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मंजिलें और भी हैं: अब आदिवासी बच्चे भी सीख रहे हैं कंप्यूटर

अमिताभ सोनी Updated Tue, 08 Oct 2019 12:45 AM IST
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Amitabh soni
Amitabh soni - फोटो : अमर उजाला
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यों तो मैं लंदन में नौकरी कर रहा था, पर हमेशा मेरे भीतर अपने देश में आकर यहां के लोगों के लिए कुछ करने के विचार चलते रहते थे। नौकरी करने का एक कारण यह भी था कि मैं खुद को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाना चाहता था, ताकि लोगों की मदद कर सकूं। मेरा जन्म मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ, पर ज्यादातर समय मैं भोपाल में रहा हूं।
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मेरे पिता सेना में अधिकारी थे, उन्हीं की प्रेरणा से मेरे अंदर देश के प्रति समर्पण की भावना का जन्म हुआ। इंटरनेशनल बिजनेस में परास्नातक की डिग्री लेने के बाद मैं इंग्लैंड चला गया, वहां मैं तकरीबन दस वर्षों तक रहा। मैं वहां ब्रिटिश सरकार के सोशल वेलफेयर बोर्ड, लंदन यानी कि वहां के समाज कल्याण मंत्रालय में काम करता था। वर्ष 2014 में मैं लंदन से भारत वापस आ गया। मैंने लंदन में नौकरी के दौरान समाज से जुड़े तमाम पहलुओं के बारे में जाना, वहां के क्रियाकलापों को समझा, सामाजिक विकास के लिए जरूरी बिंदुओं का ज्ञान प्राप्त किया। मैंने वहां की कार्य-प्रणाली को भी समझा, लोगों की समस्या को सरकार तक कैसे पहुंचाया जाए, इस बारे में भी जाना।
कॉलेज के समय में भी मैं आदिवासियों के लिए थोड़ा बहुत काम करता था। मैं जानता था, ये ईमानदार और मेहनती लोग होते हैं। इन्हें अगर कोई रास्ता दिखाने वाला मिल जाए, तो ये बहुत आगे बढ़ सकते हैं, तो भारत लौटने के बाद मैंने भोपाल की सबसे बड़ी आदिवासी पंचायत में काम करना शुरू किया। मैंने मध्य प्रदेश के आदिवासी गांव भानपुर केकड़िया को अपना ठिकाना बनाया। मैंने वहां के आदिवासियों, खासतौर से युवाओं को स्वावलंबी बनाने की पहल शुरू की।
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