निशाने पर महिलाएं

रामचंद्र गुहा Updated Sat, 03 Jan 2015 08:30 PM IST
विज्ञापन
woman on target.

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹249 + Free Coupon worth ₹200

ख़बर सुनें
बीस साल पहले मुंबई के मेरे एक मित्र के साथ मैं इस पर चर्चा कर रहा था कि हमारे शहरों में महिलाओं के साथ किस तरह का व्यवहार होता है। हम दोनों इस पर सहमत थे कि दिल्ली में महिलाएं सबसे अधिक असुरक्षित हैं, जहां उन्हें न सिर्फ फब्तियों का, बल्कि शारीरिक हिंसा का भी शिकार बनना पड़ता है। जबकि कोलकाता, चेन्नई और अहमदाबाद में सार्वजनिक तौर पर महिलाएं जब तक बंगाली, तमिल और गुजराती संस्कृति के अनुरूप कपड़े पहनती हैं और व्यवहार में संयत रहती हैं, तब तक उनके साथ बदसुलूकी कम ही होती है।
विज्ञापन

मैंने और मेरे दोस्त ने इसके लिए एक दूसरे को बधाई दी कि हमारे अपने शहर ज्यादा प्रगतिशील हैं। मुंबई या बंगलूरू में सुरक्षित महसूस करने के लिए महिलाओं को साड़ी या सलवार-कमीज पहनने की जरूरत नहीं पड़ती। वहां वे पश्चिमी लिबास में भी आराम से सफर कर सकती हैं, उन्हें देखकर न कोई सीटी बजाता है, न ही ताकझांक होती है। इन दोनों ही शहरों में वकील, डॉक्टर, बैंकर और शिक्षिकाओं के रूप में पेशेवर महिलाओं की बहुत बड़ी संख्या है। दोनों ही शहरों में अनेक चर्चित और सफल महिला व्यवसायी हैं।
लेकिन मुंबई और बंगलूरू में से किस शहर में महिलाएं ज्यादा आजाद हैं? मेरे दोस्त मुंबई की महिलाओं को ज्यादा आजाद मानते थे। उनके मुताबिक, मुंबई में महिलाएं किसी भी समय, किसी भी मानसिक स्थिति में सार्वजनिक वाहनों का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर सकती हैं। मेरा जवाब था कि बंगलूरू में सार्वजनिक परिवहन की स्थिति दयनीय है, वहां महिलाओं को स्कूटर या मोपेड चलाकर ऑफिस जाते देखना सामान्य दृश्य है (जबकि मुंबई में ऐसा नहीं है)।
बीस वर्ष बाद उस बातचीत को मैं बहुत असहज ढंग से लेता हूं। अपने या अपने परिवार के बारे में शेखी बघारना मूर्खता है; अपने शहर या देश के बारे में डींग हांकना वैसा ही बचकानापन है। सच तो यह है कि बंगलूरू में अब महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। पिछले दो दशकों में स्थिति बेहद खराब हो गई है। कम उम्र महिलाओं का यहां मजाक उड़ाया जाता है और उनके खिलाफ शारीरिक (यौन भी) हिंसा भी होती है। पंद्रह से तीस के बीच की किशोरियों और महिलाओं को इसका सामना ज्यादा करना पड़ता है, पर इसका मतलब यह नहीं कि इससे अधिक या कम उम्र की महिलाएं और बच्चियां सुरक्षित हैं। बंगलूरू के स्कूलों में छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार की लगातार घटनाएं हुई हैं। उम्रदराज महिलाओं पर भी हमले बढ़े हैं। सुबह की सैर पर गईं मेरी अस्सी वर्षीय मां पर भी बेरहमी से हमला बोला गया था; जब उन्होंने विरोध किया, तो तीन युवा हमलावरों ने उन्हें जमीन पर गिरा दिया, उनके गले से मंगलसूत्र छीन लिया और उन्हें उसी घायल अवस्था में छोड़ चलते बने।

साफ है कि स्त्री सुरक्षा के मामले में बंगलूरू अपवाद नहीं है। हमारे सभी शहरों के सार्वजनिक स्थलों पर महिलाएं निशाने पर होती हैं, और कोई भी देख सकता है कि वे बीस साल पहले की तुलना में कम सुरक्षित हैं।

भारतीय समाज हमेशा ही पितृसत्तात्मक रहा है। भारतीय उपमहाद्वीप के दोनों प्रमुख धर्मों, हिंदू और इस्लाम में, धर्मग्रंथों और सामाजिक आचार-व्यवहार में महिलाओं की भूमिका ज्यादातर कमतर ही रही है। अब शिक्षित होने, घर से बाहर नौकरी करने, अपना जीवन साथी खुद चुनने और दूसरी तरह से भी स्वतंत्र होते हुए उन्हें अपनी वह पारंपरिक भूमिका स्वीकार नहीं है। ऐसे में, उन्हें पितृसत्तात्मक समाज के हमले झेलने पड़ते हैं। कई बार ये हमले परिवार की तरफ से होते हैं, तो कई बार समाज की ओर से।

भारत एक पीड़ादायक और जटिल संक्रमण से गुजर रहा है, जिसमें आधुनिक विचार धीरे-धीरे जाति और लिंग की पुरानी मान्यताओं की जगह ले रहे हैं। कानून की नजर में देश का हर नागरिक बराबर है। हाल के वर्षों में देश भर में दलितों पर सिलसिलेवार हमले हुए हैं। इसके पीछे सवर्ण समाज का यह गुस्सा है कि उनसे नीची जाति के लोग आईएएस और आईपीएस अधिकारी बन रहे हैं। औरतों पर हमले के पीछे भी इसी किस्म की मानसिकता है कि समाज और राजनीति में सदियों से पुरुषों का जैसा वर्चस्व था, उसे लैंगिक न्याय की आधुनिक सोच चुनौती दे रही है।

औरतों के साथ होने वाली हिंसा के दूसरे कारण भी हैं। हर साल रोजगार की तलाश में लाखों युवा गांवों से निकलकर शहरों में आते हैं। इनमें से सभी को स्थायी रोजगार नहीं मिल पाता (क्योंकि आर्थिक विकास की कुंजी श्रम नहीं, पूंजी है)। ऐसे में, ये लोग उस उपभोग से भी वंचित रहते हैं, जो वे गांवों में करते थे। ये असंतुष्ट लोग अपना गुस्सा औरतों पर उतारते हैं।

विज्ञापनों और फिल्मों में महिलाओं का चित्रण भी उन पर हमले की एक वजह है। महंगे वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित सुंदर महिलाओं के होर्डिंग रास्ते के किनारे लगे रहते हैं। भारतीय मध्यवर्ग का पश्चिमीकरण करने को इच्छुक बॉलीवुड की फिल्में बताती हैं कि रोमांस और वासनाएं आधुनिक जीवन की अनिवार्यताएं हैं। ये फिल्में बेरोजगार युवाओं को और हताश करती हैं।

औरतों की असुरक्षा के पीछे शहरों के चरमराते ढांचों का भी हाथ है। कम रोशनी वाली स्ट्रीट लाइट या अंधेरा, बदहाल या गैरमौजूद सार्वजनिक वाहन, अयोग्य और भ्रष्ट पुलिस-ये सभी औरतों की असुरक्षा की वजहें हैं।

मैंने शहरों पर ध्यान केंद्रित किया है; लेकिन हमारे गांवों की स्थिति भी बेहतर नहीं है। वहां पितृसत्तात्मक संस्थाओं और कायदे-कानूनों के जरिये औरतों को और दबाया जाता है। कन्या भ्रूणहत्या की कुप्रथा, बड़ी होने पर लड़कियों का स्कूल जाना बंद करा देना, औरतों को काम न करने देने की मानसिकता, अपना जीवन साथी चुनने देने पर प्रतिबंध-ये सारी चीजें बताती हैं कि इंडिया की तरह भारत में भी औरतों के साथ बराबरी का व्यवहार नहीं होता।

स्तंभकार राहुल जैकब ने हाल ही में लिखा कि चीनी महिलाएं भारतीय औरतों की तुलना में अधिक स्वायत्त और स्वतंत्र जीवन यापन करती हैं, और सड़क व कार्यस्थल में भी वे ज्यादा सुरक्षित महसूस करती हैं। में पिछली बार जब एक सेमिनार में भाग लेने चीन गया था, तो वहां प्रतिनिधियों को सेमिनार स्थल तक जिस बड़ी-सी बस में ले जाया जाता था, उसे आत्मविश्वास से भरपूर, शांत और सुरक्षित एक युवती चलाती थी-ड्राइवर हमेशा एक ही युवती नहीं होती थी। यह एक क्षेत्र है, जिसमें हमें चीन से सीखना चाहिए। 'मेक इन इंडिया' एक सही लक्ष्य है, पर 'भारत में महिलाओं को सुरक्षित बनाना' ('मेक वूमैन सेफ इन इंडिया)' उससे भी उपयुक्त लक्ष्य होगा।        
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
X

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
  • Downloads

Follow Us