अब 20 दिन में पता लगेगा गाय-भैंस का गर्भ ठहरा है या नहीं, सीआईआरबी ने तैयार की किट

Rohtak Bureauरोहतक ब्यूरो Updated Wed, 26 Aug 2020 12:45 AM IST
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गाय-भैंस के गर्भ का पता लगाने की किट दिखाते केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक।
गाय-भैंस के गर्भ का पता लगाने की किट दिखाते केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक। - फोटो : Hisar

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हिसार। केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने दुनिया में पहली बार पशुओं के लिए गर्भ जांच किट तैयार की है। अब गाय-भैंस में 18 से 20 दिन में भी यह पता लगाया जा सकेगा कि गर्भ ठहरा है या नहीं। किट के पेटेंट के लिए आवेदन किया गया है। पेटेंट मिलने के बाद यह किट बाजार में आएगी।
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आमतौर पर पशुपालकों को 5-7 महीनों के बाद पता लग पाता था कि भैंस का गर्भ ठहरा है या नहीं। डॉक्टर 60-65 दिन बाद हाथ डालकर या अल्ट्रासाउंड से इसका पता लगाते थे। इस किट से पशु के गर्भ का जल्द पता करने में आसानी होगी। मंगलवार को संस्थान के निदेशक डॉ. एसएस दहिया ने इसकी सफलता की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वे अपने संस्थान में परीक्षण प्रक्रिया पूरी कर चुके हैं और 90 प्रतिशत सफलता मिली है। अन्य संस्थानों में भी इस किट को परीक्षण के लिए भेजा गया है।
आठ साल से चल रहा था शोध, 20 रुपये में होगी एक जांच
वैज्ञानिकों ने बताया कि इस किट को बनाने में आठ साल का समय लगा। फिलहाल सैंपल के तौर पर जो किट बनवाई गई है, उस हिसाब से प्रति जांच 30 रुपये का खर्च आएगा, लेकिन बड़े स्तर पर उत्पादन होगा तो कीमत घट कर कम से 20 रुपये या आधे से भी कम होने की उम्मीद है। किसान पशु के मूत्र व कुछ केमिकल को गर्म करके ठंडा करेंगे। इसके बाद इसमें एक और केमिकल डाला जाएगा। इससे रंग बदला तो पशु को गर्भवती माना जाएगा।
बायो सेंसर पर भी काम कर रहे वैज्ञानिक
संस्थान के वैज्ञानिक आईआईटी के साथ मिलकर प्रेग्नेंसी का पता लगाने के लिए बायो सेंसर बनाने पर भी काम कर रहे हैं। यह अभी आरंभिक चरण में है। इसके तहत सेंसर से ही पता लगाया जा सकेगा कि गाय-भैंस गर्भवती है या नहीं। इसके साथ ही संस्थान पेपर स्ट्रिप तैयार करने को लेकर भी शोध कर रहा है, जिससे पशु की एक बूंद से गर्भ का पता लग सकेगा।
देश के तीन क्लोन झोटों का सीमन ब्रीडिंग के लिए तैयार
संस्थान के निदेशक डॉ. एसएस दहिया ने बताया कि हमारे वैज्ञानिकों ने एक शोध के माध्यम से वैज्ञानिक रूप से भी यह साबित कर दिया है कि मुर्राह नस्ल के तीन क्लोन झोटों की प्रजनन क्षमता गैर-क्लोन झोटों के बराबर है। इन झोटों का सीमन देश में भैंस के जर्मप्लास्म को उन्नत करने के लिए तैयार है। इन तीन क्लोन झोटों में दो राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान केंद्र करनाल और एक केंद्रीय भैंस अनुसंधान केंद्र हिसार में है। विभागाध्यक्ष डॉ. आरके शर्मा ने बताया कि वैज्ञानिकों ने अपना शोधपत्र प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल प्लोस वन में भी प्रकाशित किया है। इसके बाद अब वे ब्रीडिंग के लिए क्लोन झोटों के उपयोग की सिफारिश करते हैं। प्रत्येक वर्ष मुर्राह नस्ल के करीब एक लाख टीके बनते हैं। अब क्लोन झोटों के टीके भी ब्रीडिंग के लिए तैयार हैं। उल्लेखनीय है कि एक माह पहले ही संस्थान ने आठ नए क्लोन कटड़े तैयार करने में सफलता हासिल की थी।
मर चुके उत्तम झोटे के वीर्य से भी उत्पन्न कर सकेंगे उसी नस्क का झोटा
डॉ. नरेश सेलोकर ने बताया कि तीन झोटों में से स्वर्ण नाम का एक झोटा 2013 में उनके पीएचडी अध्ययन के दौरान एनडीआरआई करनाल में वीर्य व्युत्पन्न कोशिका से उत्पन्न हुआ था। यह शोध इसलिए खास है, क्योंकि हम अत्यधिक मूल्यवान और परीक्षित उत्तम झोटों को फिर से पैदा कर सकते हैं, जो काफी समय पहले मर चुके हैं और उनका वीर्य सीमन बायो बैंक में उपलब्ध है। इस शोध के अनुसार सीमन से दैहिक कोशिकाओं को शुक्राणु से अलग किया जाता है। यह शोध दुनिया की पहली प्रकाशित वैज्ञानिक रिपोर्ट है, जो एक से अधिक क्लोन झोटों की प्रजनन क्षमता को सामान्य साबित करती है। इन झोटों े जीनोमिक्स और एपिजेनेटिक पहलुओं पर भी अध्ययन जारी है।
ये वैज्ञानिक हैं शोध में शामिल
मोनिका सैनी, सुमन श्योराण, के. विजयलक्ष्मी, रसिका राजेंद्रन, धर्मेंद्र कुमार, प्रदीप कुमार, राकेश के. शर्मा, राजेश कुमार, तुषार के मोहंती, नरेश एल सेलोकर, पीएस यादव।
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