावी रैलियों से ज्यादा थीं, सटीक रणनीति बनाई और मंदिरों में गए। मंदिरों में राहुल की परिक्रमा को लोगों ने सकारात्मकता के साथ लिया। 

कांग्रेस हिंदी पट्टी के तीनों राज्यों में सरकार बनाने जा रही है, जो उसकी बड़ी उपलब्धि है। इसमें राजस्थान को छोड़ दें-जहां टिकट वितरण में अव्यवस्था, जिस कारण कुछ कांग्रेसी बागी बन गए और अशोक गहलोत व सचिन पायलट के बीच बाद के दिनों में पैदा मतभेद का थोड़ा असर पड़ा, तो मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने शानदार तरीके से काम किया। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की कद्दावर छवि भाजपा के लिए आश्वस्त करने वाली थी। लेकिन कांग्रेस द्वारा टिकट वितरण में पारदर्शिता और दिग्विजय सिंह की बैकडोर रणनीति ने पार्टी को लाभ पहुंचाया। कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच मतभेद भी वहां बहुत गहरे नहीं हो पाए।

जबकि छत्तीसगढ़ में पीएल पूनिया की रणनीति तथा साहू-दलित-आदिवासी-किसान पर जोर देकर कांग्रेस ने भाजपा को करारी मात दी। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की राजनीति को एक ही तरह से देखा जाता रहा है-दोनों ही जगह भाजपा के दो कद्दावर मुख्यमंत्री थे और वहां अनेक जनकल्याणकारी योजनाएं थीं। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ में रमन सिंह का ढह जाना और मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान का कांग्रेस को कड़ी टक्कर देना बहुत कुछ बता जाता है। ये चुनावी नतीजे भाजपा के लिए चेतावनी की तरह हैं।

उसने इन चुनावों के मद्देनजर राम मंदिर के मुद्दे को धार दी। लेकिन वह यह भांपने में नाकाम रही कि पारंपरिक राजनीति के बजाय अर्थव्यवस्था इस चुनाव में मुख्य मुद्दा रही। प्रधानमंत्री ने बेशक पांच राज्यों के चुनाव अभियान को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाया। उनकी रैलियां भी कम रहीं। लेकिन अगर भाजपा लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करना चाहती है, तो उसे हवा के बदलते रुख को पहचानना होगा। हिंदी पट्टी के इन राज्यों के अलावा उत्तर प्रदेश में महागठबंधन उसकी कड़ी परीक्षा लेगा, तो बिहार में भी स्थितियां एनडीए के बहुत अनुकूल नहीं हैं। दक्षिण भारत में भाजपा कोई ताकत नहीं है, तो पश्चिम बंगाल में उससे बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती। लिहाजा हिंदुत्व की राजनीति के बजाय उसे आर्थिक नीतियों पर फोकस करना पड़ेगा, ताकि युवाओं को रोजगार मिले और किसान खुश हों। 
तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव की तेलगांना राष्ट्र समिति अगर पिछली बार से भी बहुत अधिक सीटें ले आई हैं, तो इसकी वजह आर्थिक नीतियों पर उसका जोर और किसानों की बेहतरी की नीतियां रही हैं। बेहतर हो कि भाजपा अपनी कमियां समझें। कांग्रेस को भी इस जीत के बाद आत्मसंतुष्टि से बचना होगा।
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