इंडस्ट्री बेहाल..राहत दे सरकार तो होगा बेड़ा पार

Panchkula Bureauपंचकुला ब्‍यूरो Updated Sat, 05 Sep 2020 01:51 AM IST
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पंचकूला। सरकार को सालाना पांच सौ करोड़ का टर्नओवर देने वाली पंचकूला की इंडस्ट्री के सितारे अब गर्दिश में हैं। न तो बिजनेस रह गया है न ही पैसा। हजारों को रोजगार देने वाली इंडस्ट्री अब किसी तरह से खुद को बचाने में जुटी है। उद्यमी मदद के लिए सरकार की तरफ देख रहे हैं, लेकिन पेट्रोलियम पदार्थों के बढ़ते दामों से वे निराश हैं। लॉकडाउन के बाद पंचकूला की इंडस्ट्री किन हालातों से गुजर रही है, इसी विषय पर अमर उजाला के पंचकूला कार्यालय में संवाद कार्यक्रम में उद्यमियों ने अपना दर्द बयां किया।
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हालत है पस्त, बिजनेस रहा पचास फीसदी
लॉकडाउन के बाद इंडस्ट्री की हालत खराब हो चुकी है। अब पचास फीसदी तक ही बिजनेस रह गया है। वास्तव में हुआ यह है कि आठ हजार रुपये लेकर 18 हजार रुपये तक की तनख्वाह पर काम करने वाले लोगों की नौकरियां खतरे में पड़ गईं हैं। ऐसे में फिजूल खर्च बंद कर देना चाहिए। इंडस्ट्री के पास रास्ते सिर्फ दो रह गए हैं। एक तो कास्ट कटिंग करे और दूसरा कर्ज लेकर काम करे। अब आप देखें कि मैटेरियल की कीमत पंद्रह से बीस फीसदी तक बढ़ चुकी है। मुझको मार्च तक कोरोना के बाद के हालात से उबरने का रास्ता नजर नहीं आता है। - रमेश अग्रवाल, प्रधान, इंडस्ट्री एसोसिएशन पंचकूला
काम चल रहा है, मुनाफा कम है
हमारा काम तो रुटीन में चल रहा है लेकिन हमारा मुनाफा एकदम कम हो चुका है। हमको कई बार घर से रुपया लगाना पड़ता है। अब समस्या यह है कि छह माह के मोरेटोरियम के बाद अब उद्योगपतियों को लोन चुकाना होगा। ऐसी स्थिति में उद्यमियों के लिए परेशानी शुरू हो गई है। केंद्र सरकार या राज्य सरकार यदि इंडस्ट्री को राहत देना ही चाहती हैं तो उनको इंडस्ट्री को डायरेक्ट राहत देनी चाहिए। यदि सरकार बैंकों द्वारा लिए जाने वाले ब्याज पर ही राहत दे दे तो इंडस्ट्री को लाभ होगा। -राजेंद्र मित्तल, हरियाणा इंडस्ट्री
जीएसटी में दे दीजिए राहत
हमको जीएसटी में राहत दे दी जाए तो भी हमारे लिए अच्छा होगा। जीएसटी को हमको प्रति माह जमा करना होता है। ऐसी स्थिति में हमारे लिए समस्या है कि एक माह खत्म नहीं होता और हमारे ऊपर जीएसटी का प्रेशर आ जाता है। सरकार यदि जीएसटी की मियाद बढ़ा दे तो अच्छा होगा। अब मान लीजिए हमने दस लाख का बिजनेस किया तो उसमें से हमको जीएसटी जमा करवाना होगा। पहले हम इस पैसे का उपयोग कर लेते थे, अब ऐसा नहीं रह गया है। हम जो कमाते हैं वह तो जीएसटी में दे देते हैं। इसकी मियाद छह माह कर दी जाए तो हम इसी पैसे का उपयोग अपने बिजनेस में कर सकते हैं। संजीव मोंगा, एमसंस पैकेजिंग
ब्याज में ही राहत दे सरकार
केंद्र सरकार व्यापारियों को बैंक द्वारा दिए जाने वाले ब्याज में राहत दे तो व्यापारियों और उद्यमियों का दबाव कम होगा। छह माह तक के मोरेटोरियम के बाद बैंक दोबारा से न सिर्फ ब्याज लेंगे बल्कि ईएमआई और अन्य चार्ज भी लेंगे। ऐसी स्थिति में यदि हमको इन चार्ज से मुक्ति मिले तो हमारा काम चलेगा। इससे पैसे का फ्लो भी बढ़ जाएगा। सरकार को चेक डिसऑनर के नियमों को भी बदलना चाहिए। इससे व्यापारी को कोर्ट के चक्कर न काटने पड़े। चेक किसी का डिसऑनर होता है और कोर्ट में चक्कर व्यापारी लगाता है। - मुकेश गोयल, निर्माणघर ट्रेडर्स
स्कीम नहीं, सीधी राहत की है दरकार
केंद्र सरकार को उद्यमियों के लिए लंबी चौड़ी स्कीम न निकालकर उनको सीधी राहत देनी चाहिए थी। इसमें मोनोटेरियम पीरियड में ब्याज में राहत, सीधी सब्सिडी और जीएसटी की मियाद को बढ़ाना हो सकता है। यदि सरकार तीन माह तक ब्याज में राहत दे दे तो उद्यमियों की आधी समस्या खत्म हो जाएगी। इससे वह भयमुक्त होकर काम कर सकेंगे। वैसे लॉक डाउन के बाद हमको अभी इंडस्ट्री के बूस्ट होने के कोई आसार नहीं नजर आ रहे हैं। यह स्थिति मार्च तक ठीक हो सकती है। - कंवल कक्कड़, पार्थ फार्मास्युटिकल
सस्ती दरों पर दें उपभोक्ताओं को लोन
मैं प्रिंटिंग और पैकेजिंग की इंडस्ट्री से हूं। अभी जो जीडीपी में गिरावट आई है वह 23.9 फीसदी है। यह आंकड़ा हृदय विदारक है। आप देखें कि एग्रीकल्चर क्षेत्र में साढ़े तीन फीसदी की बढ़त हुई है। आने वाले समय में वी शेप रिकवरी होगी। अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए हमारे साथ ही उपभोक्ताओं को भी लोन आसानी से उपलब्ध करवाना होगा। इससे ही हमको राहत मिलेगी। जब उपभोक्ताओं की जेब में ही पैसा नहीं होगा तो बाजार कैसे चल सकेगा। अर्थव्यवस्था हमेशा ग्राहक और बाजार दोनों पर ही निर्भर होती है। जब ग्राहक खर्च करेंगे तभी डिमांड बनेगी। - अमित कपूर, कैप्को प्रिंट्रस
ईवे बिल को मत कीजिए लाक
हम सभी इस बात को लेकर संतुष्ट हैं कि सरकार द्वारा बैंकों के माध्यम से लोन देने में छह माह की छूट दी है। यही सबसे बड़ी समस्या है। यदि हमको सरकार कुछ देना ही चाहती थी तो हमारे ब्याज को कम करवा देती। इससे उद्योगपतियों को राहत मिलती। एक बिजनेस समय पर टैक्स देता है, समय पर रिटर्न फाइल करता है लेकिन यदि जरा सी देरी होती है तो उसका ईवे बिल लाक कर दिया जाता है। अब जो परिस्थितियां हैं उसमें यह ठीक नहीं है। यदि कोई उद्यमी लगातार रिटर्न फाइल कर रहा है तो उसके रिकार्ड को ध्यान से देखने के बाद ऐसा करना चाहिए। अंचल सूद, वाईपी सूद एंड कंपनी
लोन की ब्याजदरें घटाई जाए
मैं तो ऐसी परिस्थिति में सिर्फ इतना ही कहूंगा कि लोन को आसान किया जाए। लोन पर लगाई जाने वाली ब्याज दरों को कम किया जाए। मैं ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री से हूं। अब जो परिस्थितियां बनी हैं उसमें लोग बैंकों से कह चुके हैं कि वह लोन वापस नहीं दे सकते हैं। अपने ट्रकों को बैंक को सौंप रहे हैं। यह काफी चिंताजनक है। सरकार एक तरफ कहती है कि आम लोगों की मदद कर रही है, दूसरी तरफ पेट्रोल और डीजल के रेट आसमान पर पहुंच रहे हैं। इसकी वजह से ट्रांसपोर्ट की लागत दो से तीन हजार रुपये तक बढ़ गई है। जल्द ही इस परिस्थिति से उबरना होगा। - संजय गांधी, गोल्डी गुड्स ट्रांसपोर्ट
अभी स्थिति यह है कि मार्केट में ग्राहक नहीं हैं। जिनके पास पैसा है वह उसको खर्च नहीं करना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि अस्थिरता की स्थिति सभी जगह है। इसी वजह से कोई भी फिजूल खर्च नहीं करना चाहता है। ऐसी स्थितियों से हमको ही निपटना होगा। ऐसे विकट समय में बैंक ही हमारी सहायता कर सकते हैं। बैंक यदि लोन की दरों को कम करें और आम लोगों को भी स्वरोजगार के साथ ही उपभोक्ताओं को खर्च के लिए लोन दे तो मार्केट चलेगी। - प्रदीप कंसल, एमएस स्टील्स
कोविड की वजह से मार्केट पूरी तरह से खत्म हो चुकी है। व्यापार पर खतरा आ गया है। फार्मा इंडस्ट्री के लिए कहा जा रहा है कि वह चल रही है पर ऐसा नहीं है। फार्मा इंडस्ट्री वह चल रही है, जिनमें कोविड से संबंधित दवाएं बनाई जा रही हैं या फिर किट और सैनेटाइजर आदि। व्यापार को चलाने के लिए जो पैसा चाहिए वह नहीं है। इसकी वजह है कि चलती हुई इंडस्ट्री जब बंद हुई तो उस समय जो सप्लाई देनी थी वह भी रुक गई और उसका पैसा भी वापस चला गया। अब नई सप्लाई चालू नहीं हो सकी है। ऐसे में सारा कुछ ब्लाक हो गया।
- राकेश गर्ग, महासचिव, इंडस्ट्री एसोसिएशन पंचकूला
जीएसटी के दायरे में लाएं पेट्रोलियम
उद्यमियों ने कहा कि पेट्रोल और डीजल के रेट को बढ़ने से रोकना आवश्यक है। अर्थव्यवस्था इसकी धुरी पर घूमती है। पेट्रोल और डीजल के दामों में इतनी ज्यादा वृद्धि करने के बाद आम आदमी की हालत खराब हो चुकी है। यदि इसको जीएसटी के दायरे में लाया जाए तो कीमतें कम हो जाएंगी। प्रदीप कंसल ने कहा कि इन कीमतों के कम होने से लोगों को राहत मिलेगी। उद्यमियों ने कहा कि कोविड के दौरान सरकार के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे। रमेश अग्रवाल ने बताया कि इंडस्ट्री द्वारा कोविड-19 के दौरान डॉक्टरों, नर्सों के साथ ही कई अन्य एजेंसियों को खाना, पीपीई किट के साथ मास्क, ग्लब्ज आदि बांटे। उन्होंने कहा कि जब उद्यमी ऐसा कर सकते हैं तो सरकार क्यों नहीं उद्यमियों की मदद करती है।
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