निशाने पर महिलाएं और आदिवासी

सुभाषिनी सहगल अली Updated Fri, 28 Nov 2014 07:41 PM IST
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women and tribal are on target

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कई वर्षों से प्रसार माध्यमों और विशेषज्ञों द्वारा रमन सिंह के नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ सरकार को आदर्श सरकार घोषित किया जा रहा है। पर पिछले दिनों एक नसबंदी शिविर में गरीब महिलाओं की मौतों ने इस सरकार की पोल खोल दी है। अन्य सरकारों की तरह छत्तीसगढ़ सरकार भी परिवार नियोजन की नीति लागू करने का काम गरीब औरतों के कमजोर, कुपोषित शरीरों पर जुल्म ढाकर ही करती है। हमारे देश में यह बात मान ली गई है कि जैसे बच्चा पैदा करने का काम औरत का है, वैसे ही बच्चा न पैदा करने की जिम्मेदारी भी औरत की है।
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महिलाओं के लिए नसबंदी कराना आसान नहीं है। इसके तहत ऑपरेशन भले ही छोटा होता है, पर इस प्रक्रिया में उसे बेहोश करने की आवश्यकता होती है। ऐसे ऑपरेशन में खून भी काफी जाता है। देश की औसतन अस्सी प्रतिशत महिलाओं में खून की कमी है। सबसे गरीब औरतों में खून की कमी शत प्रतिशत होती है। ऐसी हालत में नसबंदी के बाद औरतों को पौष्टिक आहार और आराम की जरूरत पड़ती है। ऑपरेशन के बाद इन महिलाओं को प्रशिक्षित डॉक्टर और नर्स, साफ-सुथरा बिस्तर, स्वच्छ औजार और दवाओं की भी जरूरत पड़ती है। पर गरीब औरतों को ये सुविधाएं कहां मिलती हैं?
औरतों के मुकाबले पुरुषों की नसबंदी में समय कम लगता है। उसमें ऑपरेशन आवश्यक नहीं, इस प्रक्रिया में एक कतरा खून भी जाया नहीं होता। उसे दवा या आराम की भी जरूरत नहीं पड़ती। ऐसे में पुरुषों की नसबंदी पर जोर देना चाहिए। पर हमारे पुरुषवर्चस्ववादी समाज को यह मंजूर नहीं।
छत्तीसगढ़ में वह नसबंदी शिविर राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के क्षेत्र में लगाया गया था। पर इतनी मौतों के बाद भी उन्हें मंत्रिमंडल से हटाने का कोई प्रयास नहीं किया गया। जिस डॉक्टर ने ऑपरेशन किए थे, उन्हें हिरासत में लेकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की गई। पर कुछ ही दिनों बाद इन मौतों के लिए जिम्मेदार उन अशुद्ध दवा की गोलियों को पाया गया, जिन्हें महिलाओं को नसबंदी के बाद होने वाले दर्द और कमजोरी दूर करने के लिए दिया गया था। दवा बनाने वाली इस कंपनी ने पहले भी अशुद्ध दवाएं सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को उपलब्ध कराई थीं, जिस कारण उसकी आपूर्ति पर दो साल पहले रोक लगा दी गई थी। इसके बावजूद सरकार ने उस कंपनी को फिर दवा की आपूर्ति का आदेश दिया। रमन सिंह सरकार ने कुछ साल पहले वाहवाही लूटते हुए खैनी और गुटखा की बिक्री पर रोक लगा दी थी। अब पता चला है कि राज्य के स्वास्थ्य मंत्री बिलासपुर जिले में गुटखा बनाने वाली बहुत बड़ी कंपनी के मालिक हैं।

छत्तीसगढ़ का अस्तित्व उसके आदिवासी बहुल होने की विशेषता पर आधारित है। पर इसी प्रांत में 1991 से 2011 के बीच आदिवासियों की संख्या इतनी घटी है कि उनके लिए आरक्षित विधानसभा क्षेत्र 34 से घटकर 29 रह गए हैं। आदिवासियों की आबादी में आई कमी के पीछे पलायन, गरीबी तथा कुपोषण, घटिया स्वास्थ्य सेवाएं तथा मातृत्व मृत्यु दर जिम्मेदार है।

छत्तीसगढ़ सरकार की प्राथमिकताएं बहुत स्पष्ट हैं-गुटखा निर्माता अपने स्वास्थ्य मंत्री के, जिनके विभाग की लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण उन गरीब महिलाओं की मौत हुई, धंधे और कुर्सी को बचाना तथा अशुद्ध-जानलेवा दवाएं बनाने वाली कंपनी को लगातार सरकारी तिजोरी का लाभ उठाने का मौका देना। इन प्राथमिकताओं के चलते ही राज्य की गरीब महिलाओं और कम होते आदिवासियों की जान चूहे मारने वाली दवा के हवाले की जाती है।

(लेखिका माकपा की पूर्व सांसद हैं)
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