Hasmukh Review: वीर दास की इस कॉमेडी सीरीज में सबकुछ है बस सहारनपुर नहीं है

पंकज शुक्ल, मुंबई Updated Sun, 19 Apr 2020 01:14 PM IST
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हसमुख रिव्यू
हसमुख रिव्यू - फोटो : अमर उजाला

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सार

डिजिटल रिव्यू: हसमुख
कलाकार: वीर दास, रणवीर शौरी, इनामुल हक, अमृता बागची, सुहैल नैयर, शांतनु घटक, मनोज पाहवा, रजा मुराद और रवि किशन।
निर्देशक: निखिल गोंसाल्विस
ओटीटी: नेटफ्लिक्स
रेटिंग: **1/2

विस्तार

देहरादून में पैदा हुए और नाइजीरिया में पढ़े लिखे स्टैंड अप कॉमेडियन वीर दास का अभिनय से पुराना नाता रहा है। देल्ही बेली, बदमाश कंपनी और गो गोवा गॉन में उन्होंने लोगों का ध्यान भी अपनी तरफ खींचा। थोड़े दिन पहले वह नेटफ्लिक्स पर दिखे 'वीर दास: फॉर इंडिया' में, जहां दावा किया गया कि वह वेदों से लेकर वास्को डि गामा तक भारतीय इतिहास के मजे ले रहे हैं। यहां, हसमुख में वह अपने खुद के ज्ञान के मजे लेते दिखे। हिंदी लिखते समय बिंदी कहां लगनी है, इसी पर सारा खेल टिका होता है। तो, हंसमुख और हसमुख में जो बारीक अंतर है, वही इस सीरीज की भी वॉकिंग लाइन है। यहां वीर दास के दोनों हाथों में लंबा सा बंबू है और उन्हें नट की तरह हवा में बंधी डोरी पर चलना है।
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जैसा कि रिव्यू लिखने का नियम बनाया गया है तो पहले सीरीज की कहानी बता देना जरूरी है। यहां इसलिए ज्यादा जरूरी है क्योंकि इस सीरीज के हर बड़े काम में वीर दास का नाम शामिल है। उनका ही कॉन्सेप्ट है, वह भी प्रोड्यूसर हैं और आधा दर्जन लेखकों की इस सीरीज की टीम में भी वह शामिल हैं। कहानी है एक लड़के की जिसे स्टैंड अप कॉमेडी का नशा है। उस्ताद उसे मौका देता नहीं है तो एक प्रोग्राम से पहले वह उससे पंगा ले लेता है। गुस्से में चले चाकू से उस्ताद शहीद हो जाता है और लड़के के भीतर के कॉमेडी हारमोन्स भड़क उठते हैं। अब छोटे शहरों में जैसे होता है, वैसे ही यहां भी दरोगा मेहरबान है तो हसमुख पहलवान हो जाता है। कहानी यहां से टेकऑफ करती है और मुंबई टीवी इंडस्ट्री के कॉमेडी दलदल में लैंड करते ही अपनी हाइट और अपनी स्पीड दोनों खो देती है।
इसके आगे भी रिव्यू पढ़ने का मन कर रहा है तो आपको बता देते हैं कि ये अपने रिस्क पर कीजिए क्योंकि हसमुख सीरीज के 10 एपीसोड देखना भी किसी रिस्क से कम नहीं है। सहारनपुर की स्क्रैप गलाने वाली भट्ठियों जैसी आग इस सीरीज में नहीं है। उस्ताद बने मनोज पाहवा भी हर बार थोड़ा सा और पाउडर लगाकर चेले को यही बताते रहते हैं। भूत का गला कटा हुआ दिखना जरूरी क्यों है, निखिल गोंसाल्विस ही बता सकते हैं। भतीजे पर फिदा चाची वाला एंगल भी सीरीज को कमजोर करता है, इसके अलावा ब्लैक कॉमेडी बनाने के लिए चिरकन जैसा मजाहिया शायर बनने की जरूरत भी नहीं है। सीरीज की कहानी का सबसे बड़ा लोचा ये है कि यहां ध्यान सीरीज के पहले सीजन पर है ही नहीं, सबको बस ये लग रहा है कि इत्ता कुछ बचाके चलो कि दूसरा सीजन बनाने के लिए नेटफ्लिक्स पैसा जरूर दे दे। तो आगे की सोचने के चक्कर में वीर दास और उनकी मंडली अभी का काम बिगाड़ बैठी है।
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