जानिए क्यों बंद हो जाती हैं माननीयों के केस की फाइलें, यहां पढ़ें इसके सटीक उदाहरण

शिवम सिंह, गोरखपुर। Updated Mon, 29 Jun 2020 04:49 PM IST
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : amar ujala

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विधायक हो या फिर सत्ताधारी दल से जुड़े कोई अन्य नेता, इनसे जुड़े मामले आते हैं तो जांच का आदेश होता है। कई बार केस भी दर्ज होता है मगर मामला हाई प्रोफाइल होने की वजह से असल में होता कुछ नहीं है। सिर्फ कानूनी दांव पेंच में ही फाइलें उलझी रहती हैं। फिर जरूरत के हिसाब से फाइलें बंद कर दी जाती हैं।
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जानकारी के मुताबिक, ऐसे मामले उजागर होने पर माननीय भी केस दर्ज कराने में पीछे नहीं हटते हैं। मामला खुद पर ना हो तो तुरंत ही केस दर्ज कराया जाता है लेकिन फिर वह भी इसमें रुचि नहीं लेते हैं और पुलिस पर सब कुछ छोड़ देते हैं। पिछले एक साल के भीतर ऐसे कई माननीयों के मामले सामने आ चुके हैं। इसमें कोई कार्रवाई नहीं हुई।
केस एक
निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद के पुत्र व उत्तर प्रदेश प्रभारी इंजीनियर श्रवण निषाद पर मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले की एक युवती ने दुष्कर्म का आरोप लगाया था। 26 सितंबर 2019 को शाहपुर थाने में महिला ने तहरीर देकर केस दर्ज करने की मांग भी की थी। तब 48 घंटे में जांच कर कार्रवाई का आदेश दिया गया था, जो जांच आज तक पूरी नहीं हो सकी।

केस दो
कैंपियरगंज से भाजपा विधायक फतेह बहादुर सिंह के लेटरपैड पर फर्जी हस्ताक्षर के जरिए बनाए गए सिफारिशी पत्र के सहारे गोरखनाथ क्षेत्र की दो फर्मों द्वारा सड़क निर्माण का 4.89 करोड़ रुपये का ठेका हासिल करने का मामला सामने आया था। विधायक ने इस मामले में 30 नवंबर 2019 को कैंट थाने में धोखाधड़ी, कूटरचित दस्तावेज तैयार कर जालसाजी का केस दर्ज कराया था। यह जांच भी पूरी नहीं हो सकी।

केस तीन
भाजपा एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह का फर्जी पैड छपवाकर ठेकेदार ने मुख्यमंत्री से पड़ोसी की शिकायत की थी। 30 अक्तूबर 2019 को इस मामले में भी कैंट थाने में केस दर्ज कराया गया था। इसका खुलासा तब हुआ था जब मुख्यमंत्री कार्यालय से एमएलसी से इस बारे में पूछा गया था। इसके बाद ही एमएलसी ने एसएसपी से शिकायत की थी और फिर केस दर्ज हुआ था। आज तक इस मामले की भी जांच पूरी नहीं हो सकी।
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