सवाल डेढ़ लाख करोड़ रुपये का है, मनरेगा से मन भरने की गलती न करे सरकार, अभी शहर आना चाह रहे मजदूर!

जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 12 Sep 2020 06:32 PM IST
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सार

चालू वर्ष के पहले पांच महीने में मनरेगा के तहत करीब 5.8 करोड़ परिवारों को रोजगार मिला है, जबकि पिछले पांच वर्षों में ऐसे परिवारों की औसत संख्या 5.2 से 5.3 करोड़ प्रतिवर्ष रही है। इस बार यह संख्या 9.4 फीसदी तक चली गई है...

विस्तार

कोरोना संक्रमण की वजह से अपने गांव लौटे बहुत से मजदूर अभी बाहर नहीं निकलना चाह रहे। गांव में पहले से मनरेगा के काम में लगे श्रमिकों की भी शहर में काम-धंधे के लिए आने की इच्छा नहीं बन पा रही। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों के खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ना तय है। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति के वर्किंग ग्रुप के वरिष्ठ सदस्य और सामाजिक मामलों के जानकार अविक साहा कहते हैं, मौजूदा स्थिति में मनरेगा के लिए केंद्र सरकार को डेढ़ लाख करोड़ रुपये अविलंब जारी कर देने चाहिए। इससे ग्रामीण क्षेत्र का विकास भी नहीं थमेगा और अपने श्रमिकों के सामने रोजी-रोटी का संकट भी पैदा नहीं होगा।
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बता दें कि मनरेगा के तहत मजदूरी पाने के लिए देश में करीब 13.11 करोड़ जॉब कार्ड बने हुए हैं। सक्रिय जॉब कार्ड वाले लोगों की बात करें तो उनकी संख्या 7.79 करोड़ है। मौजूदा समय में 1.34 करोड़ वर्कर विभिन्न राज्यों की 12 लाख साइटों पर काम कर रहे हैं। कोरोना संक्रमण फैलने के बाद शहरों में काम करने वाले करोड़ों श्रमिक मौत के डर से अपने गांव लौट गए थे। एकाएक ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार की मांग बढ़ गई।
केंद्र एवं राज्य सरकारों ने महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को इसके लिए उपयुक्त माना। नतीजा, मार्च के बाद पहले चार महीनों में लगभग साढ़े पांच करोड़ से अधिक परिवारों ने मनरेगा का फायदा उठाया। यदि आंकड़ों पर गौर करें तो अभी तक तक पिछले पांच महीनों में इस योजना के लिए आवंटित हुई कुल रकम यानी 101,500 करोड़ रुपये में से 63 फीसदी राशि खर्च हो चुकी है। ऐसे में सभी पंजीकृत लोगों को सौ दिनों तक रोजगार मुहैया कराया जाता है तो यह राशि दिसंबर तक खत्म हो जाएगी।
सितंबर माह की नौ तारीख तक मनरेगा के लिए स्वीकृत बजट में से 63,511.95 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। विभिन्न राज्यों में भुगतान बाकी हैं। इसके लिए जरुरी है कि केंद्र सरकार को अतिरिक्त 40,000 करोड़ रुपये बिना किसी देरी के जारी कर देने चाहिए। अविक साहा कहते हैं, मनरेगा के लिए सरकार को कम से कम डेढ़ लाख करोड़ रुपये की राशि मंजूर करनी होगी। जब यह राशि ग्राम पंचायतों को मिल जाएगी तो ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी का संकट नहीं खड़ा होगा।

चूंकि अभी मनरेगा का ग्राफ बढ़ेगा। शहर में कोरोना का खतरा कम नहीं हुआ है, इसलिए लोग बाहर निकलने से डर रहे हैं। उनका ये डर जायज भी है। सरकार को ये देखना होगा कि कहीं पर भुगतान में जानबूझ कर देरी तो नहीं की जा रही है। यदि ये राशि जारी नहीं होती है तो भुगतान में देरी होगी। लोगों को समय पर रुपये नहीं मिले तो वे शहर में आने का जोखिम उठा सकते हैं।

चालू वर्ष के पहले पांच महीने में मनरेगा के तहत करीब 5.8 करोड़ परिवारों को रोजगार मिला है, जबकि पिछले पांच वर्षों में ऐसे परिवारों की औसत संख्या 5.2 से 5.3 करोड़ प्रतिवर्ष रही है। इस बार यह संख्या 9.4 फीसदी तक चली गई है। नियम तो ये है कि 15 दिन में मनरेगा की मजदूरी मिलनी चाहिए, लेकिन कई राज्यों में महीनों बाद भी पैसा नहीं मिल पा रहा है।

सरकार को ये देखना होगा कि वह जानबूझ कर अपनी इच्छाशक्ति कम कर रही है या स्थानीय प्रशासन इसमें लापरवाही बरत रहा है। सरकार को मनरेगा के जरिए ग्रामीण क्षेत्र के मजदूरों को प्रोत्साहन देना होगा। सरकार उनसे कहे कि तुम काम करो और हम भुगतान करेंगे। इससे ग्रामीण क्षेत्र में बेरोजगारी की समस्या काफी हद तक दूर हो जाएगी।
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