कोरोना के इलाज के लिए पीजीआई समेत प्रदेशभर में बनेंगे प्लाज्मा बैंक

Rohtak Bureauरोहतक ब्यूरो Updated Mon, 06 Jul 2020 12:57 AM IST
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कोरोना से जंग जीत चुके मरीजों का प्लाजमा लेकर उन मरीजों को दिया जाएगा, जिनकी स्थिति गंभीर बनी है। इसके लिए पीजीआईएमएस के अलावा प्रदेश भर में प्लाज्मा बैंक बनाए जाएंगे। यहां कोरोना से ठीक हो चुके मरीजों का प्लाज्मा लिया जाएगा। इस प्लाज्मा का एक साल तक उपयोग में लिया जा सकेगा।
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कोविड-19 के प्रदेश स्तरीय नोडल अधिकारी डॉ. ध्रुव चौधरी ने बताया कि कोरोना संक्रमित मरीजों में जब एंटी बाडी बनती है तो वह ठीक हो जाता है। एंटी बाडी रक्त से लिए जाने वाले प्लाज्मा में पाई जाती है। इसे कोरोना से ठीक हो चुके मरीज से ही लिया जाता है। पीजीआईएमएस में ब्लड से प्लाज्मा लेने के लिए एक मशीन उपलब्ध है और एक मशीन और मंगाई जा रही है। फिलहाल एक यूनिट में करीब 9 हजार रुपये खर्च आता है। इसके लिए सरकार से बात की जा रही है कि इस कीमत को कम किया जाए या निशुल्क किया जाए। एक व्यक्ति से प्लाज्मा लेने में एक घंटा लगता है और दाता के ब्लड से प्लाज्मा लेकर रक्त वापस चढ़ा दिया जाता है।
तीन डोनर आ चुके सामने
डॉ. चौधरी ने बताया कि एक डोनर प्लाज्मा दे चुका है। इसके अलावा दो और लोगों ने प्लाज्मा देने के लिए अपना नाम दर्ज करवाया है। इसमें एक हमारा स्टाफ नर्स है। जिस तरह रक्तदान किया जाता है, उसी प्रकार कोरोना से जंग जीत चुके लोगों को प्लाज्मा डोनेट करने के लिए आगे आना चाहिए।
जांच होती है निशुल्क, आगे आए डोनर
गेस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभाग के सीनियर प्रोफेसर डॉ. प्रवीण मल्होत्रा ने कहा कि रक्तदान के प्रति लोगों में जागरूकता है और लोग रक्तदान करते हैं। इसी प्रकार जो कोरोना से जंग जीत चुके हैं उन्हें प्लाज्मा डोनेट करने के लिए आगे आना चाहिए। इससे डोनर को कोई नुकसान नहीं होता, हां जिसे यह प्लाज्मा चढ़ाया जाएगा उसका जीवन बच सकता है। रक्तदान कोई भी स्वस्थ्य व्यक्ति कर सकता है, लेकिन प्लाज्मा वही डोनेट कर सकता है जो कोरोना से जंग जीत चुका हो। डॉ. मल्होत्रा ने बताया कि रक्त में आरबीसी, प्लाज्मा, डब्ल्यूबीसी व प्लेटलेटस होती है। प्लाज्मा में एंटी बाडी होती है। एक रक्तदाता इन सभी चीजों को डोनेट करता है। कोरोना के मामले में संक्रमण से ठीक हो चुके व्यक्ति का महज प्लाज्मा लिया जाता है। इससे किसी को नुकसान नहीं है, बल्कि उसकी हेपेटाइटिस बी, सी, एचआईवी, मलेरिया, सिफलिस जैसी जांच अपने आप हो जाती है। मशीन से रक्त से प्लाज्मा अलग किया जाता है। संक्रमण के चार से छह सप्ताह में व्यक्ति के अंदर एंटी बाडी बन जाती हैं।े
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