लोकसभा चुनाव 2019: उत्तराखंड में 2014 के मुकाबले कम हुआ मतदान, किसका करेगा नुकसान

अरुणेश पठानिया, अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 12 Apr 2019 12:48 PM IST
विज्ञापन
अमर उजाला
अमर उजाला

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹299 Limited Period Offer. HURRY UP!

ख़बर सुनें
वर्ष 2014 में जो उत्साह प्रदेश के मतदाता ने दिखाया था, वो इस बार नहीं दिखा। मतदान प्रतिशत के आंकड़ों की माने तो संकेत साफ हैं कि मतदाता उदासीन था। ऐसे में ये देखना होगा कि उत्तराखंड में इस बार कम हुआ मतदान आखिर किसका नुकसान करेगा।
विज्ञापन

क्योंकि कोई लहर या अंडर करेंट होता तो मतदाता घर से बाहर निकलता। वहीं, राजनीतिक दलों के बूथ प्रबंधन और निर्वाचन आयोग के दावों की मतदाताओं ने हवा निकाल दी। उधर, कई चुनावी विश्लेषक मानते हैं कि कम मतदान इस ओर इशारा करता है कि सत्तारूढ़ दल का कोई विरोध नहीं है, जबकि कुछ ऐसा नहीं मानते। हालांकि इन सवालों का जवाब 23 मई को मिल जाएगा, लेकिन यह तय है कि मतदाता का गिरता उत्साह लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। 
प्रदेश के मतदाता हर बार एक तरफा भरोसा जताते आए हैं, चाहे मतदान प्रतिशत जो भी रहा हो। राज्य गठन से पहले 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस की लहर में 63 प्रतिशत मतदान का रिकार्ड बना। यह रिकार्ड आज भी बरकरार है। वर्ष 2014 में मोदी लहर के बीच भी ये रिकार्ड नहीं टूटा। इस बार मतदान प्रतिशत के अंतिम आंकड़े आने हैं, लेकिन पांच बजे तक के 58 प्रतिशत मतदान होने से साफ है कि कुछ इजाफा और हो सकता है।
2009 के चुनाव में 53.43 प्रतिशत मतदान पर कांग्रेस ने पांच सीटें जीतीं थी, जबकि कई सीटों पर भाजपा मामूली अंतर से हारी। वर्ष 2014 में मोदी लहर के दौरान 61.85 प्रतिशत मतदान से भाजपा ने पांच सीटों पर जीत हासिल की, जबकि जीत के अंतर के कई कीर्तिमान भाजपा सांसदों के नाम बने। इसके बाद वर्ष 2017 विधानसभा चुनाव में 65.68 प्रतिशत मतदान हुआ तो भाजपा ने प्रचंड बहुमत हासिल किया। इस बार 60 प्रतिशत से नीचे मत प्रतिशत रहने से साफ है कि टक्कर कांटे की है और नतीजे रोचक रह सकते हैं। दोनों राजनीतिक दल भले इसे अपने अपने पक्ष में बता रहे हैं, लेकिन असलियत ईवीएम में कैद हो चुकी है। 

मुकाबला एक तरफा होने के संकेत 
कम मतदान प्रतिशत के ये मायने भी निकाले जा सकते हैं कि दोनों प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस में किसी एक के कैडर वोटर ने रुचि नहीं दिखाई। प्रचार के फ्रंट पर कमजोर रहने वाले दल को इसका नुकसान होने की अधिक संभावना है। हालांकि सत्ता विरोधी लहर होने के तथ्य को खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन ऐसी स्थितियों में अक्सर मतदान प्रतिशत अधिक रहता है। 

मोदी, शाह और राहुल की अपील बेअसर 
प्रदेश में स्टार प्रचार के दौरान नेताओं की जनसभाओं में खूब भीड़ उमड़ी, लेकिन ऐसा लगता है कि मतदाताओं के बीच संदेश नहीं गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह सरीखे नेताओं ने मतदाताओं से खूब अपीलें कि लेकिन वो वोट में तब्दील होती नहीं दिखी।  

मैदानी जिलों में है राजनीतिक प्रतिस्पर्धा 
हरिद्वार और ऊधमसिंहनगर जिलों में पर्वतीय जनपदों के मुकाबले कहीं अधिक मतदान हुआ। इससे साफ है कि वोटों का ध्रुवीकरण हुआ है।  इन दोनों संसदीय क्षेत्रों के अलग अलग इलाकों पर गौर करें तो साफ है कि यहां प्रतिस्पर्धा में मतदान हुआ। इन दोनों जिलों की सामाजिक और सियासी जमीन पहाड़ के अन्य जिलों बिल्कुल अलग है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
  • Downloads

Follow Us

X

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00
X