मंजिलें और भी हैंः पॉलीथिन का घर, तीन लोगों का परिवार और एक अभियान

सिस्टर लिजी चक्कलकल Updated Tue, 15 Oct 2019 07:09 AM IST
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सिस्टर लिजी चक्कलकल
सिस्टर लिजी चक्कलकल - फोटो : Amar Ujala
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मैं एक दिन केरल की वाणिज्यिक राजधानी कोच्चि के चेलानम स्थित एक बस स्टॉप पर खड़ी थी। अचानक मेरी नजर सड़क के दूसरी ओर गई, जहां नीले रंग की प्लास्टिक की पन्नी को पेड़ से बांधकर एक झुग्गी तैयार की गई थी। जिज्ञासावश, सड़क पार करने के बाद जब मैं वहां पहुंची तो देखा कि उसमें एक महिला और दो बच्चे मौजूद हैं। जब मैंने उस महिला से बात की, तो पता चला कि वे दोनों उसी के बच्चे थे। उसका पति शराबी था, जो अपने खर्च के लिए कभी-कभार कसाईखाने में काम भी करता था। उसने बहुत सारा कर्ज ले रखा था, कर्ज न चुका पाने के कारण उसने आत्महत्या कर ली थी। अब, वह महिला खुद व बच्चों के पालन-पोषण के लिए संघर्ष कर रही थी। वहीं कर्जदार उस पर ताने मारते और फब्तियां कस रहे थे, क्योंकि वह पैसे नहीं दे सकती थी।मैं केरल की रहने वाली हूं और यहीं एक मिशनरी स्कूल की प्रधानाध्यापिका हूं।
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मैं भारत में महिलाओं के लिए शुरू हुई फ्रांसिस्कन मिशनरीज ऑफ मैरी की सदस्य भी हूं। एक प्रशिक्षण के बाद संगठन ने, मुझे केरल में मौजूद मिशनरी स्कूलों में पढ़ाने के लिए भेजा, हालांकि मैं पूर्णकालिक सामाजिक कार्यकर्ता बनना चाहती थी। लेकिन एक आज्ञाकारी नन के रूप में, मैंने उनका कहना माना। मैंने एक प्रभावी शिक्षक बनने के लिए विभिन्न रचनात्मक तरीकों का उपयोग करने की कोशिश की, उनमें से एक स्कूल खत्म होने के बाद अपने छात्रों के घर जाना भी था। छात्रों के घर जाने के दौरान मुझे पता चला कि कई छात्र बहुत गरीब परिवारों से आए थे। उनके घरों में लड़कियों के लिए अलग कमरों की व्यवस्था नहीं थी, जो उन्हें थोड़ी गोपनीयता प्रदान करे। वे गरिमा और सुरक्षा के बिना रहती थीं। मैं परेशान और व्यथित हो गई थी।
शिक्षा का मुख्य उद्देश्य हर छात्र का समग्र विकास है। पर मैंने महसूस किया कि वे छात्र जीवन में कुछ बुनियादी सुविधाओं के बिना इस उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकते। इस तरह की दयनीय स्थितियों में रहने वाले आत्मविश्वास और गरिमा के साथ नहीं बढ़ सकते हैं। हम मुख्य रूप से कोच्चि में तटीय क्षेत्रों में काम करते हैं। क्योंकि केरल के तटीय क्षेत्रों में बहुत से लोग शराब और नशीले पदार्थों की लत से पीड़ित हैं, जिसका सबसे ज्यादा खामियाजा महिलाएं और बच्चे भुगतते हैं। बस स्टैंड पर उस परिवार को देखने के बाद मैंने उसी दिन से ऐसे लोगों की मदद करने के बारे में विचार किया, जो घर न होने के अभाव में सड़कों के किनारे अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं।
हाउस चैलेंज प्रोजेक्ट के तहत अब तक करीब सौ घरों का निर्माण हो चुका है। इसके लाभार्थी ज्यादातर विधवा, दिव्यांग और गरीब बच्चों के परिजन हैं, क्योंकि उन्हें अधिक सुरक्षा की आवश्यकता होती है। इस प्रोजेक्ट के तहत हर घर के निर्माण की शुरुआत में स्कूल के छात्रों के बीच हर हफ्ते एक-एक रुपये की साझेदारी होती है। हमारे संगठन में मौजूद शिक्षक, छात्र और अभिभावक अपने जन्मदिन, शादी की सालगिरह आदि पर खर्च नहीं करते। वे हाउस चैलेंज के लिए बचत का एक हिस्सा देते हैं। वहीं कुछ व्यवसायी हैं, जो भवन निर्माण सामग्री दे देते हैं। सरकार भी हमारा समर्थन करती है। हमारे पूर्व छात्र, शिक्षक भी सक्रिय भागीदार हैं।मुझे गरीबों की सहायता के लिए एकजुट होकर काम करने और उनमें नए जीवन के साथ सामाजिक-आर्थिक बेहतरी के लिए आशा पैदा करना अच्छा लगता है। हमारा संगठन अपने सदस्यों को सामाजिक न्याय, मानवाधिकारों, मानवीय मूल्यों और आध्यात्मिक पोषण से वंचित लोगों के बीच काम करने के लिए प्रोत्साहित करता है। हम यह सुनिश्चित करते हैं कि हमारे काम के माध्यम से सशक्त महिलाएं आर्थिक और सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर बनें।

 
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