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कोरोना ने बदल दी मौत की रस्में : अर्थी को नहीं मिल रहे चार कंधे, न अंतिम अरदास न तेरहवीं पर शोकसभा, श्मशान में रखीं अस्थियों को विसर्जन का इंतजार

Amar Ujala Bureauअमर उजाला ब्यूरो Updated Thu, 09 Apr 2020 12:18 AM IST
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corona virious
corona virious - फोटो : Yamuna Nagar
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यमुनानगर। कोरोना वायरस के खौफ से जिंदगी ठहर गई है। शादी विवाह से लेकर धार्मिक, सामाजिक और तमाम तरह के सामूहिक कार्यक्रम बंद हो चुके हैं। कोरोना ने जिंदगी के साथ मौत की रस्मों को भी बदल दिया है। किसी भी तरीके से होने वाली मौत पर नाते रिश्तेदारों ने आना बंद कर दिया है। इसका उदाहरण थापर कॉलोनी में 90 वर्षीय महिला की मौत पर देखने को मिला। जब लॉकडाउन के चलते रिश्तेदार शिरकत नहीं कर पाएं। जिस पर परिजनों ने वीडियो कॉल करके नाते रिश्तेदारों को अंतिम दर्शन करवाएं। वीडियो कॉल पर ही अंतिम संस्कार में लोग शामिल हुए। हालात इतने बदल गए हैं कि अब अर्थी को चार कंधे भी नसीब नहीं हो रहे और कुछ परिजन शव वाहन में श्मशान तक शव ले जाकर अंतिम संस्कार करने को मजबूर हैं।
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न अंतिम अरदास, न तेहरवीं पर शोक सभा
-मौत के बाद की तमाम रस्में भी स्थगित करनी पड़ रही है। अब अंतिम अरदास और तेरहवीं पर शोक सभा नहीं हो रही। आजकल शोक संदेशों में खुद पीड़ित परिवार भी यही अपील कर रहे हैं कि अंतिम संस्कार में शामिल न हों। जिस पर रस्म पगड़ी और पीड़ित परिवार को सांत्वना देने लोग नहीं पहुंच रहे। केवल व्हाट्सअप पर शोक संदेश भेजे जा रहे हैं। जिसमें लोग ये हिदायत भी देते हैं कि आत्मा की शांति की घर पर बैठकर अरदास करें। ऐसा करने का संदेश साफ है कि रस्में निभाने से जीवन को बचाना ज्यादा जरूरी है।
श्मशान में रखी सैकड़ों अस्थियों को भी विसर्जन का इंतजार
-अंतिम क्रियाकर्म से जुड़े पंडित अशोक ने बताया कि सैकड़ों की संख्या में अस्थियां एक दर्जन से ज्यादा श्मशान घाट के लॉकर में कैद हैं। अब लॉकर सारे फुल होने पर अस्थियों को लाल कपड़े में बांध कर टांगा जा रहा है। गंगा में प्रवाहित नहीं होने के कारण काफी संख्या में अस्थियां यमुना में प्रवाहित की जा रही है। लेकिन जिन लोगों का हरिद्वार या गंगा जाना होता है, उनकी अस्थियां रखनी पड़ रही है। क्योंकि जिला प्रशासन से ट्रेवलिंग पास तो मिल जाता है, लेकिन यूपी और उत्तराखंड बॉर्डर पर इंट्री नहीं मिल पाती। पवित्र नदियों में प्रवाहित होने के बाद ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।
गले लगकर दुख भी व्यक्त नहीं कर सकते
-चंडीगढ़ रहने वाली परमजीत कौर की मां का पिछले सप्ताह निधन हो गया था, लॉकडाउन के चलते वह यमुनानगर नहीं आ पाई। भाई ने वीडियो कॉल करके मां के अंतिम दर्शन करवाएं। उसने बताया कि शायद दुनिया में पहली बार ऐसा हो रहा होगा कि जीवन-मरण के इस खेल में सब शर्तें वायरस ने ही तय कर रखी हैं।
पंडित श्याम सुंदर शास्त्री ने बताया कि अभी तक किसी की मौत पर घर-परिवार और अन्य सदस्यों से मिलकर गले लगकर दुख व्यक्त कर देते थे, सांत्वना देते थे, मगर ये कोरोना मौत के बाद भी चैन नहीं लेने देता है। लोग एक दूसरे के गले लगकर रो तक नहीं सकते, जो चला गया उसकी सिर्फ यादें साझा कर सकते।
corona virious
corona virious- फोटो : Yamuna Nagar
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