पाकिस्तान में युवा उभार

mariana babarमरिआना बाबर Updated Fri, 03 Jan 2020 12:41 PM IST
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पाकिस्तान
पाकिस्तान - फोटो : PTI

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पिछला साल दुनिया भर में युवाओं का साल रहा। नए साल में युवाओं से और अधिक उम्मीद है, क्योंकि दुनिया की नजर उन पर रहेगी। पाकिस्तान के छात्र उस छात्र संघ को बहाल करने की मांग कर रहे हैं, जिस पर पहले लगाए गए प्रतिबंध ने युवाओं और बुजुर्गों का समान ध्यान खींचा था। पूरे पाकिस्तान के छात्रों ने मुल्क के सभी प्रमुख शहरों में छात्र एकता मार्च का आयोजन किया और सबसे दिलचस्प बात यह रही कि बहुत से उम्रदराज लोग, जो छात्र नहीं है, वे भी उनके समर्थन में बाहर निकले।
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पाकिस्तान में युवा उभार को लेकर हाल के दिनों में काफी चर्चा हुई है। आखिरकार यह एक जनसांख्यिकीय वास्तविकता है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी), पाकिस्तान द्वारा बुधवार को जारी नई राष्ट्रीय मानव विकास रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में इस समय अब तक के इतिहास में सबसे ज्यादा फीसदी युवा हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुल जनसंख्या का 64 फीसदी 30 वर्ष से कम आयु के युवाओं का है, जबकि 15 से 29 वर्ष के बीच के युवाओं की आबादी 29 फीसदी है। पाकिस्तान आज एक नए युवा आंदोलन, पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट, के उभार को देख रहा है, जो युद्ध के खिलाफ युवाओं के राजनीतिक उत्थान और हाशिये पर पड़ी पश्तून आबादी के उत्पीड़न के खिलाफ उनके अधिकारों की मांग कर रहा है। वे धीरे-धीरे ताकतवर होते जा रहे हैं और पूरे मुल्क के युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं, जिनमें से अनेक गैर-पश्तून हैं। कुछ हद तक ये छात्र इसलिए भी सफल हुए, क्योंकि बड़ी राजनीतिक पार्टियां उन्हें समर्थन दे रही हैं। सिंध सरकार ने छात्र संघों को बहाल करने की घोषणा की। यहां तक कि प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा कि उनकी सरकार छात्र संघों को बहाल करने की रणनीति बनाएगी।
आंदोलन करने वाले छात्रों की मांगें सरल एवं सटीक हैं। उनकी मांगें ऐसी हैं, जिन्हें खारिज नहीं किया जा सकता। उनकी पहली और महत्वपूर्ण मांग यह है कि शिक्षण संस्थानों को तुरंत वह हलफनामा वापस लेना चाहिए, जिसमें छात्रों को प्रशासन से यह वादा करना  पड़ता है कि दाखिला लेने के बाद वे छात्र संघ और राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा नहीं लेंगे।
दुनिया भर के उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्र संघ हैं, जहां छात्र राजनीति की कला और बहस के बारे में सीखते हैं। हकीकत यह है कि दुनिया भर के कई प्रमुख राजनेता कभी छात्र संघों में सक्रिय रहे थे। पाकिस्तान के छात्र घुटन भरी शैक्षणिक स्थितियों, सुरक्षा बलों के बेवजह हस्तक्षेप, फीस में वृद्धि और परिवहन, पुस्तकालय, कंप्यूटर, इंटरनेट जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव के भी खिलाफ हैं। इसके अलावा, वे परिसरों में यौन उत्पीड़न के खिलाफ भी कार्रवाई चाहते हैं।

पाकिस्तान में लड़के-लड़कियों के अलग-अलग स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई करने की व्यवस्था है। इस तरह विश्वविद्यालयों में ही सह शिक्षा की व्यवस्था है, जहां साथ-साथ पढ़ाई करने के लिए स्वस्थ वातावरण तैयार किया जाता है। लेकिन हाल में पाकिस्तान के कई विश्वविद्यालयों ने छात्र-छात्राओं के बीच बातचीत करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। यही नहीं, विश्वविद्यालयों के छात्रों को यह निर्देश दिया जाता है कि उन्हें कैसे कपड़े पहनने चाहिए। यह छात्रों के लिए अस्वीकार्य है।

एक अखबार ने अपने संपादकीय में लिखा, 'स्नातक तैयार करने के लिए एक अनुकूल और अपेक्षाकृत बौद्धिक रूप से मुक्त वातावरण का प्रावधान अनिवार्य है, ताकि स्नातक आलोचनात्मक ढंग से सोच सकें। अगर हम छात्रों को संकीर्णता में रखते हैं और उन्हें पिछली पीढ़ी की गलतियों को दोहराने के लिए रोबोट बनाते हैं, तो फिर आने वाली पीढ़ी से देश को ऊंचा उठाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?' पाकिस्तान में हम छात्रों को धार्मिक मदरसों से पढ़कर निकलते हुए देखते हैं, जहां उन्हें असहिष्णुता की विचारधारा का पता चलता है। यही वह जहर है, जो बाद में समाज में देखा जाता है। बेशक सभी मदरसे इस तरह की विचारधारा नहीं सिखाते, लेकिन मदरसे से निकलने वाले छात्र समाज में तालमेल नहीं बिठा पाते, क्योंकि उन्हें मदरसा में पढ़ाने के अलावा अन्य किसी काम के लिए प्रशिक्षित नहीं किया जाता। संतोष की बात यह है कि पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ पार्टी की सरकार ने मदरसों के पाठ्यक्रम को संशोधित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है और वे निजी व सरकारी स्कूलों के समान ही होंगे।

जैसा कि एक लेखक ने लिखा है, 'मानव मूल्यों में विश्वास रखने वाले छात्रों के आंदोलन से समाज को इन तत्वों से छुटकारा पाने में मदद मिल सकती है, क्योंकि आज के छात्र इसे कल के पाकिस्तान में समाज की विभिन्न ऊपरी परतों तक ले जाएंगे। अगर उनके दिमाग को नफरत, कट्टरता और अश्लीलता की विचारधारा से दूषित नहीं किया जाता, तो वे देश के लिए आशा की किरण बन सकते हैं।'
लेखक जाहिद हुसैन कहते हैं, 'मुल्क के लोकतांत्रिक संघर्ष में छात्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वास्तव में, प्रगतिशील छात्र संगठन तानाशाही शासन का विरोध करने में सबसे आगे रहे हैं। और शायद यही कारण था कि जनरल जिया ने छात्र संघों पर प्रतिबंध लगा दिया। छात्र एकता मार्च ने मुझे 1968 के ऐतिहासिक छात्र आंदोलन की याद दिला दी, जिसमें मैं भी एक नेता था। उस आंदोलन ने अयूब खान की सरकार  गिरा दी थी।'

पूर्व सीनेटर और पाकिस्तान के प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में से एक अफरासियाब खटक कहते हैं, अब तक पाकिस्तान की सरकार और समाज देश के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक जीवन में युवाओं को स्थान देने के लिए प्रभावी योजना नहीं बना सके हैं। वह कहते हैं, 'जैसा कि हम सभी जानते हैं, बड़ी संख्या में युवाओं का ब्रेनवाश किया जाता था और उन्हें धार्मिक आतंकवाद के चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, जिसने दशकों तक पाकिस्तान को त्रस्त किया। दुर्भाग्य से अब भी लाखों युवा धार्मिक कट्टरता के असर में हैं, जिसे शीतयुद्ध के चरम दौर में साम्यवाद से लड़ने के लिए पश्चिमी ताकतों द्वारा  वित्तपोषित किया गया था। लेकिन उससे अब तेजी से मोहभंग हो रहा है।'

हालांकि सरकार के भीतर यह आवाज उठ रही है कि छात्र संघों की बहाली से परिसरों में हिंसा होगी, लेकिन खटक इससे सहमत नहीं हैं।
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